पर्यटन के नए पैगंबर

Sep 27th, 2012 12:10 am

मुरारी बापू की कथा के निष्कर्ष सामान्य भी रहें, लेकिन धर्मशाला में सजा पंडाल अपनी विशिष्टता के आलोक में पर्यटन की दुनिया बदल देता है। जहां दलाईलामा, प्रेम कुमार धूमल, अशोक सिंघल व प्रवीण भाई तौगडि़या जैसे विशिष्ट लोग हाजिरी भरते हों, वहां कथा और कथानाक, मंच से बाहर भी भूमिका निभाएगा। यही वजह है कि मुरारी बापू की कथा के बहाने धर्मशाला में गुजरात से पर्यटन की पुष्पांजलि अर्पित होती है। ऐसे आयोजनों का तात्पर्य भक्ति रस के साथ ट्रैवल उद्योग के स्रोत भी देखता है और यही हिमाचल का सामर्थ्य बनकर उभर रहा है। संत-समाज, गुरु-महात्माओं और देवभूमि के साक्ष्यों के साथ हिमाचल में पर्यटन को पूजतीं बहारें बह रही हैं। चमत्कार से दूर पर्वतीय घाटियों का स्पंदन, प्राकृतिक विविधता, मौसम की अनुकूलता और बेचैन मन के लिए शांति का अनुभव हिमाचल स्पर्श का दैवीय प्रभाव है। यही वजह है कि देश के प्रतिष्ठित साधु-संत अपने मुहिम के पात्र ढूंढते, हिमाचल के आगोश में सुकून प्राप्त करते हैं। कुल्लू घाटी के अलावा पूरे प्रदेश की मनोरम घाटियों में रमते अरमान किसी न किसी विशिष्ट व्यक्ति को सदा के लिए रोक लेते हैं। पहले यह प्रक्रिया नौकरशाहों, आर्मी आफिसर, कलाकारों, लेखकों या व्यवसायियों को ही हिमाचली संदर्भों में स्थापित करती थी, लेकिन अब धार्मिक यात्राओं को चिन्हित करते नए पड़ाव विकसित हो रहे हैं। हर साल देश में धार्मिक अनुयायियों के कदम जब दिशाएं खोजते हैं, तो कुछ ठिकाने हिमाचल में भी बनते हैं। यह क्रम कुछ पर्यटक स्थलों के साथ जुड़कर धार्मिक पर्यटन की  नई व्याख्या बनता जा रहा है। मुरारी बापू की राम कथा में यही पर्यटन रोज संगत निभाता है। वर्षों से महामहिम दलाईलामा की उपस्थिति के कारण हिमाचल में बौद्ध-तिब्बती पर्यटन की कई शृंखलाएं पैदा हुई हैं। यह दीगर है कि हम इस आशीर्वाद की संभावना को वास्तविक पर्यटन में बदल नहीं पाए। आज तक हिमाचल में बौद्ध सर्किट के अनुरूप मकलोडगंज, मनाली, लाहुल-स्पीति व किन्नौर को रूपांतरित नहीं किया गया और न ही अधोसंरचना-कनेक्टिविटी के हिसाब से रास्ते स्पष्ट हुए। कुल मिलाकर धार्मिक पर्यटन की बेहद क्षमता को हिमाचल, आर्थिक संपन्नता में तबदील नहीं कर पाया। देश का धार्मिक पर्यटन अब हजारों करोड़ के चक्र को घुमा रहा है। हमारे पड़ोस में वैष्णोदेवी मंदिर ही यदि पांच सौ करोड़ की आय का स्रोत है, तो प्रदेश के दर्जनों मंदिरों की वजह से हम देवभूमि का सिक्का क्यों नहीं जमा पाए। अंतर केवल यह है कि बाकी राज्यों ने पर्यटन योजनाओं को धार्मिक स्थलों की आय से जोड़ा और अधोसंरचना से इसमें निरंतर बढ़ोतरी हुई। विडंबना यह है कि हिमाचली मंदिरों की आय यात्री सुविधाओं के बजाय राजनीतिक तरफदारी बन गई। ज्वालामुखी मंदिर ट्रस्ट के भवन अपनी उपयोगिता सिद्ध नहीं कर पाए, जबकि इसकी आय को कालेज निगल गया। होना तो यह चाहिए था कि ज्वालामुखी मंदिर का अपना एक कला कालेज होता और जिसके माध्यम से शास्त्रीय गीत-संगीत, नृत्य के अलावा स्थानीय भजन व लोकगायकों को बड़ा मंच मिलता। आस्था के जितने प्रतीक हिमाचल में हैं, उन्हें पर्यटन की माला में पिरोकर हम अपनी पहचान को यकीनी तौर पर पुष्ट कर पाएंगे। हिमाचल में मकलोडगंज से मनाली के बीच आयोजन स्थल उपलब्ध करवाकर प्रदेश बौद्ध कालचक्र की महत्त्वपूर्ण मंजिल बन सकता था और यही महामहिम दलाईलामा का सान्निध्य भी है। प्रदेश में धार्मिक समागमों, व्यापारिक मेलों और सांस्कृतिक समारोहों के दृष्टिगत महत्त्वपूर्ण शहरों में सामुदायिक मैदानों व पार्किंग सुविधाओं में विस्तार करने की नितांत आवश्यकता है, ताकि पर्यटन के ये नए पैगंबर अपना वार्षिक ठिकाना हिमाचल को बनाएं।

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