राजनीतिक सिद्धांतों को समझें

(प्रेमलाल महिंदू्र, नाहन)

ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आ रहे हैं, त्यों-त्यों राजनीतिक पार्टियों में विरोधाभास बढ़ता जा रहा है। सत्ता हासिल करने के लिए हर प्रकार का हथकंडा अपनाया जाना राजनीति का एक अंग है, जिसमें प्रदेश की दो बड़ी पार्टियां एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप लगाकर एक दूसरे को नीचा दिखाने की हर संभव कोशिश करती है। मतदाता भी एक दूसरे पर की जाने वाली इस छींटाकशी से असमंजस की स्थिति में पड़ जाते हैं कि वास्तव में इन पार्टियों में कौन सच्चा और कौन झूठा हो सकता है, जबकि दोनों की कारगुजारियों से जनता कोई अनभिज्ञ तो होती नहीं, अतः मन ही मन मतदाता तो यही सोचकर चुप रहते हैं कि चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत तो इन दोनों ही पार्टियों के नेताओं पर लागू होती है। आखिर इन दोनों पार्टियों ने सत्ता पर बैठने का मजा चखा हुआ है तथा कड़वे घूंट तो हर बार जनता को ही पीने पड़ते हैं, जो वह पीकर चुप बैठ जाती है। अकसर यह भी देखने में आता है कि जब मतदाता यह सोच लेते हैं कि अब तो भूल हो गई, परंतु अगली बार इस पार्टी को मजा जरूर चखाएंगे, परंतु अगले चुनाव आने पर न जाने क्यों यही मतदाता फिर वही भूल कर बैठते हैं। वही नेता भेस बदलकर फिर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं, कोरे आश्वासनों की झड़ी लगाकर। इस दफा तो मतदाता सोच समझ कर ही उम्मीदवारों का चयन करेंगे, ताकि आगे के लिए राजनीतिक वातावरण दूषित न होने पाए तथा जीत उन्हीं के नाम दर्ज होगी जो राजनीति के मूल्यों और सिद्धांतों को साथ रखकर चलने का संकल्प लेंगे। इसी पर प्रदेश की हर क्षेत्र में उन्नति संभव होगी।

 

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