ब्रह्म कमल

अगर पुष्प प्रजाति में कोई नाम रहस्य से जुड़ा है तो वह ब्रह्म कमल है। यह एक रहस्यपूर्ण सफेद कमल है ,जो हिमालय में 11 हजार से 17 हजार फुट की ऊंचाइयों पर पाया जाता है।  हेमकुंड और सप्तशृंग के आसपास के क्षेत्र में यह स्वाभाविक रूप से दिखाई दे जाता है।  केदारनाथ और बद्रीनाथ के मंदिरों में  ब्रह्म कमल चढ़ाने की परंपरा है।  यह अत्यंत सुंदर चमकते सितारे जैसा आकार लिए मादक सुगंध वाला पुष्प है। यह घरों में नहीं उगता , पर अगर किसी तरह घर में उग जाए तो अपार धन देता है। इसे हिमालयी फूलों का सम्राट भी कहा गया है। यह कमल आधी रात के बाद खिलता है इसलिए इसे खिलते देखना स्वप्न समान ही है।  एक विश्वास है कि अगर इसे खिलते समय देख कर कोई कामना की जाए तो अतिशीघ्र पूरी हो जाती है।  ब्रह्म कमल न तो खरीदा जाना चाहिए और न ही इसे बेचा जाता है। बस इसे उपहार स्वरूप ही प्राप्त किया जाता है, क्योंकि इसे देवताओं का प्रिय पुष्प माना गया है और इसमें जादुई प्रभाव भी होता है।  इस दुर्लभ पुष्प की प्राप्ति आसानी से नहीं होती। विशेषकर उत्तराखंड,उत्तरी म्यांमार तथा दक्षिण -पश्चिम चीन इसके उत्पत्ति स्थान हैं। काफी वैज्ञानिक इसे ऑर्किड कैक्टस भी कहते हैं इसमें औषधीय गुण भी हैं। ब्रह्म कमल से कितनी ही कहानियां जुड़ी हैं। उनमें एक यह है कि जब पांडव अज्ञातवास पर गए तो द्रौपदी उनके साथ थीं। द्रौपदी मानसिक रूप से बेहद अशांत थीं क्योंकि वह कौरवों द्वारा मिले अपमान के आघात से अत्यंत दुःखी थीं।  घने जंगल के कष्टों से वह और भी परेशान थीं। इसी दौरान एक संध्या को उन्होंने झरने के पानी में एक सुंदर सुनहरा कमल बहते देखा। द्रौपदी के सामने ही वह कमल खिल गया । इसे देख कर द्रौपदी बहुत प्रसन्न हुईं। यह प्रसन्नता दैवी और अलौकिक थी,परंतु क्षणिक ही थी । अचानक कमल जैसे खिला था, वैसे ही मुरझा भी गया। यह एक संकेत था कि द्रौपदी के दुःखों का यहीं अंत नहीं था। इस कहानी से इस कमल को रहस्यमय कहा जा सकता है जो भविष्य का संकेत देता है। हिमालय में खिलने वाला यह पुष्प देवताओं के आशीर्वाद सरीखा है । यह साल में एक ही बार जुलाई-सितंबर के बीच खिलता है और एक ही रात रहता है। इसका खिलना देर रात आरंभ होता है तथा दस से ग्यारह बजे तक यह पूरा खिल जाता है। मध्य रात्रि से इसका बंद होना शुरू हो जाता है और सुबह तक यह मुरझा चुका होता है। इसकी सुगंध प्रिय होती है और इसकी पंखुडि़यों से टपका जल अमृत समान होता है। भाग्यशाली व्यक्ति ही इसे खिलते हुए देखते हैं और यह उन्हें सुख-समृद्धि से भर देता है। ब्रह्म कमल का खिलना एक अनोखी घटना है। यह अकेला ऐेसा कमल है जो रात में खिलता है और सुबह होते ही मुरझा जाता है। सुगंध आकार और रंग में यह अद्भुत है। भाग्योदय की सूचना देने वाला यह पुष्प पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह बर्फ से ढका हिमालयी क्षेत्र देवताओं का निवास माना जाता है उसी तरह बर्फीले क्षेत्र में खिलने वाले इस फूल को भी देवपुष्प मान लिया गया है। नंदा अष्टमी के दिन देवता पर चढ़े ये फूल प्रसाद रूप में बांटे जाते हैं। मानसून के मौसम में जब यह ऊंचाइयों पर खिलता है  तो स्थानीय लोग चरागाहों में जाकर इन्हें बोरों में भर कर लाते हैं और मंदिरों में देते हैं। मंदिर में यही फूल चढ़ाने के बाद प्रसाद रूप में वितरित किए जाते हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ के क्षेत्र में मौसम के दौरान पूरे वैभव और गरिमा के साथ इन्हें खिले हुए देखा जा सकता है। वनस्पति विज्ञानियों ने ब्रह्मकमल की 31 प्रजातियां दर्ज की हैं।

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