‘सक्रिय प्रधानमंत्री’ का चुनावी पैंतरा!

By: Sep 17th, 2012 12:15 am

ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने मध्यावधि चुनावों की तैयारी कर ली है। यूपीए की परवाह किए बिना ही वह अब आर-पार की मनःस्थिति में महसूस होती है। हालांकि राजनीति इस आधार पर नहीं होती कि देखा जाएगा, सरकार को यह फैसला लेना ही है। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की स्पष्ट टिप्पणी सामने आई है कि बड़े और कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है। यदि सरकार को जाना ही है, तो वह लड़कर क्यों न जाए? नतीजतन फैसले देश के सामने हैं। खुदरा क्षेत्र में 51, विमानन में 49 और प्रसारण में 74 फीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को सरकार ने अनुमति दे दी है। दूसरी ओर, आर्थिक मजबूरी के मद्देनजर, डीजल 5 रुपए प्रति लीटर महंगा कर दिया गया है और रसोई गैस के सिलेंडर (साल में सिर्फ 6) पर राशनिंग थोप दी गई है। सातवां सिलेंडर 750 रुपए का मिलेगा। यानी सबसिडी समाप्त…। सरकार को जानकारी नहीं है कि कालाबाजारी इतनी है कि 80-90 रुपए प्रति किलो गैस बिक रही है और गैस का अधिकृत कनेक्शन न रखने वाले परिवारों को अब भी 1200-1300 रुपए में एक सिलेंडर खरीदना पड़ रहा है। आखिर सरकार किन्हें सबसिडी देती रही है? क्या नेताओं, सांसदों और धन्नासेठों के घर-दफ्तरों में इस्तेमाल किए जाने वाले गैस सिलेंडरों पर 32,000 करोड़ रुपए का घाटा है? क्या नवीन जिंदलों सरीखे अरबपति सांसद-उद्योगपति के घर एक साल में 369 सिलेंडर सबसिडी की कीमत पर गए या बाजार भाव से…? बेशक सबसिडी का बोझ करीब 2 लाख करोड़ का है। तेल कंपनियों का घाटा ही 1,67,000 करोड़ रुपए बताया जाता है। सरकार का आकलन यह भी है कि कीमतें बढ़ाने के बावजूद घाटा 20,300 करोड़ रुपए ही कम होगा, लेकिन आदमी क्या करे…? ये सरकारी अर्थशास्त्री आम आदमी की ‘जेब’ का हिसाब कैसे लगाते हैं? माना जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी करीब 85 फीसदी परिवार लकड़ी और उपले पर ही भोजन बनाते हैं और मात्र 9 फीसदी ही गैस का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन डीजल का अर्थशास्त्र तो स्पष्ट है कि उससे परिवहन, माल भाड़े, सब्जियां, फल, दालें और दूध आदि रोजमर्रा की सेवाएं और वस्तुएं महंगी होती हैं और किसान की फसल पर भी बुरा असर पड़ता है। इस तरह सरकार ने न केवल शहरी मध्यवर्ग को, बल्कि देश के आम आदमी को ‘निशाना’ बनाया है। शायद उसे उनके वोट अपेक्षित नहीं हैं! दरअसल डीजल का वर्गीकरण होना चाहिए। महंगी कारों के लिए महंगे डीजल का प्रावधान होना चाहिए और उसके तमाम चोर दरवाजे बंद किए जाने चाहिएं। घरेलू तथा किसानों के लिए विशेष परमिट बनाए जाने चाहिएं। सबसिडी किसी की निजी बपौती या कृपा नहीं है। सरकार बजट में कारपोरेट क्षेत्र के लिए 5 लाख करोड़ का विशेष प्रावधान रख सकती है, तो उस जनता के लिए सबसिडी बोझ कैसे बन सकती है, जिसके जनादेश पर सरकारें बनती हैं? एक और सवाल…सरकार धीरे-धीरे देश को मिट्टी के तेल से मुक्त करना चाहती है, लेकिन आम आदमी को भी 800 से 1200 रुपए में एक गैस सिलेंडर नसीब होगा, तो देश ‘कैरोसिनमुक्त’  कैसे हो पाएगा? दरअसल आर्थिक विकास, जीडीपी विकास दर और प्रगति की दलीलों की आड़ में सरकार आम आदमी की सांसें ही छीन लेने को आमादा है। दरअसल यह प्रधानमंत्री की सनक है, जो अब खुद को ‘सक्रिय’ साबित करना चाहते हैं और विदेशी मीडिया में फिसड्डी, निष्क्रिय और अनिर्णायक करार देने वाली तोहमतों को खारिज करना चाहते हैं। नीतिगत लकवेपन सरीखे आरोपों को भी झुठला देना चाहते हैं। लिहाजा अप्रत्याशित तौर पर शुक्रवार को कैबिनेट की बैठक बुलाई और तमाम कड़े आर्थिक फैसले ले डाले। कैबिनेट की बैठक अकसर गुरुवार को ही होती है। प्रधानमंत्री ने यहां तक कह दिया कि सरकार को जाना पड़े, तो लड़कर जाएंगे। यानी भ्रष्टाचार, घोटालों और नीतिगत शिथिलता के मुलम्मों की बजाय सरकार आर्थिक सुधारों पर शहादत की छवि के साथ जाना चाहती है। क्या सोनिया गांधी ने इसी आक्रामकता का पाठ पढ़ाया था? क्या राजनीतिक विश्वसनीयता खो चुकी कांग्रेस इन फैसलों के साथ चुनावों में उतरने का हौसला दिखा सकेगी और क्या उसे देश का जनमत हासिल होगा? इन सवालों के जवाब आने वाले कल में निहित हैं। लेकिन एक बेहद संवेदनशील और अनिवार्य पक्ष यह है कि देश को आर्थिक संतुलनों के लिए अमरीकी डालर की दरकार है और उन्हें हम छाप नहीं सकते। हमारे राजकोष में करीब 300 अरब डालर होंगे, जबकि चीन के पास एक खरब डालर से ज्यादा हैं। उसके पास डालर ऐसे हिलोरें मार रहे हैं कि चीन ने 400-500 अरब डालर अमरीकी ट्रेजरी बिल्स में निवेश कर रखे हैं। चीन कभी भी अमरीकी अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मचा सकता है। चूंकि हमें 82-84 फीसदी तेल का आयात करना पड़ता है, लिहाजा डालर हमारी पहली आर्थिक जरूरत है। लिहाजा उसके लिए एफडीआई अपरिहार्य है। उसी संदर्भ में खुदरा में वालमार्ट सरीखी अंतरराष्ट्रीय श्रृंखलाओं के संभावित निवेश को लेकर हायतौबा मची है। दरअसल उसके प्रभावों का पहले आकलन किया जाना चाहिए और बाद में प्रतिक्रियाएं आनी चाहिएं। वालमार्ट कोई ईस्ट इंडिया कंपनी नहीं है कि भारत जैसे विराट देश पर काबिज हो सके। बहरहाल इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर और बाहर आंदोलनात्मक स्थिति है। सपा और वामदलों के साथ बीजू जनता दल और तेलुगूदेशम पार्टी ने समर्थन का ऐलान किया है। यह लामबंदी बढ़ेगी और 2013 में ही किसी भी पराकाष्ठा तक जा सकती है।

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