स्वीकार करना होगा पलायन

By: Sep 18th, 2012 12:15 am

(डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज की असल दिशा आर्थिक परिस्थितियों से बनती है। आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल संस्कृति एवं विचारधाराएं बनने लगती हैं। जैसे महाराष्ट्र में किसी समय बेरोजगारी न्यून थी। उस समय बिहारी श्रमिकों का स्वागत किया गया। समय क्रम में परिस्थितियां बदल गई हैं। आज महाराष्ट्र में रोजगार का अभाव है, इसलिए वहां बिहारियों के खिलाफ मुहिम ने जन्म लिया है…

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे ने मुंबई में रहने वाले बिहारियों के विरुद्ध मोर्चा खोला है। असम में बांग्लादेश से प्रवेश किए लोगों के विरुद्ध स्थानीय बोडो लोगों की मुहिम जारी है। पूर्व में भारतीय लोगों का केन्या, दक्षिण अफ्रीका, गयाना एवं फिजी को पलायन हुआ था। अफ्रीका से ब्लैक एवं यूरोप से व्हाइट लोग बड़े पैमाने पर अमरीका को पलायन किए थे। आज उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका इन्हीं लोगों से भरपूर है। उस समय यूरोप में जनसंख्या का दबाव था। अतः लोगों ने अपनी जन्म भूमि को छोड़कर नए देश में अपना भाग्य अजमाने को तैयार हुए। भारत, चीन एवं फिलीपींस से वर्तमान में अमरीका को शिक्षित लोगों का पलायन जारी है। भारत में आय कम एवं अमरीका में अधिक होने से इन्हें पलायन रास आता है। पलायन का आधार जनसंख्या एवं जमीन में असंतुलन है। वर्तमान में भारत में डाक्टर तथा इंजीनियर की संख्या अधिक है, जबकि अमरीका में इनकी कमी है। ऐसे में पलायन से मानव समाज को लाभ होता है। भारत में डाक्टरों की संख्या अधिक है, इनमें से कुछ का अमरीका पलायन करने से भारत में विशेष अंतर नहीं पड़ता है। इसके विपरीत अमरीका में डाक्टरों की शार्टेज है। वहां कुछ डाक्टरों के प्रवेश करने से भारी अंतर पड़ता है। यूं समझें कि भारत से आम के 100 कंटेनर अमरीका भेज दिए जाएं तो यहां के आम के दामों में एक या दो रुपए की ही वृद्धि होगी, परंतु 10 कंटेनर आम के अमरीका पहुंचने से वहां आम का दाम 200 रुपए प्रति आम से घटकर 100 रुपए प्रति आम रह जाएगा। इसी सिद्धांत के अनुसार मंडी में आम का वितरण होता है। बाजार के माध्यम से हुए इस वितरण से जनकल्याण अधिकतम हासिल होता है। यह बात पलायन पर भी लागू होती है। इसी बात को दूसरी तरह समझा जा सकता है। हमारी सरकार सीधे विदेशी निवेश को आकर्षित करने को आतुर है। विदेशी पूंजी एवं तकनीक को सस्ते भारतीय श्रमिक के साथ संयोग होने से उत्पादन लागत सस्ती होती है, माल का उत्पादन बढ़ता है और उपभोक्ता को सस्ता माल मिलता है, लेकिन विदेशी पूंजी एवं तकनीक का भारतीय श्रम के साथ यह संयोग भारतीय श्रमिक के पलायन के द्वारा भी स्थापित होता है। घास को गाय के पास ले जाएं अथवा गाय को घास के पास ले जाएं, अंतिम परिणाम एक ही होता है। इसी प्रकार पूंजी अथवा श्रम के पलायन का परिणाम एक ही होता है। महाराष्ट्र में बसे बिहारियों की महाराष्ट्र को जरूरत थी, इसीलिए उन्हें बिहार से बुलाया गया था। इंस्टीच्यूट आफ  डिफेंस स्टडीज की नम्रता गोस्वामी कहती हैं- ‘सच यह है कि असम में बांग्लादेश से आने वाले अकुशल श्रमिकों की मांग है।’ इसी प्रकार की मांग के कारण संपूर्ण विश्व में सदा पलायन होता आया है और आज भी हो रहा है। श्रमिकों के पलायन का दूसरा पक्ष सामाजिक एवं सांस्कृतिक है। विदेशी श्रमिकों के प्रवेश करने से घरेलू संस्कृति पर दबाव पड़ता है। जैसे असम में मुसलमान बंगलादेशी श्रमिकों के प्रवेश से हिंदू धर्मावलंबियों का बहुमत क्षीण होता है अथवा अमरीका के दक्षिणी हिस्सों में मैक्सिको से भारी संख्या में स्पैनिश भाषा बोलने वाले लोगों का प्रवेश हुआ है। कई शहरों में स्पेनिश बोलने वाले बहुसंख्यक हो गए हैं। ऐसे में अमरीका की मूल अंग्रेजी भाषा पर दबाव पड़ता है। जिन देशों की ओर पलायन होता है, उन्हें तय करना होगा कि वे आर्थिक विकास को अधिक महत्त्व देंगे अथवा संस्कृति को? कार्ल मार्क्स ने कहा था कि समाज की असल दिशा आर्थिक परिस्थितियों से बनती है। आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल संस्कृति एवं विचारधाराएं बनने लगती हैं। जैसे महाराष्ट्र में किसी समय बेरोजगारी न्यून थी। उस समय बिहारी श्रमिकों का स्वागत किया गया। समय क्रम में परिस्थितियां बदल गई हैं। आज महाराष्ट्र में रोजगार का अभाव है, इसलिए वहां बिहारियों के प्रति मुहिम ने जन्म लिया है। इसी प्रकार पूर्व में असम में बांग्लादेशी श्रमिकों की जरूरत थी, तब उनका स्वागत हो रहा था। आज उन श्रमिकों ने पैसा कमा लिया है। अब ये हिंदुओं की जमीन खरीदने को उद्यत हैं, इसलिए इनका विरोध जोर पकड़ रहा है। मेरा मानना है कि अंततः आर्थिक वस्तुस्थिति ही प्रभावी होती है। यही कारण है कि विश्व में सदा पलायन होता आया है और लोगों का डिर्पोटेशन सफल नहीं हुआ है। जैसा ऊपर बताया गया है कि अमरीका के कई क्षेत्रों में स्पेनिश बोलने वालों का बहुमत स्थापित हो गया है। राष्ट्रपति ओबामा ने गैर कानूनी ढंग से प्रवेश किए इमिग्रेंट लोगों को जबरन वापस मैक्सिको भेजने का कार्यक्रम चलाया है, परंतु जितने लोगों को वापस भेजा जाता है, उससे ज्यादा प्रवेश कर रहे हैं। असम की स्थिति ज्यादा कठिन है, चूंकि बांग्लादेश इन लोगों को वापस स्वीकार करने को तैयार नहीं है। बांग्लादेश का कहना है कि इनके बांग्लादेशी नागरिक होने का प्रमाण हो तो इन्हें वापस प्रवेश दिया जा सकता है, परंतु बांग्लादेश से आने वाले अपनी बांग्लादेशी नागरिकता का प्रमाण क्योंकर रखने लगे? इसलिए उनका डिर्पोटेशन लगभग असंभव है, बिलकुल उसी तरह जैसे नदी के पानी के समुद्र में मिलने के बाद उसका वापस आना नामुमकिन होता है। मेरा मानना है कि जो बांग्लादेशी प्रवेश कर चुके हैं, उन्हें भारतीय समाज में समाहित करने के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प नहीं है। असम में जो सांस्कृतिक समस्या है, उसकी जड़ में जाने की जरूरत है। इस कार्य में बाधा धर्म है। माना जा रहा है कि हिंदू और मुसलमान अलग-अलग धर्मों के अनुयायी हैं, दूसरे के ऊपर अपने धर्म को थोपना चाहते हैं। हिंदू-मुसलमान वैमनस्य की जड़े अल्लाह को लेकर है। मुसलमानों का मानना है कि परम शक्तिमान अल्लाह का कोई रूप नहीं है। ये इस निराकार अल्लाह मात्र की पूजा करना स्वीकार करते हैं। हिंदू चूंकि विष्णु, शिव और देवी की मूर्ति पूजा करते हैं, इसलिए मुसलमान भाइयों की दृष्टि में हिंदू अल्लाह विरोधी अथवा काफिर हैं। मेरी समझ से मुसलमान भाइयों का हिंदुओं का यह आकलन उचित नहीं है। सच यह है कि हिंदू भी परमात्मा या ब्रह्म को निराकार मानते हैं। ब्रह्म का मंदिर कहीं नहीं बनाया जाता है, लेकिन हिंदुओं ने पाया कि निराकार ब्रह्म की पूजा करना बहुत कठिन है। अतः उन्होंने ब्रह्म के रूप में विष्णु, शिव एवं देवी प्रतिमाएं बनाई हैं। मुसलमान धर्म में काबा का फोटो लगाने की परंपरा है। काबा की फोटो देखने से अल्लाह के पास पहुंचने में मदद मिलती है। हिंदू एवं मुसलमान के बीच ब्रह्म अथवा अल्लाह को लेकर कोई विवाद नहीं है। दोनों को समझना चाहिए कि ब्रह्म के पास पहुंचने के दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। इस बात को समझेंगे तो हिंदू और मुसलमान भाइयों में प्रेम बनेगा, मतभेद समाप्त होगा और आगे बढ़ सकेंगे।

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