श्री नारद पुराण

By: Nov 15th, 2014 12:12 am

सगुणं निर्गुणं शांतं मायाऽतीतं सुमानियम।

अरूपं बहुरूपं तं प्रणतोऽस्मि जनार्दनम्॥

अर्थात ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में सगुण-साकार तथा मूलतः सच्चिदानंदन, निर्गुण-निराकर, मायातीत, परमशांत, मायाधिपाति, अरूप और साथ ही अनेक स्वरूपधारी भगवान जनार्दन के चरणाविंदों में मैं नतमस्तक होकर उनका स्तवन करता हूं। स्तुति करते हुए मार्कंडेय जी अत्यंत भावविह्वल होकर आर्त्तस्वर में इस प्रकार से विनती करने लगे- हे परात्पर परमात्मन्! हे परमानंदमय परमेश्वर! हे शरणागतवत्सल प्रभो! आप करुणावरुणालय हैं, आप मन तथा वाणी के अगोचर हैं। मैं आपकी शरण में पड़ा हूं अतः आप मेरी रक्षा कीजिए। मार्कंडेय मुनि की निश्छल और एकनिष्ठ श्रद्धा को देखकर भक्त वत्सल भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में उनके समक्ष प्रकट हो गए और बोले-विप्र! मुझ में अनन्य आस्था रखकर और एकनिष्ठ भाव से मेरे होकर जो भक्त मेरा भजन-पूजन करते हैं, मुझे उनकी रक्षा के लिए सदैव चिंता रहती है। मैं अपने स्वरूप को छिपाकर स्वयं ही एक भक्त का रूप धारण कर अपने आश्रितों का हित-संपादन करता हूं। मार्कंडेय जी ने भक्तवत्सल भगवान का जय-जयकार करते हुए उनसे प्रार्थना की, कि वे उन्हें भगवद्भक्तों के लक्षण बतलाने की और उनकी पहचान के लिए उनके कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश करने की कृपा करें। मार्कंडेय जी बोले-भगवन! आपके मुखारविंद से मैं इस विषय की चर्चा श्रवण करने को उत्सुक हूं, आप मुझे उपकृत करने की कृपा करें। भक्तों के वशवर्ती श्री नारायण जी बोले — मुनिसत्तम! यद्यपि भक्तों का स्वरूप अवर्णनीय है। करोड़ों वर्षों में भी उनके लक्षणों का बखान नहीं किया जा सकता, तथापि आपके स्नेहानुरोध से आपकी जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए मैं आपको संक्षेप में यत्किञ्चित् सुनाता हूं, आप सावधान होकर श्रवण करें —

* भगवद्भक्त जीवमात्र के हितैषी होते हैं।

* वे असूया तथा मात्सर्य आदि दोषों से सर्वथा मुक्त होते हैं। उनका चित्त शांत, संयत तथा निरीह होता है।

* वे मन, वचन तथा कर्म से भी किसी को नाममात्र की भी पीड़ा नहीं पहुंचाते विष्णुभक्त कभी किसी से दान ग्रहण नहीं करते।

* वे गंगाबुद्धि से अपनी माता की और शिव की भावना से अपने पिता की निरंतर सेवा करते हैं।

* वे व्रतधारियों और संन्यासियों की सेवा में ही अपने समय का सदुपयोग करते हैं।

* प्रभु के सच्चे भक्त परनिंदा से सदा दूर रहकर कभी भी दूसरों में दोषदर्शन नहीं करते।

* वे सदा दूसरों का गुण ग्रहण करने को प्रस्तुत रहते हैं और मनुष्य -मात्र का यथोचित आदर-सत्कार करते हैं।

* वे किसी के भी प्रति शत्रु-मित्र भाव न रखकर सदा समदर्शी होते हैं।

* वे सत्यभाषण, सत्संग और स्वाध्याय को ही जीवन का सर्वस्व मानते हैं।

* वे पुराणों में श्रद्धा रखने वाले तथा गो, ब्रह्मण की सेवा करने वाले होते हैं।

* भगवद्भक्त हरिनाम संकीर्तन और तीर्थसेवन में विशेष रुचि संपन्न होते हैं।

* वे लोकहित के लिए उद्यान, वांपी, सरोवर, देवालय, कूप आदि का निर्माण करते हैं।

* वे तुलसी की माला कंठ में धारण करते हैं और तुलसी के आरोपण, सिंचन तथा दर्शन से उल्लसित होते हैं।

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