विकृत मानसिकता प्रदर्शन से बचें

(कुलभूषण उपमन्यु लेखक, चंबा से पर्यावरणविद हैं)

 समाज की अपनी-अपनी आस्थाएं होती हैं,, जिनके पीछे हर मामले में तर्कशीलता को कसौटी नहीं बनाया जाता, फिर भी वे आस्थाएं उस समाज की मानसिकता शक्ति को बढ़ाती हैं। उनकी व्यावहारिक अनदेखी करना और जानबूझ कर उनकी खिल्ली उड़ाकर उस समाज को मानसिक आघात पहुंचाने की कोशिश करना न तो बहादुरी का काम है और न समझदारी का…

जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय दिल्ली में गौमांस पार्टी के आयोजन का समाचार पढ़ा। इस पार्टी को 28 सितंबर शहीद भगत सिंह के जन्मदिन से और छात्र संघ के चुनावों के साथ जोड़ा गया है। इस पार्टी के आयोजक कोई ‘दि न्यू मैटीरियलिस्ट’ नामक संगठन और उसके साथी हैं। ऐसी ही एक पार्टी हैदराबाद के उस्मानियां विश्व विद्यालय में ‘गौमांस उत्सव’ के नाम से कुछ महीने पहले ही की गई थी। जिसके पीछे इसी तरह की विकृत मानसिकता के लोग रहे होंगे। बहाना यह बनाया जा रहा है कि भाजपा, आरएसएस व अन्य हिंदूवादी संगठन गाय को राजनीति का केंद्र बनाते हैं। लगता है कि ये संगठन इस प्रतीकात्मकता की शक्ति को इस आयोजन द्वारा ध्वस्त करना चाहते हैं, किंतु इन संगठनों को यह भी याद रखना चाहिए कि गाय को बृहद हिंदू समाज आदर की दृष्टि से देखता है, जो अन्य कई राजनीतिक धाराओं में आस्था रखता है और उसमें से काफी बड़ा वर्ग वामपंथ में भी आस्था रखता है। भाजपा, आरएसएस और अन्य हिंदूवादी संगठन उस बृहद हिंदू समाज के एक छोटे से हिस्से का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इन लोगों को ऐसी बचकानी हरकतें हिंदू समाज के एकांगी धु्रवीकरण को देगा, जो इन लोगों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति में कठिनाई को और बढा़एगी।  समाज की अपनी-अपनी आस्थाएं होती हैं, जिनके पीछे हर मामले में तर्कशीलता को कसौटी नहीं बनाया जाता, फिर भी वे आस्थाएं उस समाज की मानसिकता शक्ति को बढ़ाती हैं। उनकी व्यावहारिक अनदेखी करना और जानबूझ कर उनकी खिल्ली उड़ाकर उस समाज को मानसिक आघात पहुंचाने की कोशिश करना न तो बहादुरी का काम है और न समझदारी का, क्योंकि ऐसे व्यवहार से समाज में कोई गुणात्मक अच्छा परिवर्तन आने के बजाय बिना कारण समाज में तनाव फैलता है। हां कोई आस्था ऐसी तर्क हीन है, जिससे समाज के अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाए तो उस मुद्दे पर चर्चा और आपसी समझबूझ से बदलाव लाए जा सकते हैं। इस मामले में हिंदू मानसिकता सबसे ज्यादा उदार रही है और कुछ अपवादों को छोड़कर अभी भी वैसी ही बनी हुई है। ऐसी मानसिकता को चिढ़ाकर उसके उदारवाद को कुंद करने का ही काम किया जा रहा है। भारतवर्ष में काफी सारे परंपरागत और बाहर से आए हुए मतावलंबी हैं जो सदियों से गौमांस खा रहे हैं। कितने कत्लखाने देश में चल रहे हैं, जहां पशु वध हो रहा है। गौमांस का निर्यात हो रहा है, किंतु समाज ने एक पर्दा और संतुलन बनाकर रखा है, जिससे बहुमत समाज की भावना को ठेस न लगे। कोई अपने चूल्हे पर क्या पकाकर खा रहा है, इस बात की जासूसी करने की इस देश में न परंपरा रही है और न ही प्रजातंत्र के रूप में इसकी किसी को इजाजत दी जा सकती है, किंतु ऐसी बात का तमाशा बनाना, उसे उत्सव का रूप देना जिससे बहुमत समाज की भावनाएं आहत होती हों, किसी भी दृष्टि से तर्कसम्मत, मानवतावादी, विकासवादी या राष्ट्र हितकारी नहीं ठहराया जा सकता, देश में अशांति फैलाने वाले ऐसे प्रयास को एक सभ्य समाज क्या नाम दे? यह निर्णय तो व्यापक समाज पर ही छोड़ा जा सकता है। अगर यह वामपंथी समूह देश में सैकुलरवाद को प्रोत्साहित करने में इस आयोजन को सहायक समझता है, जिसमें कृष्ण, शिव जैसे अस्था के प्रतीकों पर प्रहार करना उन्हें जरूरी लगता है तब उनकी सोच पक्षपात पूर्ण और बौद्धिक बेइमानी से भरी लगती है, क्योंकि एक नास्तिक को हर धर्म के प्रतीकों और परंपराओं पर प्रहार करना पड़ेगा। खासकर जो प्रतिगामी और मानवीय गरिमा के अनुकूल नहीं है और वे भी उसी तरह उन तत्त्वों का घोषित तौर पर राजनीतिक उपयोग करते हैं। वहां इन बहादुर उदारवादियों की जुबान बंद क्यों हो जाती है। शायद उनकी उग्र प्रतिक्रिया के भय से या वोट के लालच में या शायद दोनों कारणों से। भावनात्मक रिश्ते और संवेदनाएं केवल धार्मिक लोगों कीही नहीं होती, नास्तिकों की भी होती हैं। जो नजदीकी वामपंथियों को मार्क्स, एंजिल्स और माओ के साथ महसूस होती हंै, वही नजदीकी हिंदू कृषक, पशुपालक समाज को कुछ नई राह दिखाने वाले कृष्ण के साथ महसूस होती है। यदि ये लोग मार्क्स आदि के लिए गाली नहीं सुन सकते तो कृष्ण को भी गाली देने की कोशिश न करें। हो सकता है कृष्ण के दर्शन में आज के संदर्भ में कुछ कमियां हों, उन्हें दूर किया जा सकता है, किंतु कोई भी महापुरुष समाज में हजारों सालों तक यूं ही आदर योग्य नहीं बना रह सकता। उसने समाज को कुछ महत्त्वपूर्ण दिया होता है। मार्क्स के दर्शन पर खड़ा किया गया किला भी तो ध्वस्त हो गया, किंतु उससे मार्क्स में मानवता के लिए जो योगदान दिया, उसका न तो महत्त्व कम होता है और न ही आदर। हिंदू समाज को नरम निशाना समझकर जो मन में आए करते जाने वाले वर्ग से मेरा नम्र निवेदन है कि उनके उदारवाद की कई पड़ोसी देशों में हमसे भी ज्यादा जरूरत है, वहां भी जाकर वे वहां की कमियों को उजागर करने का प्रयास करें, वरना वे पक्षपाती ही नहीं कायर भी ठहराए जाएंगे और यदि निष्पक्ष इतिहास लेखन संभव हुआ तो वह इतिहास इसे दर्ज करेगा।

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