राजा में है दम

Sep 2nd, 2012 12:15 am

हाइकमान को जब भी वीरभद्र सिंह ने तल्ख तेवर दिखाए, दिल्ली सल्तनत घुटनों के बल चलती दिखी। चलती भी क्यों न, आलाकमान को पता है कि यदि राजा रूठे तो जग रूठा और फिर कांग्रे्रस से हिमाचल रुसवा हो जाता। एक वीरभद्र ही हैं जो प्रदेश सरकार को धांसू टक्कर दे सकते हैं। पंजाब की हार, यूपी में बुरा हाल और उत्तराखंड में बाल-बाल बचने के बाद आलाकमान के पास चारा भी कोई नहीं था कि वह सिंह को चुनौती देता। यही नहीं, 1998 में सुखराम के हाथों जख्म खाए बैठा आलाकमान अब कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था। यही वजह रही कि वीरभद्र सिंह को हिमाचल की बागडोर सौंपी गई…

 हिमाचल कांग्रेस में वीरभद्र सिंह को उस समय अध्यक्ष पद की कमान सौंपी गई है, जब भाजपा फिर से राज्य में परचम लहराने की हुंकार भर रही है। अभी तक केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने भी यही रिपोर्ट दिल्ली भेजी है कि भाजपा को चुनौती देने के लिए दमदार नेता चाहिए और वह वीरभद्र सिंह दे सकते हैं। आलाकमान हालांकि चुनावी वर्ष के अंतिम समय में बदलाव का पक्षधर नहीं थे, मगर वीरभद्र सिंह के कड़े तेवरों के आगे आलाकमान को झुकना ही पड़ा। उनके विरोधी भी कहते हैं कि झुकाने वाला चाहिए, हाइकमान झुकता है। यह कोई पहला मौका नहीं है कि पार्टी हाइकमान को वीरभद्र सिंह ने अपनी बात मनाने के लिए राजी किया हो। हालांकि उनके विरोधियों ने उन्हें पिछली कतार में धकेलने के लिए पूरा प्रयास किया, मगर वीरभद्र सिंह फिर चैंपियन बनकर निकले। अभी भी उनके विरोधी इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं, जो चुनावी जीत की शर्त तक है, मगर वीरभद्र सिंह समर्थक इससे इत्तफाक नहीं रखते हैं। उनका कहना है कि पहले भी कई बार ऐसे मोल-भाव के दावे किए जाते रहे हैं, जो सिरे नहीं चढ़े। वर्ष 2003 में भी विद्या स्टोक्स समर्थकों ने पूरा जोर लगाया था, मगर सिंह ने सियासी जंग पलों में जीत ली। धूमल सरकार को सीधे-सीधे चुनौती देने में वीरभद्र सिंह ही सबसे आगे रहे हैं। हालांकि अन्य नेता भी सरकार के विरोध में बोलते तो हैं, मगर उनका सीधा प्रहार मुख्यमंत्री पर नहीं होता। पांच बार  मुख्यमंत्री रहने वाले वीरभद्र सिंह की हर जिले में समर्थकों की काफी फौज है। हिमाचल के प्रति उनका संवेदनशील रुख उनकी लोकप्रियता का पैमाना माना जाता है। पंजाब में हार, उत्तर प्रदेश में पिटने व उत्तराखंड में बाल-बाल बचने के बाद कांग्रेस आलाकमान के पास चारा भी कोई नहीं था कि वह वीरभद्र सिंह को चुनौती देता। वीरभद्र सिंह व उनके समर्थकों बारे ये चर्चाएं लगातार जोर पकड़ती रहीं कि यदि उनकी बदलाव की मांग को नहीं माना गया तो वह एनसीपी या फिर क्षेत्रीय दल बना सकते हैं। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 1998 में सुखराम के हाथों ऐसे ही जख्म खाए बैठा आलाकमान अब कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था। यही वजह है कि वीरभद्र सिंह का न केवल मान-मनोबल दिया गया, बल्कि उन्हें फ्री हैंड भी दिया गया। मसलन हिमाचल में पार्टी की सरकार बनाने के लिए वह नीचे से ऊपर तक जो भी बदलाव करना चाहें, कर सकते हैं। कुशल प्रशासक व दमदार नेता के तौर पर उनकी छवि हिमाचल के नेताओं व यहां के लोगों के जहन में उतरी है। यही वजह है कि हाइकमान ने फिर से वीरभद्र सिंह की गर्जना के आगे झुकने को ही फिर से तवज्जो दी है।

