सड़कों के खूनी समीकरण

(शगुन हंस, कांगड़ा)

इधर मुख्यमंत्री कर्मचारियों को खुश करने के लिए ग्रेड-पे पर मुहर लगा रहे थे, उधर 10 साल पुरानी एचआरटीसी की बस खस्ताहाल सड़क की वजह से 40 लोगों की मौत पर मुहर लगा रही थी। कर्मचारी मुख्यमंत्री की वाहवाही कर रहे थे, उधर मृतकों के परिजन अंधेरी खाई में अपनों को आवाज दे रहे थे, जिनमें से ज्यादातर आवाजें खामोश हो चुकी थीं। उस वाहवाही से क्या हासिल होगा, जिसमें चीखोपुकार की चर्चा ही न हो। घोषणाएं तब गलघोंटू बन जाती हैं, जब हकीकत कुछ और ही बयां करती हो। अभी चंबा हादसे के जख्म भी हरे ही तो हैं, अब यह आशापुरी का दर्दनाक हादसा। हिमाचल में हर चीज महंगी  है सिवाय जिदंगी के हर अधिकारी-कर्मचारी सिर्फ वेतन भत्तों पर भड़ास निकालता है कि कम हैं, पर इन मौतों के लिए जिम्मेदारी नहीं लेता। घर द्वार पर मंत्री नेता लोगों की समस्याएं सुनते हैं, कभी सड़कों, बसों, यातायात, ड्राइवरों-कंडक्टरों की तरफ गौर किया। यह कोई तर्क नहीं कि केंद्र से पैसा नहीं मिलता, पर यह तर्क भी तो है जो मिलता वह लैप्स हो जाता है। मुख्यमंत्री सांत्वना देंगे, मुआवजा देंगे, एक अधिकारी सस्पेंड होगा और जांच के लिए फाइल खुल जाएगी। फाइलें खोलने से कुछ नहीं होगा, होगा तो व्यवस्था सुधारने से ही, वरना ये पुरानी बसें, खस्ताहाल सड़कें और गहरी खाइयां कितनी ही आवाजें खामोश करती रहेंगी। बजट का 60 फीसदी कर्मचारियों के वेतन भत्ते खा जाते हैं, कुछ मुआवजे में चला जाता है, कुछ कर्ज की किस्त चुकाने में। बचे हुए 20-30 फीसदी वजट से हम विकास की उम्मीद कर रहे हैं, अगर वजट का अनुपान यही रहेगा तो सड़कें मौत बांटती रहेंगी और मुआवजे बंटते रहेंगे।

 

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