श्री वराह पुराण

By: Nov 15th, 2014 12:12 am

पुत्र ने सहजभाव से उत्तर दिया-तात! वह विषय अति पावन एवं गुह्यतम है। आज के दिन धर्मानुष्ठान कर, कल मैं आपको इस संबंध में सब कुछ बतला दूंगा। दूसरे दिन जब रविमंडल का आलोक धरा को नहलाने लगा, द्विज-गण मंगलगान गाने लगे तभी पवित्र जल में स्नान करके तथा भगवान विष्णु की  चतुर्भुज प्रतिमा को श्रद्धावत प्रणाम करके उस पुत्र ने पिता को अपने पूर्वजन्म में खंजन पक्षी होने का संपूर्ण वृतांत कह सुनाया। उस पावन प्रसंग को सुनकर उस वैश्य ने पत्नी सहित अपना शेष जीवन वहीं व्यतीत कर दिया तथा जब उनका नश्वर शरीर छूटा तो उस धर्म-स्थल के प्रभाव से वे श्वेतद्वीप में प्रवेश पाने के सुखभोग और अंत में श्वेतद्वीप की प्राप्ति हुई। उनके साथ के अनेक पशु भी उस योनि से मुक्त होकर उत्तम योनियों में जन्मे।

हे देवि वसुंधरे! अब मैं तुम्हारे दूसरे प्रश्न का उत्तर देता हूं, तुम ध्यान से सुनो। मेरे मंदिर को गोमय से लीपने वाला व्यक्ति इस कार्य में जितने पगों की दूरी पार करता है उतने ही सहस्र वर्षों तक वह दिव्य लोक में रहता है। बारह वर्षों तक ऐसा करने वाला साधक सदा संपन्नता, कुलीनता एवं सुख-सौभाग्य भोगता हुआ अंत में कुशद्वीप का अधिकारी बनता है। वहां वह दस सहस्र वर्षों तक रहता है। इसी प्रकार मेरे अंतर्गृह को स्वयं लीपने वाला अथवा उपयुक्त पारिश्रमिक देकर दूसरे से लेपन करवाने वाला भी निःसंशय ही मेरे लोक में आता है। इसी भांति जो व्यक्ति जितनी दूरी चलकर लेपन हेतु गोबर लाता है, पगों की संख्या जितने वर्षों तक उसे स्वर्ग में सुखभोग की प्राप्ति होती है। पुनः शाल्मलिद्वीप में बारह सहस्र वर्ष वास करके भारतवर्ष में जन्म लेता तथा नृपत्व का अधिकारी बनता है। वह लोक में पूज्य एवं मान्य होता है। उसके पश्चात् पुनः मानव योनि में जन्म लेकर अपने पुराने संस्कारों के वशीभूत होकर मेरे मंदिर आदि के लेपन में प्रवृत होता है और फलतः अंत में मेरे लोक में पहुंचता है। गो-स्नान, मंदिर-लेपन आदि के लिए जल लाने वाला, मंदिर में मार्जनकर्म करने वाला (झाड़ू लगाने वाला) तथा स्वच्छता का कार्य करने वाला भी क्रमशः क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप तथा भारत भूमि में उत्पन्न होकर नाना सुख पाकर अंत में श्वेतद्वीप को प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त मेरा गुणगान करते हुए जो भजन करता है, वाद्य बजाता है तथा नृत्य करता है वह भी उत्तम फल को प्राप्त करता है।

पृथ्वी बोली-भगवान्! इस प्रसंग को सोदाहरण और विस्तारपूर्वक सुनने की मेरी इच्छा है। आप सुनाने की कृपा कीजिए। भगवान् ने कहा-सर्वप्रथम भजन – गायन के विषय में सुनो। वराह क्षेत्र में मेरे मंदिर के निकट ही एक चांडाल रहता था। वह भगवद् भक्त था तथा प्रतिक्षण भजन-गायन में लगा रहता था। उसका नियम था कि वह रात्रि-जागरण करता और उक्त भाव से मेरे गीत गाता। एक रात वह वीणा लेकर संगीतालाप करता हुआ मेरे मंदिर की ओर आ रहा था कि मार्ग में एक भूखे ब्रह्मराक्षस ने उसे पकड़ लिया और खाने को तैयार हुआ। किंतु उस समय भक्त के हृदय में भजन-गायन की अभिलाषा जागृत हुई, उसने ब्रह्म राक्षस से कहा-हे भाई! मुझे कुछ समय के लिए छोड़ दो, मैं भगवान के मंदिर में भजन गाने के बाद तुम्हारे पास आ जाऊंगा, तब तुम मुझे खा लेना! इस तरह उसने प्रार्थना की। तब ब्रह्मराक्षस ने कहा कि मैं इतना मूर्ख नहीं हूं जो हाथ में आए शिकार को छोड़ दूं और न तुम इतने भोले हो कि मृत्यु के मुंह से बच कर दोबारा उसी में पड़ने के लिए आ जाओ।

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