हिमाचल का बूढ़ा वर्ग

(कर्नल जसवंत सिंह चंदेल लेखक, कलोल, बिलासपुर से हैं)

हिमाचलवासियों को अच्छे संस्कार अपने बड़े बूढ़ों से जरूर मिले हैं, वे अपने बुजुर्गों की देखभाल भी करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते वे वह सब कुछ नहीं कर पाते हैं, जो वे शायद करना भी चाहते हैं…

हिमाचल प्रदेश का बूढ़ा वर्ग भारत के कई राज्यों के बूढे वर्ग से कहीं सुखी, स्वस्थ और खुश वर्ग है। इसके कई कारण हैं। पहला कारण यहां के हर परिवार के पास अपना एक कच्चा, पक्का घर है, एक पशु आवास है, कुछ खेत हैं और परिवार आमतौर पर सुखी हैं। दूसरा कारण यहां की जलवायु हर उम्र के इनसान के लिए संजीवनी की तरह है। तीसरा कारण हिमाचल गांव में बसता है और हर गांव का अपना देवता है। इस कारण भगवान पर आस्था है और यही आस्था और पहले दो कारणों से हिमाचल के बूढ़े वर्ग की देखभाल परिवार आमतौर पर करते हैं। मैं स्वयं एक पिछड़ा क्षेत्र के गांव का निवासी हूं। मैं गांव में रहने वाले बूढ़े वर्ग को हर रोज देखता हूं। उनके परिवार के बर्ताव को देखता हूं, उन सबसे मिलता हूं, बातचीत करता हूं और उनके सुख दुख मंे शरीक होता हूं।  यही नहीं मैं अपने इलाके की 14 पंचायतों के हर गांव में आता-जाता हूं। मैंने पाया कि बुजुर्गों को समय पर उनका परिवार खाना देता है, ठंडा, गर्म पानी देता है, उनके रहने की व्यवस्था लगभग ठीकठाक है। ये बुजुर्ग अपनी सेहत के मुताबिक घर, खेतीबाड़ी का और दूसरे काम करते रहते हैं। काम जैसे घर पर बच्चों की देखभाल, खेतों की रखवाली, खाना बनाने का काम तथा घास वगैरह काटने का काम करते रहते हैं, गड़बड़ तब होती है, जब कोई बुजुर्ग बीमार पड़ जाए या बहुत बूढ़ा हो जाए। उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ता है, दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं और कुछ और खर्चे बढ़ जाते हैं। मेरा मानना है कि हिमाचलवासियों को अच्छे संस्कार अपने बड़े बूढ़ों से जरूर मिले हैं, वे अपने बुजुर्गों की देखभाल भी करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के चलते वे वह सब कुछ नहीं कर पाते हैं, जो वे शायद करना भी चाहते हैं। हिमाचल सरकार ने सभी वर्गों की भलाई के काम किए हैं, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। मैं अपने पहले एक लेख में सरकार के भलाई के कामों को गिना चुका हूं, लेकिन अभी तक हिमाचल के बूढ़े वर्ग पर उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितना कि देने की जरूरत है। सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं। पढ़े-लिखे बच्चे बद्दी नौकरी करने जाते हैं, वहां पर चार हजार से पांच हजार तक की पगार मिलती है। इससे ये बच्चे, अपना जीवन-यापन भी नहीं कर पाते हैं। मैं इसलिए कहता हूं कि ये बच्चे जो सरकारी भी हैं, चाहते हुए भी अपने बूढ़ों की दवा दारू का इंतजाम नहीं कर पाते हैं। बुढ़ापे मंे कोई भी बीमारी हो सकती है, लेकिन जोड़ों की दर्द, पीठ की दर्द, सांस की समस्या, पेशाब की बीमारियां, हार्ट की बीमारी, रक्तचाप और शुगर आम समस्याएं देखने को मिलती हैं। इन बीमारियों के टेस्ट और दवाइयां बहुत महंगी हैं। बूढ़े कहां से पैसा लाएं। हिमाचल सरकार बुढ़ापा पेंशन दे रही है, लेकिन वह नाममात्र की पेंशन है। 80 वर्ष से कम उम्र वाले बुजुर्गों को 400 रुपए प्रतिमाह भुगतान होता है। 80 वर्ष से ऊपर वाली उम्र के बुजुर्गों को 600 रुपए प्रतिमाह भुगतान होता था। अब खबर है कि यह पेंशन 800 रुपए प्रतिमाह कर दी है। यह बहुत अच्छी पहल है, लेकिन अभी भी ऊंट के मुंह में जीरा वाली ही बात बनती है। जरा सोचिए अगर पेशाब का नार्मल टेस्ट, खून का नार्मल टेस्ट तथा एक ईसीजी और अल्ट्रासाउंड करवाने की जरूरत पड़ जाए, तो लगभग 1100 रुपए खर्च होंगे। इसलिए 400 रुपए या 800 मासिक पेंशन बहुत कम राशि है। मैं मानता हूं कि यह समस्या अकेले हिमाचल की ही नहीं है, बल्कि पूरे हिंदोस्तान की है। समस्या का हल राष्ट्रीय स्तर पर सोचा जाना चाहिए। हां, हिमाचल सरकार को भी इस समस्या पर कुछ और ध्यान देने की जरूरत है। प्रदेश सरकार 55 वर्ष से अधिक आयु वाले बुजुर्गों को कम से कम 2000 रुपए की पेंशन प्रदान करने की कोशिश करे। इसमें केंद्र सरकार से कितना सहयोग मिल सकता है। वह प्रदेश सरकार केंद्र से बातचीत करके तय करे। 55 वर्ष की आयु के बाद हर पांच वर्ष के बाद पेंशन में बढ़ोतरी प्रदान की जाए। हिमाचल सरकार ने समाज के हर वर्ग को लाभ दिया है। इसलिए बूढ़ों की मांग भी है कि 400 रुपए या 800 रुपए से उनका गुजारा नहीं हो रहा है। बूढ़े सरकार से आस लगाए हैं कि उनकी देखभाल भी की जाए।

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