सामाजिक उत्तरदायित्व की चुनौतियां

{पीके खुराना,लेखक, एक वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं}

भारतीय कंपनियों में दान की परंपरा तो है, पर दान का कारपोरेटाइजेशन नीतिगत रूप में लागू नहीं है, बल्कि बहुत सी भारतीय कंपनियां तो सेवा कार्य के कारपोरेटाइजेशन यानी कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी (कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के विचार के ही विरुद्ध हैं। बहुत से केंद्रीय मंत्रियों ने कई बार बड़ी कंपनियों को कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी को नीति के रूप में स्वीकार करने की सलाह दी है…

भारतीय संस्कृति में दान की बहुत महिमा गाई गई है। बड़े-बड़े व्यवसायियों ने मंदिर बनवाए हैं, धर्मशालाएं बनाई हैं और लंगर चलाए हैं। ऐसे हर व्यक्ति की नीयत यही रही है कि जिस समाज ने उन्हें इतना कुछ दिया है, उसके भले के लिए वे भी कुछ कर सकें। बहुत से व्यवसायी बिना किसी लालच के तीर्थ स्थलों पर नियमित रूप से लंगर चलाते हैं। यह हमारी संस्कृति का ही गुण है कि गरीब से गरीब व्यक्ति भी अवसर आने पर दान-पुण्य करना चाहता है। ब्राह्मण भोज, दान-दक्षिणा, मंदिरों में दान, गुप्तदान आदि कई स्वरूपों में दानियों ने समाज को कुछ देने का प्रयत्न किया है। ऐसे ज्यादातर मामलों में दानी का कोई स्वार्थ नहीं होता। यह दान श्रद्धावश किया जाने वाला कार्य है। दान की इस परंपरा का ही प्रभाव है कि किसी अपंग, बूढ़े अथवा गरीब भिखारी को देखकर हमारे मन में दया आ जाती है और हम पुण्य कमाने के लिए अथवा दयावश, उसे कुछ पैसे दे देते हैं। दान की इस धनराशि से हमें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर उस गरीब की सहायता हो जाती है। पश्चिमी समाज में दान को कारपोरेटाइज कर दिया गया है और वहां मजबूत ग्राहक आंदोलन के दबाव में बड़ी कंपनियों ने सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्वहन के रूप में जनहित के कार्य करना अपनी नीति में शामिल कर लिया है।

उसके लिए ज्यादातर कारपोरेट कंपनियां गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ) की सहायता लेती हैं। इसके विपरीत भारत में प्राचीन समय से ही स्वयंसेवी संस्थाओं की परंपरा रही है जो अपने सदस्यों अथवा समाज से प्राप्त दान के बल पर जनहित के कार्य करती हैं। ये एनजीओ नहीं हैं, बल्कि स्वयंसेवी संस्थाएं हैं। एनजीओ का चरित्र भिन्न होता है। एनजीओ जनहित के कार्यों में संलग्न होता है, परंतु आधुनिक एनजीओ वस्तुतः व्यावसायिक संस्थाएं ही हैं। कुछ एनजीओ सिर्फ कागजी काम करते हैं और ग्रांट और दान बटोरते रहते हैं, कुछ एनजीओ सचमुच काम करते हैं और ग्रांट और दान बटोरते हैं। कुछ एनजीओ सचमुच सेवाभाव से चलते हैं पर ज्यादातर एनजीओ सेवा के नाम पर व्यावसायिक संस्थान ही हैं जो ग्रांट, दान के अलावा ऊंची फीस के बदले में ‘सेवा कार्य’ करते हैं। पश्चिमी और भारतीय संस्कृतियों में सोच के इस अंतर का परिणाम यह है कि बहुत सी भारतीय कंपनियों में दान की परंपरा तो है, पर दान का कारपोरेटाइजेशन नीतिगत रूप में लागू नहीं है, बल्कि बहुत सी भारतीय कंपनियां तो सेवा कार्य के कारपोरेटाइजेशन यानी कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी (कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के विचार के ही विरुद्ध हैं। बहुत से केंद्रीय मंत्रियों ने कई बार बड़ी कंपनियों को कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) को नीति के रूप में स्वीकार करने की सलाह दी है। अभी तक इस सलाह पर भारतीय कंपनियों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। शायद उनका यह मानना है कि दान स्वतः-स्फूर्त है, श्रद्धावश किया गया कार्य है, उस पर किसी का कोई दबाव नहीं है जबकि कारपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी के बारे में बाहरी दबाव होता है। यह कंपनियों द्वारा अच्छा दिखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा मात्र है और अभी ज्यादातर भारतीय कंपनियां इस विचार को नीतिगत स्तर पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं लगती हैं। तो भी चूंकि उदारीकरण के बाद अब भारत में बहुत सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी कार्यरत हैं और वे नीतिगत रूप से सीएसआर के लिए बजट बनाती हैं तो सामुदायिक विकास की बहुत सी योजनाएं इन कंपनियों के सहारे भी चलती हैं। सरकार की ओर से सामुदायिक विकास की बहुत सी योजनाएं चलती हैं, कुछ अच्छे एनजीओ भी सामुदायिक विकास के लिए बहुत कुछ करते रहते हैं और इसी क्रम में बहुत सी कंपनियां भी सामुदायिक विकास की गतिविधियां चलाती हैं। सीएसआर यद्यपि जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए किए जाने वाले कार्य हैं तो भी इनके लिए बहुत से बाहरी दबाव काम करते हैं। विभिन्न प्रेशर ग्रुप, एनजीओ, मानवाधिकार संगठन एवं संस्थाएं, राजनीतिक व्यक्ति और दल तथा सरकारें अलग-अलग तरीकों से इन कंपनियों की सीएसआर नीतियों को प्रभावित करते हैं या प्रभावित करने का प्रयत्न करते हैं।

