विश्वविद्यालय पीछे क्यों?

विश्व के शीर्ष 200 शिक्षण संस्थानों में किसी भारतीय विश्वविद्यालय का नाम न होने पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा चिंता व्यक्त किया जाना अकारण नहीं है। जैसा कि राष्ट्रपति ने आईआईटी खड़कपुर के 58वें दीक्षांत भाषण में स्वीकार किया है, यह प्रश्न पूछा जाना स्वाभाविक है कि भारत की उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति होने के बावजूद ऐसा क्यों है कि उसका नाम विश्व के दस शीर्ष विश्वविद्यालयों या संस्थानों में नहीं है। हालांकि किसी एक वैश्विक संस्था द्वारा किए गए ऐसे सर्वेक्षणों के मानकों को लेकर कुछ सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन उसके आकलन की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह स्थिति हमारे लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा होनी चाहिए, ताकि विश्व के चोटी के दस या सौ विश्वविद्यालयों में हमारा नाम आ सके। 2012 के ताजा सर्वेक्षण  के अनुसार ब्राजील, रूस, भारत व चीन के ब्रिक्स समूह में से केवल भारत अभी विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की सूची से बाहर है। जहां तक एशिया का प्रश्न है, उसमें भारत की 11वीं जगह क्यों न हो, उसके मुकाबले चीन, सिंगापुर व दक्षिण कोरिया तरक्की की राह पर है। विश्वविद्यालयों के मुकाबले भारत आईआईटी संस्थानों ने काफी प्रगति की है, जो संतोष का विषय हो सकता है। मिसाल के तौर पर आईआईटी मुंबई, दिल्ली व कानपुर का बेहतर स्थान बना पाना एक ऐसे समय में जब भारत ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बराबर तरक्की करता रहा है और उसकी गणना विश्व की उभरती आर्थिक ताकतों में की जाने लगी है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी उसे आगे बढ़ना चाहिए। कुछ समय से जिस कद्र भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए अमरीका, ब्रिटेन व अन्य देशों में जाने लगे हैं, उसे देखकर यह अनुभव होता कि हम मेधावी छात्रों को अपने यहां वे सुविधाएं नहीं दे पाते जो बाहर उपलब्ध हैं या शिक्षा का स्तर कहीं कम रहता है। कुछ समय से कुछ निजी विश्वविद्यालय भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आए हैं, इस कारण उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। जहां तक ज्यादातर सरकारी विश्वविद्यालयों का प्रश्न है, उन्हें या तो पूरा अनुदान नहीं मिल पाता या मानकों के आधार पर उनका स्तर उल्लेखनीय नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ सभी भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थिति को कम आंकना नहीं, अपितु प्रबंध व शिक्षण के लिहाज से उनकी शोचनीय स्थिति की ओर इशारा करना है। ऐसे स्वनाम धन्य कथित विश्वविद्यालयों या डीम्ड विश्वविद्यालयों की कमी नहीं है, जिन्हें मान्यता प्राप्त नहीं है या वे छात्रों को झांसा देकर उनके साथ खिलवाड़ करते हैं। हाल तक देश में 44 ऐसे फर्जी विश्वविद्यालय चल रहे थे, जिन्हें कोई मंजूरी नहीं मिली थी। एक ओर जहां केंद्रीय सरकार उच्च शिक्षा को उचित प्राथमिकता प्रदान करने का वादा करती है और नित्य नए संस्थान कायम किए जा रहे हैं, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि भारतीय विश्वविद्यालयों व संस्थानों के स्तर में सुधार लाया जाए, ताकि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरे उतर सकें। उच्च शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों का विदेश पलायन उनकी एक आवश्यकता हो सकती है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन उससे भी जरूरी है कि उच्च शिक्षा के स्तर में गुणात्मक परिवर्तन लाए जाएं।

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