सत्ता पर शिमला

प्रदेश की सियासत में राजधानी शिमला का खास रोल है। अब तक आठ बार शिमला से ही मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। हॉट चेयर पर कब्जा करने में वीरभद्र सिंह टॉप पर रहे हैं। उनसे पहले डा. यशवंत सिंह परमार शिमला संसदीय क्षेत्र से यह गौरव राजधानी को दिलाते रहे। स्वर्गीय ठाकुर रामलाल भी शिमला की शान बढ़ाने में आगे रहे। डा. परमार के बाद वह शिमला जिला से पहले मुख्यमंत्री व संसदीय क्षेत्र से दूसरे सीएम बने। उन्होंने तीन दफा हॉट चेयर संभाली। शिमला जिला को प्रदेश की राजनीति की धुरी माना जा सकता है। स्वर्गीय डा. यशवंत सिंह परमार के बाद शिमला जिला के पास लगातार आठ दफा सीएम की कुर्सी रही, जो इतिहास में सबसे लंबा समय है। इसमें कांग्रेस का ही दबदबा रहा क्योंकि परमार, रामलाल और वीरभद्र ंिसंह प्रदेश की सियासत के अहम किरदार रहे हैं। यहां कांग्रेस का गठन स्वर्गीय परमार से माना जाता है और कांगे्रस ने ही हिमाचल की सियासत में अधिकतर समय तक राज किया। प्रदेश की राजनीति में जिला के योगदान की बात करें तो 28 जनवरी, 1977 को पहली दफा स्वर्गीय रामलाल ने मुख्यमंत्री पद की कुर्सी हासिल की, जिसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। हालांकि वह पहली दफा तीन महीने तक ही मुख्यमंत्री रहे और 30 अप्रैल, 1977 को उनकी सरकार भंग हो गई।  इसके बाद वह दोबारा से मुख्यमंत्री बने जो लगातार तीन दफा मुख्यमंत्री रहे।  हिमाचल की राजनीति में आने से पहले वीरभद्र सिंह केंद्र सरकार में राज्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने आठ अप्रैल 1983 में पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली जो स्वर्गीय रामलाल के पास थी। केंद्र सरकार ने उन्हें हिमाचल का मुख्यमंत्री बनाया और रामलाल को बाद में गवर्नर की कुर्सी दी गई। शिमला जिला में कांग्रेस के कद्दावर नेता स्वर्गीय जय बिहारी लाल खाची  ने भी वीरभद्र सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा था। वर्ष 1962 में खाची ने लोकसभा का चुनाव उनके खिलाफ लड़ा लेकिन वह हार गए। इसके साथ वह विधानसभा का चुनाव भी लड़ रहे थे, जिसमें हरदयाल चौहान ने उन्हें हराया।

एक नजर में शिमला

  शिमला संसदीय क्षेत्र से पहले मुख्यमंत्री बने डा. यशवंत सिंह परमार

  8 दफा शिमला से मुख्यमंत्री

  हर बार कांग्रे्रस की ही रही राजगद्दी

  जिला को पहली बार 1977 में मिली हॉट चेयर

  28 जनवरी, 1977 को ठाकुर रामलाल बने सीएम

  रामलाल ने तीन बार संभाली सीएम की कुर्सी

  गवर्नर के पद पर भी रहे रामलाल

  08 अप्रैल, 1983 को पहली बार मुख्यमंत्री बने वीरभद्र

1967 से पहले

शिमला के तहत रोहडू व चौपाल विधानसभा क्षेत्र, जिसमें कई दूरवर्ती इलाके फैले हैं, वर्ष 1967 से पहले जनजातीय क्षेत्रों में शामिल थे। इन दोनों चुनाव क्षेत्रों में चुनाव जनजातीय क्षेत्रों के साथ होते थे, जिसे बाद में अलग कर दिया गया।

कुसुम्पटी सीट

1967 तक कुसुम्पटी विधानसभा क्षेत्र आरक्षित नहीं था। यह सीट ओपन थी, जहां से इस साल पंडित सीताराम जीते थे। उनकी जीत के बाद से आज तक यह सीट आरक्षित रही है, जिसे अब दोबारा से ओपन कर दिया गया है।

भाजपा-कांग्रे्रस बराबर

शिमला विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस व भाजपा का बराबर दबदबा रहा है। यहां से कांग्रेस के ज्ञान चंद टुटू, हरभजन सिंह भज्जी, आदर्श सूद चुनाव जीते हैं। भज्जी तीन दफा विधायक रहे। भाजपा की तरफ से दौलत राम चौहान, सुरेश भारद्वाज, नरेंद्र बरागटा विधायक रहे। भारद्वाज दो दफा यहां से जीते। एक दफा कम्युनिस्ट पार्टी के राकेश सिंघा भी विधायक चुने गए हैं।

जिला के विधायक

वर्तमान की शिमला ग्रामीण और पूर्व की कुमारसैन-सुन्नी सीट से जय बिहारी लाल खाची, विद्या स्टोक्स, भगत राम वर्मा विधायक रहे। रोहडू से वीरभद्र सिंह व खुशी राम बालनाटाह, रामपुर से सिंघी राम व नंद लाल, चौपाल से राधा रमण शास्त्री, सुभाष मंगलेट, ठियोग से केवल राम चौहान, विद्या स्टोक्स, राकेश वर्मा, कुसुम्पटी से पंडित सीता राम, शौंकिया राम, रूपदास कश्यप, बालक राम, सोहन लाल विधायक रहे हैं। जुब्बल-कोटखाई से रामलाल ठाकुर के अलावा  रोहित ठाकुर व नरेंद्र बरागटा विधायक रहे। जिला के अधिकांश विस क्षेत्रों में कांग्रेस का दबदबा रहा है।

वीरभद्र-धूमल करेंगे नेतृत्व

कांग्रेस अध्यक्ष वीरभद्र सिंह शिमला जिला में तो पार्टी का नेतृत्व करेंगे ही, वहीं प्रदेश का नेतृत्व भी उनके ही हाथ में है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल प्रदेश के साथ-साथ शिमला जिला का नेतृत्व भी करेंगे। हालांकि यहां पर टिकट आबंटन व प्रचार में नरेंद्र बरागटा का पूरा दबाव रहेगा, मगर कुल मिलाकार मुख्यमंत्री धूमल ही चुनाव का नेतृत्व करेंगे।

राजा को घोषणाओं की टेंशन नहीं

केंद्र सरकार में बतौर मंत्री रहे वीरभद्र सिंह ने प्रदेश के लिए कई घोषणाएं कीं, लेकिन उनका असर शिमला जिला की राजनीति में देखने को नहीं मिलेगा। वीरभद्र सिंह के पास पहले स्टील मिनिस्ट्री थी, जिसके तहत उन्होंने नाहन, मंडी व कांगड़ा जिला में स्टील प्लांट स्थापित करने को लेकर प्रदेश सरकार ने जमीन मांगी। उनके कार्यकाल में यहां पर स्टील मंत्रालय की टीमें तीन दफा दौरा करके गईं और समय-समय पर सरकार से बातचीत भी हुई। मुद्दा यही रहा कि प्रदेश सरकार ने जरूरी जमीन उपलब्ध नहीं करवाई, जिसके आरोप खुद वीरभद्र सिंह ने लगाए हैं। शिमला जिला में उनकी ऐसी कोई घोषणाएं नहीं थीं, जिन्हें वह केंद्रीय मंत्री रहते पूरा कर सकते।

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