Daily Archives

Sep 3rd, 2012

राजनीति में शीर्ष नेता थे ठाकुर रणजीत सिंह

(राज कुमार,लेखक, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला मंदली, ऊना में प्रवक्ता हैं) ठाकुर साहब के निधन से कुटलैहड़ ने एक राष्ट्रीय नेता खो दिया है। वह राजनीति में आठ दशकों से खड़े उस विशाल पेड़ के समान थे, जिसके गिरने से सदियों तक उस मुकाम परकोई…

जनसंख्या 25 प्रतिशत, आरक्षण 15 प्रतिशत क्यों?

(राजकुमार विद्रोही, शिमला)  हिमाचल में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या 25 प्रतिशत है, लेकिन उन्हंे आरक्षण मात्र 15 प्रतिशत है, जबकि संविधान में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि एससी/एसटी को उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाएगा, ताकि…

फांसी से बड़ा फैसला

फरवरी, 2002 के गोधरा सांप्रदायिक दंगों के बाद नरोडा पाटिया के सामूहिक जनसंहार पर एक विशेष अदालत का जो फैसला आया है, वह एक न्यायिक ऐतिहासिकता से कम नहीं आंका जा सकता। वह लीक से हट कर, अभूतपूर्व-सा है, जो मानव जीवन की मूल्यवत्ता का भी उल्लेख…

व्यवस्था परिवर्तन अनिवार्य

(लक्ष्मी चंद, कसौली, सोलन)  22-8-2012 के अंक में आपने शांता कुमार का लेख ‘कब तक बहते रहेंगे आंसू’ प्रकाशित करके भूख की पीड़ा को उजागर किया है। इसमें महामहिम राष्ट्रपति जी का ध्यान उन्हीं के वक्तव्य पर दिलवाया गया है, परंतु राष्ट्रपति तो…

लघु कथाएं

पुष्प की पीड़ा पुष्प की अभिलाषा शीर्षक से लिखी  कविता से आप भी चिरपरिचित हैं न । आपने भी मेरी तरह यह कविता पढ़ी या सुनी जरुर होगी। कई बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में किसी बच्चे को इसी कविता के आधार पर पुरस्कार लेते देख तालियां भी बजाई…

बर्निंग भारत

(बीएस पाल, टिकरी, मंडी) आज देश साधन संपन्न होते हुए भी शाइनिंग भारत के स्थान पर बर्निंग भारत है। इसका मुख्य कारण भ्रष्ट राजनेता एवं आधिकारी वर्ग है। आखिर प्रश्न उठता है कि ऐसे लोग कहां से आए  तो उत्तर है भ्रष्ट एवं अनभिज्ञ जनता द्वारा…

समाचार पत्रों की बदलती भूमिका

(कुलदीप नैयर,लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं) किसी समाचार पत्र या टेलीविजन चैनल पर समीक्षाएं प्रायोजित होती हैं और यह कोई रहस्य नहीं है कि कोई भी कीमत अदा करके स्लाटों को खरीद सकता है। यही बात प्रेस के साथ भी है... मुझे हैरानी नहीं है कि भारतीय…

विधानसभा का मानसून

यह सत्र गरजने-बरसने का मौका था, इसलिए विपक्ष का धर्म बदल गया और बहस के मजमून भी आक्रोश की भट्ठी पर चढ़ गए। पहले दिन का विपक्षी कारवां विधानसभा से बाहर अपनी मिट्टी खोजता हुआ जो निकला तो यह आदत पड़ गई और देखा गया चुनाव का सुरूर। चुनाव के…

बाजार का प्रतिपक्ष है लोकसंस्कृतिः डा. व्यथित

डा.गौतम शर्मा व्यथित की गिनती राष्ट्रीय स्तर पर लोकसंस्कृति के अधिकारी विद्वानों मंे होती हैं। उनका अध्ययन कागजी नहीं है। लोगों के बीच रहकर उनसे सतत संवाद उनके ज्ञान का स्रोत है। इसी कारण सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में होने वाले सूक्ष्म…

चुनौतियों पर सजग नजर

वैचारिक झुकावों और परम्परागत बौद्धिक सीमारेखाओं के  बीच राष्ट्रीय चुनौतियों की पहचान एक दुरूह लेकिन महत्वपूर्ण काम है। महत्त्वपूर्ण इसलिए,क्योंकि वास्तविक चुनौतियों की पहचान, समस्या- समाधान की तरफ उठाया गया पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम माना…