विपरीत दूरियां

{ज्ञान चंद शर्मा, मंडी}

कमल सम, प्रमुदित जग

अभिशप्त सा, यह जीवन

किसे सुनाए, अंतर्मन में

दबी वेदना के स्वर!

नीले अंबर के बितांन तले, हिरण सम

कुलांचे भरते तुम, जीवन की

अंतहीन पगडंडियों, पर लड़खड़ाते

लंगड़ाते हम!

किसे सुनाएं अंतर्मन में

दबी वेदना के स्वर!

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