यौन शोषण से संरक्षण

Sep 5th, 2012 12:10 am

संसद के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह कोल ब्लॉक आबंटन को लेकर सदन भाजपा सदस्यों के भारी हंगामे और नारेबाजी के चलते सरकार निजी और सार्वजनिक कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन शोषण रोकने से संबंधित विधेयक को लोकसभा की मंजूरी दिलवा पाने में कामयाब रही। इस दौरान सरकार जो तीन विधयेक पारित करवा पाई, उनमें यह विधेयक खास अर्थ लिए हुए है। हालांकि यह विधेयक चर्चा के बिना ध्वनिमत से पारित हुआ है, यह अभी देखना होगा कि यह प्रावधान अमल के स्तर पर कामकाजी महिलाओं को यौन उत्पीड़न से निजात दिलवाने में कहां तक कामयाब होता है। यह अलग बात है कि कार्यस्थलों तथा उससे बाहर होती रही उत्पीड़न की बढ़ती हुई घटनाओं के रहते इस तरह के कानून की भारी जरूरत महसूस की जाती रही थी। इस विधेयक में कार्यस्थलों पर कामकाजी महिलाओं का उत्पीड़न रोकने के साथ-साथ महिलाओं के साथ उचित सम्मान, विनम्रता व गरिमा से पेश आने का आग्रह किया गया है। निजी या सार्वजनिक कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन शोषण से संरक्षण संबंधी विधेयक में घरेलू नौकरानियों को भी शामिल किया गया है। शायद ही कोई दिन ऐसी बीतता हो, जबकि देश के किसी कोने या महानगर से कामकाजी महिलाओं के उनके कार्यस्थल या उससे बाहर यौन शोषण की खबरें न आती हों। हाल ही में मुंबई हाई कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कंपनियों को उनके यहां देर रात तक काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की हिदायत दी थी, उसकी यह भी राय थी कि यह जिम्मेदारी भी कंपनी की बनती है कि वह देखे कि उसकी कोई महिला कर्मी सुरक्षित अपने घर और घर से दफ्तर पहुंचे। महिलाओं का उनके कार्यस्थलों पर यौन शोषण रोकने से संबंधित विधेयक भी इन्हीं भावनाओं से मेल खाता है। बंबई हाई कोर्ट पुणे में वर्ष 2007 में एक महिला कर्मी की दफ्तर जाते वक्त रात के समय दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई थी। राजधानी  दिल्ली व उसके निकटवर्ती राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से भी इस तरह की खबरें मिलती रही हैं, जिन्हें लेकर महिला संगठनों में भारी चिंता व्यक्त करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की मांग करते रहे हैं। जैसा कि कार्यस्थलों पर महिलाओं का यौन शोषण रोकने संबंधित विधेयक में भी कहा गया है अन्य बातों के अलावा महिला को अश्लील टिप्पणी करने, शारीरिक छेड़छाड़, यौन मूवी दिखाने जैसे कार्य यौन शोषण की परिभाषा में शामिल रखे गए हैं। ऐसा होने पर 50 हजार रुपए तक के जुर्माना का प्रावधान भी है, लेकिन कार्यस्थलों पर इस तरह की प्रवृत्ति के बढ़ते या उसकी वजह से होते रहे अपराधों को देखते हुए यह सजा पर्याप्त नहीं है। मनुष्य की खाल में विचर रहे भेडि़यों पर काबू पाने के लिए सजा की और कड़ी व्यवस्था होनी चाहिए। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि अनेक कानून व्यवस्थाओं के रहते ऐसे कई अपराधी न केवल बच निकलते हैं, उनमें कानून के प्रति डर नहीं रह जाता। यह इस स्थिति का एक चिंताजनक पहलू भी है। सरकार तथा प्रमुख महिला संगठन संगठित व असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं की बराबर बढ़ती हुई संख्या के मद्देनजर महिलाओं को उनके कार्यस्थलों पर अनुकूल व हर प्रकार से सुरक्षित माहौल हासिल कराना चाहते रहे हैं। नई व्यवस्था के तहत ऐसा करना अवश्य संभव होगा। बशर्ते कि एक ठोस राजनीतिक व सामाजिक संकल्प के साथ इस दिशा में काम भी हो पाए, ताकि कामकाजी महिलाएं अब और अधिक ऐसे अपराधों का निशाना न बन पाएं। पुरुष वर्ग के खिलाफ कानून का मनमाना दुरुपयोग भी नहीं होना चाहिए, जिसमंे सरकारी व गैर सरकारी प्रतिष्ठान, नर्सिंग होम अस्पताल, ट्रेनिंग सेंटर व खेल क्षेत्र आदि शामिल हैं।

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