वायु पुराण

By: Nov 15th, 2014 12:12 am

यह एक ध्रुव ही मेरू पर्वत के मस्तक पर अधोमुख होकर भ्रमण करता है। इस प्रकार सूतजी ने देवों के विख्यात गृहों का वर्णन करते हुए बताया कि वस्तुतः रुद्र, इंद्र, उपेंद्र और चंद्र आदि का जो तेज है, वह सूर्य का ही तेज है। ये ही मूलभूत परम देवता हैं। क्षण, मुहूर्त, दिन-रात, पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, सूर्य से ही उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाते हैं। काल की गणना भी सूर्य से ही की जाती है। सूर्य ही काल है, अग्नि है, समस्त लोकों के आत्मा हैं। सूर्य की मुख्य सात किरणें होती हैं, जिसमें सुषुम्न किरण क्षीण हुए चंद्रमा को बढ़ाती है। हरिकेश किरण नक्षत्रों का उत्पत्ति स्थान कहलाती है। विश्वकर्मा किरण बुध को परिपुष्ट करती है। विश्वश्रवा किरण शुक्र का उद्भव स्थान है और संयतवसु किरण मंगल को उत्पन्न करने वाली है। छठी किरण अर्वाग्वसु से बृहस्पति उत्पन्न हुए और स्वराष्ट्र किरण शनिश्चर को तृप्त करती है। यह संपूर्ण संसार सूर्य के द्वारा प्रगट हुआ, अतः क्षीण न होने के कारण ही इन्हें नक्षत्र कहा जाता है। ये तारागण सुकर्म द्वारा विस्तृत और ग्रहों का आश्रय लेते हैं। सूर्य और स्थान में, सोम सौम्य स्थान में, शुक्र शौक्र स्थान में बृहस्पति वृहद स्थान में, मंगल लोहित स्थान में और शनिश्चर शनिश्वर स्थान में प्रवेश करते हैं। राहु का अंधकार में बृहत स्थान है। नक्षत्रों का मार्ग भी वीथी के नियम से व्यवस्थित है। नक्षत्रों की गति के अनुसार सूर्य और चंद्र दोनों ही जब विषुवत रेखा पर आते हैं, तब दोनों का ही अस्त और उदय समान काल में होता है। उत्तरवीथी में जब वे वर्तमान रहते हैं, तब पूर्णिमा और अमावस्या में ज्योतिषचक्र का अनुसरण करने वाले उन दोनों के उदय काल में अंतर आ जाता है।