चुनौतियां

 * गुटबाजी में फंसे नेताओं को एकता के सूत्र में पिरोना

* भाजपा सरकार का रौब कम करना

* कौल सिंह, जीएस बाली, आशा कुमारी, विप्लव ठाकुर, बीबीएल बुटेल व आनंद शर्मा जैसे नेताओं से टक्कर

* सभी को साथ लेकर पार्टी को सत्ता में लाना

एक सच यह भी

कौल सिंह को बाहर करने के बाद उनके समर्थक कितनी बड़ी चुनौती राजा के सामने खड़ी करते हैं, यह समय ही बताएगा। वैसे अभी तक कांग्रेस की जो राजनीति रही है, उसमें जब हाइकमान किसी बड़े नेता को कमान सौंप देती है तो सभी उसी के पीछे चलते हैं। राजा के नेतृत्व में यह परिवर्तन कितने वक्त में होता है, असल में यही देखना बाकी है।

समर्थकों की राय

वीरभद्र समर्थक हालांकि इस बात से इनकार कर रहे हैं कि उनके आका के सामने कोई चुनौती नहीं होगी। उनका दो टूक कहना है कि वीरभद्र सिंह प्रदेश कांग्रेस के एकमात्र जनाधारयुक्त नेता हैं। एक महीने के अंदर प्रदेश में कांग्रेस की तस्वीर न केवल साफ होगी, बल्कि चुनौती भाजपा के लिए ही दिखेगी।

 सभी के वश की बात नहीं

इस पूरी फाइट में पार्टी हाइकमान का साथ भी स्व. ठाकुर रामलाल के बाद फाइट में रहे नेताओं को मिला, मगर सभी रण छोड़ साबित हुए। वीरभद्र सिंह की उस नंबर गेम में जिसे कभी डिवाइड एंड रूल बताया जाता रहा हो तो कभी उनके पास सभी के कच्चे चिट्ठे रहने की बात को उछाला गया, जिसके डर से कोई उनके आगे नहीं बोलता। कई नेता उन्हें सभी को साथ लेकर चलने और दोस्तों से अच्छी तरह दोस्ती निभाने को कारण बताता है तो कोई कुशल प्रशासक।

फाइटर की फाइट में पुरोधा

स्व. ठाकुर रामलाल, जेबीएल खाची, मौजूदा सीएलपी नेता विद्या स्टोक्स, पं. सुखराम, मेजर मनकोटिया, जीएस बाली, कौल सिंह, जिनके समर्थक उन्हें भावी सीएम के तौर पर उतारते आए हैं।

 धूमल ने जीता कर्मियों का दिल

हिमाचल में धूमल सरकार मिशन रिपीट के लिए कदम ताल कर रही है। सरकार ने कर्मचारियों के साथ-साथ अन्य वर्गों को भी उनकी मांगों के अनुरूप तोहफे दिए हैं। मुख्यमंत्री प्रो. धूमल लगातार दूसरी बार भाजपा से मुख्यमंत्री बने हैं। उन्हें फ्लेक्सिबल नेता के तौर पर प्रदेश के लोग मानते हैं। सचिवालय व इससे बाहर लोगों के दुख-दर्द के प्रति संवेदनशील माने जाते हैं। उनकी नीतियां व कार्य जन संवेदनाओं के तहत कार्यरूप लेते हैं। इस बार कांग्रेस के लिए सियासी जंग सरल नहीं दिख रही।

