नई पौध को संभाले सरकार

Sep 21st, 2012 12:15 am

(भूपिंद्र सिंह लेखक, पेनल्टी कार्नर खेल पत्रिका के संपादक हैं)

जमा दो पास करके विद्यार्थी कालेज में दाखिल तो हो जाते हैं, मगर वे पूरा वर्ष भर्तियों के लिए दौड़ते रहते हैं। जो टीम इस वर्ष किसी कालेज से अंतर कालेज खेल प्रतियोगिता में आती है, अगले वर्ष शायद ही उस टीम का कोई खिलाड़ी आपको दिखाई दे…

पिछले कुछ वर्षों से हिमाचल प्रदेश स्कूली व जूनियर खेल प्रतियोगिताओं में प्रतिभावान खिलाडि़यों का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ा है, मगर जमा दो पास हो जाने के बाद एक वर्ष के अंदर ही ये खिलाड़ी कहां गायब हो रहे हैं। जब इस सवाल के जवाब में पड़ताल शुरू हुई पता चल रहा है कि राज्य में जब से सरकारी नौकरियों में अनुबंध प्रथा चली है, उसी समय से सरकारी नौकरियों पर निर्भर रहने वाले इस प्रदेश के लोगों ने अपने बच्चों को सेना, सुरक्षा बलों तथा राज्य पुलिस में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया है। एक समय था, जब विज्ञान स्नातक में विद्यार्थी दाखिल हो जाता था तो वह उसे पास किए बिना शायद ही किसी नौकरी के लिए उसे अधूरा छोड़ता था, मगर आज जब भर्ती होती है तो बीएससी अंतिम वर्ष तक के विद्यार्थी भर्ती की रैली में जाकर भर्ती को पढ़ाई के आगे रखकर भर्ती होने की पुरजोर कोशिश करते हैं। जमा दो पास करने के बाद ही अधिकतर जगह भर्ती की योग्यता शुरू होती है। जमा दो पास करके विद्यार्थी कालेज में दाखिल तो हो जाते हैं, मगर वे पूरा वर्ष भर्तियों के लिए दौड़ते रहते हैं। जो टीम इस वर्ष किसी कालेज से अंतर कालेज खेल प्रतियोगिता में आती है, अगले वर्ष शायद ही उस टीम का कोई खिलाड़ी आपको दिखाई दे। खिलाड़ी पूरी तरह फिट होता है। मैदान की परीक्षा पास करने में उसे कोई भी कठिनाई नहीं आती है। लिखित परीक्षा की वह पूरा वर्ष तैयारी करता रहता है और फिर वह सेना, सुरक्षा बल या राज्य पुलिस जहां कहीं भी उसे मौका मिलता है, भर्ती हो जाता है। भारतीय खेल प्राधिकरण व राज्य खेल विभाग के छात्रावासों में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे खिलाड़ी भी वहां पर अब केवल भर्ती को ही अधिकतर प्राथमिकता दे रहे हैं। यही कारण है कि करोड़ रुपए खर्च कर चुके ये खेल छात्रावास आजतक एक भी एशियाई खेलों का पदक विजेता नहीं दे पाए हैं। खेल छात्रावासों में खिलाडि़यों को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रदर्शन करवाने के लिए भर्ती किया जाता हैै, मगर वहां पर खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तो दूर, वह राष्ट्रीय स्तर पर भी पदक राज्य के लिए नहीं जीत पा रहा है, मगर वह भर्ती होकर जरूर चला जा रहा है। क्या राज्य के खेल विभाग ने इस विषय पर कुछ सोच विचार किया है कि उत्कृष्ट प्रदर्शन करवाने के लिए चलाए गए खेल छात्रावास आज केवल भर्ती सेंटर बनकर रह गए हैं। देश व प्रदेश में बदलते सामाजिक व आर्थिक परिवेश में जब सरकारी नियमित नौकरी सबके लिए आज बहुत जरूरी है तो अच्छा होता राज्य पुलिस में भर्ती प्रतिभावान खिलाडि़यों के प्रशिक्षण का उचित प्रबंध कर दिया जाता, ताकि हिमाचल की संतानें भी हिमाचल में ही रहकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक का सफर आसानी से तय कर पातीं। हिमाचल में खेलों के लिए खिलाड़ी को तैयार करना है तो जमा दो के बाद उसके भविष्य को सुनिश्चित जरूर करना पड़ेगा। नहीं तो जो खिलाड़ी इस वर्ष मिलेगा, वह दूसरे वर्ष दूर-दूर तक भी नजर नहीं आएगा।

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