दक्षिण दिशा में चलते हुए सूर्य ग्रहों के नीचे से चलते हैं। उस समय चंद्रमा ऊपरी भाग में गमन करते हैं और नक्षत्र मंडल चंद्रमा से ऊपर विचरण करता है। नक्षत्र से ऊपर बुध, बृहस्पति, शनि, सप्तर्षि और फिर धु्रव रहते हैं। यक्षाक्रम से तारा ग्रहों का असर ऊपर की ओर दो लाख योजनाओं का है। चंद्र, सूर्य और ग्रह आदि दिव्य तेज के द्वारा आकाश में नियम क्रम के नित्य संयुक्त होते हैं और अलग होते हैं। समागम काल में या निम्न उच्च होने के समय मृदुभाव धारण कर लेते हैं, जिससे सब कोई उन्हें एक बार देख लेते हैं। अदिति पुत्र विवस्वान सूर्र्य, जो ग्रहों में आदि ग्रह है, ये चाक्षुस मंवंतर में विशाखा में उत्पन्न हुए। इनकी उत्पत्ति के बाद सोलह किरण वाले भृगुपुत्र शुक्र पुण्य नक्षत्र में उत्पन्न हुए। ये तारा ग्रहों में श्रेष्ठ है। अंगिरा के पुत्र जगत गुरु बृहस्पति बारह किरण वाले फाल्गुनी नक्षत्र में उत्पन्न हुए। नौ किरणों वाले प्रजापति पुत्र मंगल उत्पन्न हुए। सात किरण वाले सूर्य पुत्र शनि रेवता नक्षत्र में पैदा हुए। चंद्र-सूर्य को पीड़ा पहुंचाने वाले राहु-केतु भी रेवती में ही जन्में। यदि ये ग्रह आदि जन्मकालिक नक्षत्र के कारण विगुनी या दुष्ट हो जाते हैं, तब वे उसी दोष के कारण क्लेश पहुंचाने लगते हैं। वह पीड़ा उनमें भक्ति करने से ही शांत हो जाती है। सूर्य सभी ग्रहों में आदि ग्रह है। तारा ग्रहों में आदि शुक्र है। नक्षत्रों में श्रीविष्णु तथा अयनों में उत्तरायण श्रेष्ठ है। पांच वर्षों में संवत्सर ऋतुओं में शिशिर, मासों में माघ, पक्षों में शुक्ल, तिथियों में प्रतिपक्ष, दिन-रात में दिन को श्रेष्ठ कहा गया है। मुहूर्तों में रौद्र तथा काल समूह के बीच निमेषात्मन काल ही आदि है। श्रवण से श्रवण तक पांच वर्षों का एक युग होता है, जो सूर्य के गति विशेष से चक्र की भांति घूमता रहता है। इस कारण सूर्य ही काल है, ये ही ईश्वर है, ये ही चारों प्रकार के चराचर के प्रवर्त्तक और निवर्त्तक हैं। ईश्वर ने इस ज्योतिषचक्र का निर्माण लौकिक व्यवहार को शृंखलाबद्ध करने के लिए ही किया है-ये ज्योतिषचक्र श्रवण से उत्पन्न हुए तथा ध्रुव में संलग्न है। भगवान ने कल्प के आदिकाल में बुद्धपूर्वक इन सभी आश्रयवान अभिमानियों का संस्थान किया। नीलकंठ की स्तुति- जिस देश में और जिस काल में ब्रह्मपुरी-गामियों  का पवित्र और उत्तम आख्यान घटित हुआ।

इस संदर्भ में नैमिषारण्य में उपस्थित मुनियों, ऋषियों की शंका और जिज्ञासा देखते हुए सूतजी ने बताया कि हिमालय पर्वत पर अनेक मुनि-महात्मा नियमपूर्वक महादेव की स्तुति-वंदना किया करते थे। किसी समय ऐसा योग हुआ कि सूर्य ज्योतिमंडल के बीच में आ गए। नियतात्मा देवों ने इस कथा की आलोचना की। अनुष्ठान में प्रवृत्त मुनियों की दशा बिगाड़ने लगी। इसी समय वायु ने कहा कि-नीलकंठ को नमस्कार है। यह सुनकर नियमव्रती साधुओं-महर्षियों में बालरिवल्यादि ने वायुदेव से पूछा कि आपने ये नीलकंठ का जो उच्चारण किया है यह पवित्र आत्माओं  के लिए पुण्यदायी और परम गुह्ना है। कृपा करके यह आग्रह करें और यह कथा सुनावें कि भगवान महादेव का कंठ नीला कैसे हो गया और इनका यह नाम क्यों पड़ गया? उन ऋषि गणों ने यह कथा वायु से ही सुनने का अनुरोध किया, क्योंकि वायु द्वारा प्रेरित होने पर ही वचनों का उच्चारण में सार्थकता आती है। वायु  ही वर्ण स्थान में ध्वनि उत्पन्न करके शब्दों का उच्चारण कारण बनते हैं। वायु से ही पहले ज्ञान, उत्साह और प्रवृत्ति का जन्म होता है। शरीर से वायु के निकल जाने पर सभी कुछ समाप्त हो जाता है। तब न वर्ण रह जाता है, न देह का संबंध।

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