केंद्र सरकार के कई मंत्री अलग-अलग समय पर इस बारे में कह चुके हैं लेकिन अभी तक उनका मत यही रहा है कि हर बड़ी कंपनी को सामाजिक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए और यह उसकी नीति में शामिल होना चाहिए। यहां तक तो सब ठीक है कि सरकार, बड़ी कंपनियों से सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने की आशा करे लेकिन छत्तीसगढ़ में इससे भी आगे बढ़कर सरकार यह मानती है कि कंपनियां सामाजिक उत्तरदायित्व के लिए एक निश्चित बजट तय करें और वह बजट खुद खर्च करने के बजाए सरकार को सौंप दें और सरकार उसे अपनी नीति, अथवा आवश्यकता के अनुसार जहां चाहे, जितना चाहे, वैसे खर्च करे। छत्तीसगढ़ सरकार के बड़े अधिकारी इसके लिए बाकायदा कंपनियों के उच्चाधिकारियों को बातचीत के लिए बुलाकर उन्हें विभिन्न काम सौंपते हैं और यदि कंपनियों की तरफ से कोई आनाकानी की जाए तो उन्हें तंग करने के हर संभव तरीके अपनाए और आजमाए जाते हैं। भारतवर्ष में उदारीकरण की शुरुआत के बावजूद अभी तक सरकार के हाथ में इतने अधिकार हैं कि सरकार की मर्जी के बिना उद्योग चलाना लगभग असंभव है। यही कारण है कि कंपनियों को सरकार और सरकारी अधिकारियों की ब्लैकमेलिंग को बर्दाश्त करना पड़ता है। यह एक जाना-माना तथ्य है कि बड़े सरकारी अधिकारी और राजनीतिज्ञ लगभग हर उद्योग से वसूली करते हैं। समस्या यह है कि धन की भूखी सरकार, राजनीतिज्ञ, राजनीतिक दल और सरकारी अधिकारी अब सीएसआर गतिविधियों में भी अपनी दखल चाहते हैं। यदि कंपनियों द्वारा सीएसआर पर लगाया जाने वाला धन भी सरकार के माध्यम से खर्च होने का प्रावधान बन जाए तो परिणाम यह होगा कि उसका 5 से 10 प्रतिशत हिस्सा भी मुश्किल से ही जनकल्याण कार्यों में लगेगा और शेष धन बिचौलियों की जेब में जाने लगेगा और सीएसआर का चरित्र ही बदल जाएगा। छत्तीसगढ़ में अगले साल चुनाव होने वाले हैं और सरकार यह दिखाने के प्रयत्न में है कि उसने बहुत से जनहितकारी कार्य किए हैं लेकिन जनकल्याण के इन कार्यों को करने के लिए वह विभिन्न कंपनियों पर दबाव बना रही है। अभी तो एक ही राज्य इस दिशा में सक्रिय प्रयत्न कर रहा है, यदि अन्य राज्यों ने भी इसे अपना लिया तो यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी और सारे समाज को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा और यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होगी।

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