कविता का दर्द

By: Jan 21st, 2013 12:15 am

कागज की धरा पर

कवि की कलम से अवतरित

चार छःशब्दों की वह पंक्ति

जब मेरे सामने प्रस्तुत हुई

सहसा! विषय तथा भाव पर मेरी नजर टिक गई

विषय को समझने की कोशिश में

मेरी सोच की सारी सीमाएं टूट गई

जाने कवि ने उस कविता  को

कितनी समस्याओं से सजा रखा था !

 

इतने उलझे प्रश्न ,इतनी उलझी समस्याएं

आज की बाजारू चमक,उस कविता में समाई थी

मैं थोड़ी देर उस कविता को निहारता रहा

बड़ी मुश्किल से

मैंने उस कविता के मर्म को जाना!

बस उसी क्षण,उसने रुंधते स्वर में

कहना शुरू किया ,कवि था कभी

समाज का दर्पण,थी कविता समाज की पूंजी

वही कवि आज पुरस्कार की होड़ में

छद्म नेता की चाटुकारिता में

मुझे माध्यम बनाकर

क्षतिग्रस्त कर रहा है, मेरी अस्मिता को

 

कौन करेगा सतर्क , इस  समाज को

जहां! नंगे बदन की नुमाइश लगी है

स्वर्ग की परियों के तन पर

कपड़ा सिकुड़ता जा रहा है

अंधी श्रद्धा के नाद पर,भक्त झूमता जा रहा है

भूल गई वो राम की मर्यादा

कहां गया वो संतों का जीवन सादा

रह गयी मात्र शब्दों की पंक्ति

गांधी की सत्य और आहिंसा  

अब थोथा लगने लगा है,सत्यमेव जयते 

टूट गए हैं ईमान,बहुत नीचे गिर चुका है इनसान!

कर ली है उसने बहुत भौतिक तरक्की

लेकिन फि र  भी नहीं है आत्मिक शांति

 

फिर कविता ने मुझसे कहा,तुम मत करना कभी

जीवन की वास्तविकताओं से समझौता

बस खुद को बनाए रखना इनसान

तभी तुम बचा पाओगे मेरा ओर मेरे समाज का ईमान

बस इतना कह कर कविता  मौन है!

केवल राम,चंबा,हिमाचल प्रदेश

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