महिमा माघ मास की

Jan 3rd, 2015 12:19 am

महिमा माघ मास की माघ मास इतना पवित्र  है कि इसमें प्रत्येक जलकुंड का जल गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है। इस मास की प्रत्येक तिथि को पर्व माना जाता है। पूरे मास माघ स्नान न कर पाने की स्थिति में शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था दी है कि मास में कम से एक एक दिन तो अवश्य ही स्नान, दान, उपवास और पूजा करनी चाहिए…

ASTHAमाघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि व्रत दान व तपस्या से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी माघ मास में ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नानमात्र से होती है। अतः सभी पापों से मुक्ति व भगवान की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान व्रत करना चाहिए। इसका प्रारंभ पौष की पूर्णिमा से होता है। माघ मास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहां कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व है। कदाचित् अशक्तावस्था में पूरे मास का नियम न ले सकें तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था दी है कि एक दिन तो अवश्य माघ-स्नान, दान, उपवास और पूजा करनी चाहिए। माघ मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या मौनी अमावस्या के रूप में प्रसिद्ध है। अमावस्या के दिन सोमवार का योग होने पर उस दिन देवताओं को भी दुर्लभ हो ऐसा पुण्यकाल होता है क्योंकि गंगा, पुष्कर एवं दिव्य अंतरिक्ष और भूमि के जो सब तीर्थ हैं, ये सोमवती अमावस्या के दिन जप, ध्यान, पूजन करने पर विशेष धर्मलाभ प्रदान करते हैं। सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी ये चार तिथियां सूर्यग्रहण के बराबर कही गई हैं। इनमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है। माघ शुक्ल पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी को सरस्वती मां का आविर्भाव-दिवस माना जाता है। शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अचला सप्तमी कहते हैं। ऐसे तो माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है तथापि उनमें भी माघी पूर्णिमा का धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर भगवत्पूजन, श्राद्ध तथा दान का विशेष फल है। जो इस दिन भगवान शिव की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर भगवान विष्णु के लोक में प्रतिष्ठित होता है। माघी पूर्णिमा के दिन तिल, सूती कपड़े, कंबल, रत्न, पगड़ी, जूते आदि का अपने वैभव के अनुसार दान करके मनुष्य स्वर्गलोक में सुखी होता है। मत्स्य पुराण के अनुसार इस दिन जो व्यक्ति ब्रह्मवैवर्त पुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। भारतीय संवत्सर का ग्यारहवां चांद्रमास और दसवां सौरमास ‘माघ’ कहलाता है।  इस महीने में मघा नक्षत्र युक्त पूर्णिमा होने से इसका नाम माघ पड़ा। हिंदू धर्म के दृष्टिकोण से इस माघ मास का बहुत अधिक महत्व है। मान्यता है कि इस मास में शीतल जल में डुबकी लगाने-नहाने वाले मनुष्य पापमुक्त होकर स्वर्गलोक जाते हैं

माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयांति॥

इस माघमास में पूर्णिमा को जो व्यक्ति धार्मिक पुस्तको का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णन है कि- माघ मास की अमावास्या को प्रयागराज में तीन करोड़ दस हजार तीर्थों का समागम होता है। सूर्य के मकरस्थ होने पर अर्थात माघ मास में जो नियमपूर्वक उत्तम व्रत का पालन करते हुए प्रयाग में स्नान करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग पाता है। जो माघ में ब्राह्मणों को तिल दान करता है, वह समस्त जन्तुओं से भरे नरक का दर्शन नहीं करता। जो माघमास में नियमपूर्वक एक समय के भोजन से जीवनयापन करता है, वह धनवान कुल में जन्म लेकर कुटुंबीजनों में महत्त्व को प्राप्त होता है। माघ की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान् माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है, और वह अपने कुल का उद्धार कर देता है। माघ-स्नान के लिए प्रातः तिल,जल,पुष्प,कुश लेकर संकल्प करे। फिर निम्न प्रार्थना करें-

दुःखदारिर्द्यनाशाय श्रीविष्णोस्तोषणाय च।

प्रातःस्नानं करोम्यद्य माघे पापविनाशनम॥

मकरस्थे रवौ माघे गोविन्दाच्युत माधव।

स्नानेनानेन मे देव यथोक्तफलदो भव॥

दिवाकर जगन्नाथ प्रभाकर नमोह्यस्तुते।

परिपूर्णं कुरूष्वेदं माघस्नानं महाव्रतम॥

माघमासमिमं पुण्यं स्नाम्यहं देव माधव।

तीर्थस्यास्य जले नित्यं प्रसीद भगवन् हरे॥

माघमास की ऐसी विशेषता है कि इसमें जहां-कहीं भी जल हो, वह गंगाजल के समान होता है। फिर भी प्रयाग, काशी, नैमिषारण्य, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार तथा अन्य पवित्र तीर्थों व नदियों में स्नान का बड़ा महत्त्व है। साथ ही मन की निर्मलता व श्रद्धा भी आवश्यक है। माघ मास में कड़ाके की ठंड पड़ती है और जनजीवन में निष्क्रियता व्याप्त हो जाती है। ऐसे मौसम में सुबह स्नान करने को एक धार्मिक कृत्य बनाकर हमारे मनीषियों ने सक्रिय जीवनशैली की आधारशिला रखी है। यह एक स्वाभाविक तथ्य है कि सुबह स्नान के पश्चात व्यक्ति निष्क्रिय होकर नहीं बैठ सकता। माघ स्नान शरीर को हर तरह के मौसम का सामना करने लायक बनाने का  उपक्रम भी है।

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