सरकारी स्कूलों में अध्यापकों के बच्चों का पढ़ना अनिवार्य हो

Sep 5th, 2012 12:10 am

लेखक, गायत्री दत्त पंडित, जोगिंद्रनगर मंडी से हैं}

जहां भारत सरकार शिक्षा के प्रति जागरूक है, वहीं हर व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाएं, यदि बच्चे ही नहीं होंगे तो अध्यापक को नौकरी कहां मिलेगी…

शिक्षा का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। बच्चों को जहां प्राइमरी कक्षाओं में 20 तक पहाड़ों का ज्ञान होता था, वह कम हो गया। 1/2, 3/4 तक का पहाड़ा छात्र जानते ही नहीं। दुख की बात है कि सरकारी अध्यापकों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं, जहां भारी फीस दी जाती है। सरकारी स्कूलों में जहां फीस नाममात्र, दोपहर का भोजन, मुफ्त वर्दी फिर भी अध्यापकों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों की ओर जा रहे हैं। इसका कारण देखें तो सरकार भी दोषी है। सरकारी स्कूलों में स्टाफ की कमी। स्थानांतरण होने पर कई वर्षों तक अध्यापक का न आना। अध्यापकों का 50-60 किलोमीटर दूरी से रोजाना स्कूल आना। जनगणना, वोटर लिस्ट, चुनाव तथा कई प्रकार के कामों में अध्यापकों की नियुक्ति करना बीआरसी के पद पर स्कूल में अध्यापकों की पोस्ट खाली रहना। इस तरह कई कारणों से कर्मचारी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं। दिन-प्रतिदिन सरकारी स्कूल खाली हो रहे हैं। स्कूल के कमरों में कुत्ते, गाय, भैंस तथा गंदगी का ढेर पड़ा दिखाई देगा। मंडी टाउन के सैन मोहल्ला में स्कूल भवन बेकार पड़ा है। तुगलघाटी का गत्रवाल में ताले लगे हैं। जहां भारत सरकार शिक्षा के प्रति जागरूक है, वहीं हर व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाएं, यदि बच्चे ही नहीं होंगे तो अध्यापक को नौकरी कहां मिलेगी? आज प्राथमिक सरकारी अध्यापक का वेतन 18000 से शुरू  होता है। यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले को 20 अंक मैरिट में रखे जाएं, तो दूसरे दिन ही सरकारी स्कूलों में प्रवेश शुरू होगा। सरकारी स्कूलों का वर्ष में दो बार डिप्टी डायरेक्टर द्वारा निरीक्षण करना अनिवार्य होना चाहिए, ताकि अध्यापक अपने कर्त्तव्य को पूरा करने में तत्पर रहे। आज से कुछ वर्ष पूर्व डीआईएस और एडीआईएस होते थे, वे स्कूलों में छापे मारते थे, उन्हें शौक होता था कि हम छापा मार कर अध्यापकों को पकड़ें, ताकि भय बना रहे। अब बुढ़ापे में डिप्टी डायरेक्टर व बीपीईओ बनते हैं, उन्हें इस उम्र में कई प्रकार की बीमारी लग जाती हैं। आजकल बीपी, हार्ट, शुगर आम बात है। कई अपने बच्चों से परेशान, कई घरेलू परिस्थितियों से परेशान नजर आते हैं। यदि नौजवानों को फ्लाइंग स्क्वाड की तरह नियुक्त किया जाए, जो रोजाना स्कूलों की चैकिंग करें तो शिक्षा का ढांचा ही बदल जाएगा। जब हिमाचल प्रदेश में टेरी टोरियल काउंसिल थी, उस समय प्रेेमराज महाजन चीफ एग्जीक्यूटिव आफिसर होते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में शिक्षा के सुधार में बड़ा योगदान दिया। वह सुबह ही स्कूल लगने से पहले स्कूल में पहुंच जाते थे, तुरंत कार्रवाई अच्छी-बुरी कर देते थे। दोषी को सजा तथा अध्यापकों की पीड़ा को समझते, उनका निवारण करते थे। हिमाचल सरकार को चाहिए कि वे डिप्टी डायरेक्टर द्वारा वर्ष में कितने स्कूलों का निरीक्षण करते हैं, जानकारी लें। अतः मेरा सरकार से अनुरोध है कि सरकारी कर्मचारी के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य हों। जो स्कूल सड़क से ऊंचाई पर बने हैं, वहां पर किसी अधिकारी का पहुंचना ही कठिन है, क्योंकि वे चढ़ाई चढ़ने में असमर्थ होते हैं। जहां अधिकारी बनने का शौक सभी को होता है, परंतु वे अपने कर्त्तव्य का भी ध्यान रखें। जब तक नौजवान अधिकारी निरीक्षण करने वाला नहीं होगा, तब तक उन स्कूलों में जो सड़क से एक-दो किलोमीटर दूर हैं, कोई भी डिप्टी डायरेक्टर नहीं जा पाएगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि जिस तरह एसडीएम या डीसी नौजवान युवक लगे होते हैं और वे  मंत्री से पहले अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचते हैं, उसी प्रकार शिक्षा विभाग में भी नौजवान अधिकारी लगाया जाए। सर्वशिक्षा अभियान के तहत बजट स्कूलों में आता है। इससे मिड-डे मील का दायित्व अध्यापक पर दिया गया है। यह भी किसी प्राइवेट संस्था को दिया जाए, ताकि अध्यापक छात्रों को अपना अधिक से अधिक समय दे सकें। अभिभावक तो अपने बच्चे की पढ़ाई चाहते हैं, तभी सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ेगी। प्राइवेट स्कूलों में जो अध्यापक नियुक्त किए जाते हैं, उन्हें यह शर्त लागू होती है कि उनका बच्चा उसी पाठशाला में दाखिल करना होगा, नहीं तो नियुक्ति रद्द की जाएगी। ऐसा ही कानून सरकारी स्कूलों में लाया जाए। सरकारी स्कूलों के बच्चे भी आईएएस, एचएएस या मिलिट्री के अच्छे रैंक पा सकते हैं और यह सब तभी हो सकता है, जब स्कूल में पढ़ाई पर गौर किया जाए।

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