सिंह के रास्ते चुनौतीपूर्ण

वीरभद्र सिंह को न केवल पार्टी में फेरबदल के बाद उसे मजबूती देनी होगी, बल्कि पार्टी वर्करों को जुनूनी बनाकर आगे लाना होगा। उन्हें न केवल नए सिरे से रिचार्ज करने की जरूरत रहेगी, बल्कि गुटबाजी को दूर करके सभी को साथ लेकर बढ़ने की भी चुनौती। नए चेहरों को भी उनसे आस है, दूसरी पंक्ति उनसे संरक्षण मांगती दिख रही है। उनके अपने पुराने समर्थक टिकट की कतार में उम्मीदें बांधे खड़े हैं। चुनौतियां वीरभद्र सिंह के लिए भी कम नहीं हैं। अब यह वीरभद्र सिंह का राजनीतिक कौशल होगा कि वह एक तरफ पार्टी में चल रही जंग को जीतें, टिकटों का सही वितरण कर दिखाएं और साथ में भाजपा को भी वह चुनौती देते दिखें, जिसके लिए उन्हें कमान सौंपी गई है।

 राजनीतिक समीकरण अब बदलेंगे

वीरभद्र सिंह की प्रदेश वापसी के बाद हिमाचल में सियासी समीकरण बदलेंगे। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। उनके जो समर्थक पहले खुद को दबा हुआ मान रहे थे, जिन्हें टिकट के लिए भी चुनौतियां दिख रही थीं। अब वे बढ़े हुए मनोबल के साथ फील्ड में दिख रहे हैं। राजा खुद फील्ड सजाने में जुटे हुए हैं। एक तरफ वह केंद्रीय नेताओं की रैलियों की तैयारियां कर रहे हैं तो दूसरी तरफ संगठन को भी संवार रहे हैं। सफाई अभियान में उन्होंने उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है, जो उपचुनावों के दौरान उनके खिलाफ तेवर दिखा रहे थे। जिला व ब्लॉक स्तर पर उन्होंने समर्थकों को मोर्चा संभालने के निर्देश दे दिए हैं। संगठन में बदलाव किया भी गया है, आगे भी अपेक्षित है। टिकटों का फैसला भी सितंबर मध्य तक होने की सूचना है। यदि विधानसभा चुनाव नवंबर के पहले हफ्ते में होते हैं तो कांग्रेस के लिए यह अच्छा समय कहा जा सकता है। 68 विधानसभा क्षेत्रों में उनके वफादारों की कतार कम नहीं है। पूर्व मंत्रियों, मौजूदा विधायकों व कांग्रेस के परंपरागत प्रत्याशियों में उनके समर्थक कहीं भी कम नहीं है। लिहाजा उन्हें नए सिरे से कोई बड़ा प्रयास करना होगा। ऐसा नहीं कहा जा सकता है। वीरभद्र सिंह मंडी, कांगड़ा, शिमला जैसे बड़े संसदीय हलकों में संतुलन बिठाकर आगे बढ़ते रहे हैं। देखने वाली बात महज यह होगी कि अब वीरभद्र सिंह के लिए उनके विरोधी कितनी चुनौती खड़ी कर पाते हैं।

 राजा के खिलाफ मुद्दे

धूमल सरकार के पास वीरभद्र सिंह के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा सीडी का है, जिसमें शिमला की विशेष अदालत ने उनके खिलाफ
आरोप भी तय कर दिए हैं। यही नहीं, मुख्यमंत्री प्रो. धूमल जेपी मामले में भी विधानसभा के अंदर व बाहर पूर्व वीरभद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं। सीएजी की रिपोर्ट का हवाला देकर धूमल सरकार इस्पात मंत्रालय में दो हजार करोड़ के घोटाले के आरोप लगा रही है। यह इशारा सीधा किस नेता की तरफ है, अभी तक भाजपा ने इसका खुलासा नहीं किया है। यही नहीं अपार्टमेंट एक्ट की बात हो या निजी विश्वविद्यालयों की, भाजपा आरोपों की सूई पूर्व वीरभद्र सिंह सरकार पर घुमाती आई है। इन आरोपों की धार कितनी तेज होगी, मतदाता इनको कितनी गंभीरता से लेगा। यही नहीं क्षेत्रवाद को भी चुनावों में हवा दी जा सकती है। कांग्रेस में जो गुटबाजी है, उसे भी भाजपा उठाकर भुनाने का प्रयास करेगी, जिसमें कौल सिंह व अन्य नेताओं को मुद्दा बनाते हुए मंडी संसदीय क्षेत्र में मत बटोरने की भी तैयारी हो सकती है।

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