नयना देवी

Jan 3rd, 2015 12:18 am

ASTHAयह लिखना असंगत न होगा कि महिषासुर की महिषपुरी इस शृंग से दो योजन दक्षिण की ओर है, जिसका नाम अपभ्रंश होकर माखोवाल पड़ा जो आगे चलकर नवम् बादशाह गुरु तेगबहादुर जी महाराज ने जब यह भूमि बिलासपुर के नरेश से प्राप्त की तो यहां अपना दुर्ग बनाकर माखोवाल का नाम बदल कर आनंदगढ़ रखा। जो अब आनंदपुर साहिब नाम से प्रसिद्ध है। नयना  देवी नाम कैसे पड़ा कल्प-भेद से कालांतर में जब सतीजी ने अपने पिता दक्ष राजा के यज्ञ कुंड में अपने भौतिक शरीर को भस्म कर डाला, भगवान शंकर ने उनके शरीर को अपने त्रिशूल से उठाकर उन्मादमयी अवस्था में पृथ्वी का भ्रमण किया और विष्णु भगवान ने अपने चक्र सती के शरीर को टुकड़ों में बांट दिया। सती के अंग समस्त भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर गिरे जो शक्तिपीठ कहलाए। इस उत्तम शृृंग पर मां के नयन गिरने से इस स्थान का नाम श्रीनयना देवी जी पड़ा। यह स्थान समुद्र तल से चार हजार फीट की ऊंचाई पर विराजमान है। गोविंदसागर की झील का कई मीलों लंबा दृश्य यहां से देखा जा सकता है। यहां वर्ष में तीन मेले लगते हैं। इनमें श्रावण शुक्ल अष्टमी विशेष प्रसिद्ध है। नयना मां ने महिष और उनके सेनानायकों को मारकर उनके सिरों को भिन्न-भिन्न स्थानों में फैंककर पापी, कुंड, शिलाएं स्थापित करके लोगों को लाभन्वित करने का साधन प्रदान किया है। इस कलियुग में अब भी मां के दो चमत्कार नंबर एक मंदिर के शिखर पर पीपल के पत्ते-पत्ते पर लोहे के जंगलों पर, कलश ध्वजाओं तथा श्रद्धा भक्तजनों के हाथों पर ज्योतियों का आना। नंबर दो हवन कुंड में लाखों मन साम्रगी हवन के किए जाने पर भस्मी आदि निकालने की आवश्यकता नहीं होती। शनैः शनैः सब कुछ इसी में समा जाता है। इस कुंड में दशमेश गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने सवा लाख मन हवन साम्रगी से होम किया था। जगदंबा ने प्रसन्न होकर इनको खड्ग प्रदान किया था। मां नयना देवी के चरणों में जो जल बहता है वह चरण गंगा के नाम से विख्यात है। आनंदपुर साहिब के उत्तर की ओर बहती हुई यह गंगा सतलुज से जा मिलती है। यात्री लोग इस गंगा में स्नान दान करके पदयात्रा प्रारंभ करते हैं।  आगे एक कौलसर अर्थात कोलांबाला टोबा नाम का स्थान आता है किसी समय इसमें कमल फूल हुआ करते थे, भक्त लोग सरोवर से पुष्प लेकर मां के चरण कमलों में अर्पित करते थे।  इसी स्थान से पहाड़ की चढ़ाई प्रारंभ होती है। अब यहां से मोटर मार्ग बन गया है। जो नयना देवी बस स्टैंड पर पहुंच गया। श्री नयना देवी बस स्टैंड से मां के मंदिर तक पहुंचने के लिए 761 पुख्ता पत्थर की सीढि़यां बनी हुई है। आधी पौडि़यां चढ़ने पर छोटा सा नगर श्री नयना देवी है। इन्हीं पौडि़यों से मंदिर तक सात डयोढि़यां हैं, जिन पर गुप्त रूप से मां के गण रहते हैं। दो डयोढि़यों पर मां के चरण भी हैं। यात्रियों को चाहिए कि इन स्थानों को चढ़ते उतरते समय अपने दाहिने हाथ रखें। विपरीत चलने पर अधूरा फल मिलेगा। मंदिर में पहुंचकर बाहर के प्रवेश द्वार के अंदर दांए श्री गणपति के साथ हनुमान देवता का मंदिर है और बांए और श्री एक पाद भैरव क्षेत्रपाल का स्थान है।  साथ ही पीपल की जुड़ों में ब्रह्मपिंडी विराजमान है। लक्ष्मी नारायण मंदिर,  रवेत वटक (लौकडि़या वीर)का मंदिर है। सामने धर्मशाला चरण पादुका है। प्रमाण करते हुए सिंह द्वार पर धर्मरूप सिंह वाहन (रूप) विराजमान है। उनको धर्मरूप जानकर पूजा प्रणाम करते हुए मां तक जाएं, मां के साथ लक्ष्मी गणेश की पूजा करके जन्म सफल करें। दर्शन के उपरांत नारायण भैरव शंकर का पूजन करते हुए परिक्रमा में आद्या काली, चौसठ योगिनी, अंनपूर्णा, यज्ञशाला हवन कुंड के दर्शन करके यथाशक्ति कन्या पूजन ब्राह्मण भोजनांतर बाहर मां के भंडारे का प्रसाद अवश्य प्राप्त करें। मंदिर से सौ कदम की दूरी पर उत्तर की और ब्रह्म कपाली नाम का सरोवर है, जिसमें वर्षा का जल होता है। जब मां ने महिष का वध किया था, तो उसके सिर को शिला पर फोड़ कर कपाल निकाल ब्रह्म को देकर इसकी स्थापना कराई थी। इसके आगे लगभग दो सौ गज की दूरी पर एक प्राचीन गुफा के दर्शन होते हैं। यह स्थान शताब्दियों से मंदिर से जुड़ा है। वैसे यह स्थान साधु महात्माओं की तपस्या के लिए है। यह क्षेत्र गुफा, कंदराओं से भरा पड़ा है, यहां सिद्ध महात्मा तपस्या करते हैं। मंदिर के नीचे भी एक गुफा है, लेकिन लोग वहां नहीं पहुंच सकते। इसके दक्षिण में जटाधार, पश्चिम में ब्रह्मावती द्वारों का शांति प्रदान करने वाले इक्षु कुंड है। मंदिर के पिछली ओर दो तीन मील की दूरी पर दो बावडि़यां हैं, जो झरनावाली तथा बंब की बौड़ी के नाम से विख्यात है। यह वह स्थान है जहां महामाया ने महिष वध के उपरांत उसके नेत्र त्रिशूल से निकाल कर अपनी पिछली ओर फैंके थे। दोनों नेत्र दो बावलियों के रूप में हैं। यह स्थान संध्या उपासना के लिए अत्यंत लाभकारी है।

-राकेश गौतम, बिलासपुर

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