संभालें नई पौध को

{बचन सिंह घटवाल,लेखक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सुनहेत कांगड़ा में प्रवक्ता हैं}

आज जीवन के परिदृश्य पर बहकावे का ग्रहण लगता जा रहा है। बहकावे के वशीभूत लड़कियां जीवन की सार्थकता को न समझते हुए लड़के के द्वारा दिखाए गए सुनहरे स्वप्नों को साकार करने के लिए उसके संग हो लेती हैं…

युवा वर्ग आज की चकाचौंध और आकर्षण से वशीभूत अपने सुनहरे स्वप्नों को साकार करने के लिए आंख मूंदकर दूसरों पर विश्वास कर लेते हैं, जिसका परिणाम उन्हें तब दृष्टिगत होता है, जब धीरे-धीरे आंखों के आगे से चकाचौंध का पर्दा हटता जाता है और व्यक्ति अपनी वास्तविक दुनिया में नजर आता है। प्रत्येक प्राणी में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होना स्वाभाविक क्रिया है, परंतु उसकी भी समयसीमा और आयुवर्ग की सीमा रेखा होती है। परिपक्व आयु और स्वावलंबन का सहारा पे्रेम की डगर को सार्थक दिशा प्रदान करता है। अल्पायु में आकर्षण के वशीभूत घर त्याग और रिश्तों की मर्यादाओं को तोड़कर आगे बढ़ना जीवन को नीरस व समाज विरोधी बना देता है। आज जीवन के परिदृश्य पर बहकावे का ग्रहण लगता जा रहा है। बहकावे के वशीभूत लड़कियां जीवन की सार्थकता को न समझते हुए लड़के के द्वारा दिखाए गए सुनहरे स्वप्नों को साकार करने के लिए उसके संग हो लेती हैं, जिसमें घर की मर्यादाओं को ताक पर रखकर यह नौजवान पीढ़ी तुजुर्बेकार मां-बाप को दरकिनार कर देती है। लड़के के झांसे, लालच व बाहरी दिखावे का भूत लड़कियों की लाज शर्म को तार-तार करने में भी नहीं हिचकिचाते। नासमझी और आकर्षण का भूत तब उतरता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है।

तब लड़की न अपने मायके में मुंह दिखाने लायक रह जाती है और न वह लड़का गुमराह की गई लड़की को सहारा देने की स्थिति में होता है। इस असमंजस में लड़की कभी-कभी अपनी इहलीला समाप्त करने वाला नासमझ कदम उठा लेती है। ऐसे में समाज का तिरस्कार और लुटी अस्मत का खामियाजा जिंदगी की राह को जलालत भरा बना देता है। इसमें संदेह नहीं है कि प्यार का आकर्षण एक स्वाभाविक क्रिया है, जो व्यक्ति में निहित अवगुणों को समझते हुए भी नहीं समझने देती। हितैषी अभिभावक अगर बहके कदमों को रोकने के लिए सिलसिलेवार बताता भी है, तो मन पर हावी प्रेम  रूपी रंग वे क्षीण नहीं होने देते। बुराइयों या अवगुणों का व्याख्यान करने वाला ही उनकी नजर में खलनायक जैसा उभरकर आने लगता है। अंततः प्रेमी, हितैषी मां-बाप और समाज को दरकिनार रखते हुए विवाह योग्य आयु न भी होने की परवाह किए बिना उनके बहके कदम गृह त्यागकर अनजानी दुनिया में खो जाने का उपक्रम करते हैं। तब या तो पुलिस का सहारा लेते हुए उनकी खोजबीन शुरू होती है या शर्मिंदगी को हृदय में दफन किए हुए, समाज में निरादर भरी जिंदगी को अपनाने के लिए मजबूर दिखते हैं। कुछ मां-बाप इस जलालत को सहन नहीं कर पाते और असमय संसार से मुख मोड़ लेते हैं। जबरदस्ती अलगाव को भी कई प्रेमी जीवन को दांव पर लगाने से नहीं चूकते। वर्तमान समय में पश्चिमी सभ्यता का रंग गहरा जरूर होता जा रहा है, परंतु हम उसका अनुकरण सही ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। लगता है कि जैसे कुछ छूटता जा रहा है। हां हमारी सभ्यता के फलस्वरूप मिले अच्छे संस्कार, मां-बाप गुरुजनों के प्रति गहरी आस्था और उनके जीवनोपयोगी सद्गुणों से लबालब संदेशों से हम दूर होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी में आज आवश्यकता है उन्हें हम अपने वैदिक ग्रंथों और मनीषियों के आचार-व्यवहार से परिचित करवाएं। संयम और प्रेम की सही परिभाषा से उनका पथ प्रदर्शन करें।

आज निःसंदेह हमें युवाओं के बहकते कदमों को सकारात्मक दिशा देने की आवश्यकता है। जहर घोलते मादक पदार्थों का समाज में चोरी छिपे उपयोग। अफीम, चरस व हेरोइन की विदेशों से तस्करी हमारी युवा पीढ़ी को गुमराह कर रही है। इसके वशीभूत समाज चरमरा रहा है तथा हमारे युवा मादक द्रव्यों के गहन अंधकार में डूबते जा रहे हैं। ऐसे में जिम्मेदार मां-बाप की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि बच्चों पर नजर रखें। उनके अकेलेपन को अन्यथा न लें। उनके दोस्तों के गुण-अवगुणों के बारे में जानकारी जुटाने पर ही उनको उनसे मिलने दें। इसमें तनिक संदेह नहीं कि अच्छी संगति और अच्छे मित्रों का संग व्यक्ति में अभूतपूर्व परिवर्तन और सकारात्मक सोच का विकास करता है। ऐसे कदम उठाते हुए बच्चों से मैत्रीपूर्ण सहयोग को तरजीह दें। गलतियों को सुधारने के लिए अथाह दंड का सहारा न लें, बल्कि प्रेमपूर्वक सहयोगी की तरह उनकी मनोदशा को सुधारने का प्रयास करें। अभिभावक अपनी नाउम्मीदी को उम्मीद में बदलने का गुण रखें, तो निःसंदेह कोशिश सफलता में परिणित होगी और बहकते कदमों को हम सकारात्मक दिशा जरूर देने में सक्षम होंगे।

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