सुरक्षा के लिए खतरा

Sep 8th, 2012 12:15 am

आंतरिक  सुरक्षा का प्रश्न काफी समय से आम चिंता का विषय रहा है। पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने पुलिस महा निदेशकों के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए भी इस बारे में देश को आगाह किया ही था। खुफिया विभाग के निदेशक नेहचल ने जिन बातों की ओर इशारा किया है, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने जहां साइबर मीडिया के जरिए सांप्रदायिकता और आतंकवाद फैलाने के मामले को आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बताया है, वहीं इसे सुरक्षा तंत्र के लिए एक नई चुनौती की संज्ञा भी दी है। असम में पिछले दिनों जिस तरह पाकिस्तान से भेजे गए एसएमएस और वेबसाइटों के जरिये पूर्वोत्तर के प्रदेशों के खिलाफ दहशत फैलाने के प्रयास हुए थे, उसका नतीजा देश देख चुका है। बड़ी कठिनाई से इस किस्म की दहशत और कर्नाटक, महाराष्ट्र व अन्य राज्यों से पूर्वोत्तर के लोगों का पलायन रोका जा सका है। इसके बावजूद कहीं न कहीं उसकी एक प्रतिक्रिया दिखाई देती है, जो सामाजिक सद्भावना के खिलाफ जाती है। मिसाल के तौर पर अब स्वयं पूर्वोत्तर में यह भावना घर करने लगी है कि राज्य से बाहर के लोगों को वहां न रहने दिया जाए या काम धंधे पर रखा जाए आदि। यहां गृह मंत्री की इस चिंता से सहमत हुआ जा सकता है कि सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल रुकना चाहिए और ऐसे वेबसाइटों पर निगाह रखी जाए। इस वजह से सरकार जिन 100 वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगा चुकी है, उनमें से अधिकतर पाकिस्तान की हैं। इससे पाकिस्तान की देश में अशांति फैलाने की मंशा तो साफ होती ही है। यह भी प्रतीत होता है कि देश का सुरक्षा तंत्र प्रारंभ में इस मोर्चे पर उतना कामयाब नहीं रहा है, जितना होना चाहिए था। पाकिस्तान ने इन आरोपों को नकारकर अपना पिंड भले ही छुड़ाया हो, वह इस पर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता। जैसा कि आईबी के निदेशक ने भी माना है कि कोशिश यह होनी चाहिए कि ऐसे संदेश न केवल रुक पाएं, उससे जुड़े लोगों को भी बेनकाब किया जाए। देश के लिए हर साल आतंरिक सुरक्षा संबंधी चुनौती क्यों न खड़ी हो रही हो, देश तकनीक व तैयारी की दृष्टि से उस पर काबू पाने की क्षमता रखता है। प्रश्न एक सुनियोजिक कार्यनीति तय करने का है। इसे एक विडंबना ही कहा जाएगा कि आतंकवाद पर काबू पाने के लिए राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी केंद्र (एनसीटीसी) की स्थापना केंद्र व राज्यों के बीच विवाद के कारण ठंडे बसते में चली गई। इस बीच साइबर आतंकवाद जैसी स्थितियां चुनौती बन कर उभरी हैं। आईबी प्रमुख द्वारा पुलिस महा निदेशकों के सम्मेलन के दौरान दी गई यह जानकारी भी कम चिंताजनक नहीं है कि जम्मू-कश्मीर में लश्कर और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तानी संगठन अपनी पकड़ मजबूत बनाने में लगे हैं। यह भी कि पंजाब में भी पुराने आतंकी संगठन पैर पसारने की कोशिश में हैं। यह देश के सुरक्षा तंत्र की वास्तविक चिंता का प्रश्न होना चाहिए। प्रश्न जम्मू-कश्मीर का हो या पूर्वोत्तर अथवा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का, ऐसी हर कोशिश को नाकाम बनाने की जरूरत है जो देश को अशांति व अस्थिरता की ओर धकेलती हो या राष्ट्रीय एकता की सोच को कमजोर बनाती हो। उस लिहाज से पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन पर उभरी राय देश को नई रणनीतिक नीतियां दे पाएगी, यह उम्मीद तो की जा सकती है। इसकी आज बड़ी जरूरत भी है।

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