सड़क से रेलिंग साफ, बोर्ड से ‘चेतावनी’ गायब

कांगड़ा — कुदरत का करिश्मा कहें या माता बज्रेश्वरी देवी की कृपा वशिष्ठ परिवार पर हुई और वे सभी लोग बच गए। अलबत्ता खूनी बनेर खड्ड पिछले दो दशकों में दो दर्जन से भी अधिक लोगों को लील चुकी है। अधिकांश लोग ऐसे थे जो आए तो मीलों दूर से माता के दर्शनों के लिए और उनकी लाशें ही उनके घर पहुंचीं। मंगलवार को भी वही घटनाक्रम हुआ, जीरकपुर से आए एक ही परिवार के छह सदस्य बनेर खड्ड में उतरे और हादसे का शिकार बन गए। कांगड़ा के गांव नंदरूल व इसके आसपास के चार लेग मौके पर मौजूद थे और उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना वशिष्ठ परिवार के सदस्यों को बचा लिया। इस बार एक बड़ा हादसा इन लोगों की वजह से टल गया, लेकिन सवाल उठता है कि बनेर खड्ड में उतरने और उसमें बह कर मौत का शिकार होने का सिलसिला जारी रहेगा या इस पर सरकारी तंत्र कोई ठोस प्रयास करेगा। दीगर है कि यहां जब भी श्रद्धालु मौत का शिकार होते हैं तो प्रशासन घोषणा कर देता है कि बचाव के कोई ठोस प्रयाए किए जाएंगे, लेकिन मौतों का यह सिलसिला यथावत जारी है। कुछ वर्ष पूर्व सड़क किनारे लगाई गई रेलिंग अब उखड़ चुकी है। यहां लगाया गया चेतावनी बोर्ड भी गायब है। यहां जो प्रशासन ने पहले चेतावनी बोर्ड लगाया गया था वह सड़-गल गया है। लिहाजा उस पर लिखी चेतावनी पढ़ पाना मुश्किल है। अब वह बोर्ड भी उखड़ चुका है। यहां श्रद्धालु बनेर खड्ड में न उतरें, इसके लिए बड़े चेतावनी बोर्ड, रेलिंग व पुलिस का पहरा लगाने की जरूरत है। दीगर है कि श्रद्धालुओं को प्रकृति का यह नजारा अच्छा लगता है और चेतावनियों के बावजूद उनके कदम बनेर खड्ड में जाने से नहीं रुक पाते, लेकिन दूसरा पहलू यह है कि क्या करोड़ों रुपए श्रद्धालुओं से कमाने वाला मंदिर ट्रस्ट इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर सकता। ‘दिव्य हिमाचल’ बाण गंगा को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का मसला प्रमुखता से उठा चुका है। बाण गंगा में खुले स्नानघाट बनाकर इस समस्या का हल किया जा सकता है।

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