ऋग्वेद में वर्णित सप्तसिंधु

By: Nov 15th, 2014 12:12 am

विश्वामित्र के पुत्र अष्टक ऋषि ने सुरम्य, अमित गति वाली सात नदियों का चियण किया है। हे इंद्र, रमणीय, मनोहर, और अमित गति वाली गंगा आदि सात नदियां बहती हैं, हे इंद्र, शत्रुपुरियो को नष्टकरने वाले तुम गंगा आदि सात नदियों की सहायता से सिंधु (समुद्र) को बढ़ाते हो। तुमने देवो और मनुष्यों के उपकार के लिए 99 नदियों का मार्ग परिष्कृत किया। विश्वदेव की स्तुति करते हुए ऋषि गए कहते हैं — महती और तरंगशालिनी सरस्वती, सरयू और सिंधु आदि 21 नदियां हमारी रक्षा के लिए आवें। ये दिव्य जल-माताएं  घृत और मधु के समान जल दान करें। ऋषि विश्वमना वैयश्व ने कहा — जिस इंद्र ने अपने यजमानों को राक्षसों और पापों से मुक्त कराया है तथा जो इंद्र सातों नदियों (सप्त सिंधुषु) के तट पर रहने वाले अपने उपासकों के पास धन भेजते हैं, तुम्हें हे अत्यधिक बलशाली इंद्र, हम बार-बार नमन करते हैं (मीनमः) ऋषि श्यावाश्व कहते हैं— हे मरुतो, तुम्हें रसा, अनितमा, कुभा (काबुल,) क्रुम (कुर्रम) न रोकें, न तुम्हें सिंधु रोके। जलमयी सरयू तुम्हें बाधा न डाले। हम सब तुम्हारे आगमन जनित सुख प्राप्त करें। ऋषि धनाक-पुत्र लूश अपनी रक्षा के लिए आकाश, पृथ्वी, नदियों आदि से प्रार्थना करते हैं — हम द्यौ और पृथ्वी से, नदी माताओं से और शर्यणावत पर्वतों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। सूर्य और उषा से निष्पाप होने की कामना करते हैं। यह सोम जिसे छानकर आज हमने उत्तम रीति से बनाया है, वह भी हमारा मंगल करे। अग्नि की स्तुति करते हुए कण्व गोत्रीय नामक सात नदियों के तट पर बसे मनुष्यों का उल्लेख करते हैं- अग्नि सात मनुष्यों (सिंधु आदि सात नदियों के तट के निवासियों) के स्वामी हैं। वे तीन स्थानों (द्यौ, पृथ्वी और अंतरिक्ष) वाले हैं।

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