‘अच्छे दिन’ की परिभाषा

By: May 27th, 2015 12:15 am

एक साल की सत्ता के बावजूद मोदी चुनावी मुद्रा में हैं। वही अंदाज, वही तेवर, वही सियासी हमले और वही जनता की सामूहिक हुंकारें! प्रधानमंत्री मोदी ने ‘अच्छे दिनों’ को अब परिभाषित किया है और कहा है कि चोर-लुटेरों के बुरे दिन आ गए हैं। उन्हें चीखने-चिल्लाने दो। बीते 60 सालों के दौरान राजनीतिक गलियारों में इन्हीं का वर्चस्व रहा है। अब चोरी, लूट और दलाली का जमाना गया। पिछले एक साल में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद और लॉबिंग की कोई खबर सुनी है क्या आपने? बुरे दिन, बुरे हालात गए या नहीं? यह पूछते हुए प्रधानमंत्री मोदी चुनावी मुद्रा में लगते हैं और जाहिर तौर पर कांग्रेस उनके तीखे हमलों के निशाने पर है। ऐसे विरोधाभासों के आधार पर ‘अच्छे दिन’ की परिभाषा को स्वीकार करना कुछ मुश्किल है। अच्छे दिन आ गए हैं या बुरे दिन चले गए हैं, ये स्थितियां परस्पर पूरक और सापेक्ष हैं। ‘अच्छे दिन’ सकारात्मक स्थिति है। उसे उसी तरह रेखांकित करना चाहिए। देश को यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं होगी कि किन चोर-लुटेरों के बुरे दिन आ गए हैं? वह सीधे-सरल और सपाट रूप से, तथ्यों के आधार पर, जानना चाहती होगी कि उसके प्रधान संतरी या प्रधान ट्रस्टी ही बताएं कि ‘अच्छे दिन’ किन आधारों पर आ चुके हैं। बेशक अब यह कोई जुमला नहीं, यथार्थ की प्रक्रिया है। यदि प्रधानमंत्री के कथनानुसार, देश भर में करीब 32 लाख लोगों की 1000 रुपए माहवार की पेंशन लागू हो गई है, यदि योजनाओं का सौ फीसदी धन सीधे नागरिकों तक पहुंचने लगा है, यदि छह करोड़ लोगों ने 12 करोड़ को रोजगार मुहैया कराया है, यदि एक साल में ही 25000 करोड़ रुपए से ज्यादा की विदेशी पूंजी भारत में आई है, यदि आजादी की 75वीं सालगिरह, वर्ष 2022, तक 24 घंटे बिजली मिलने लगती है और उजाले हमारे पिछड़े गांवों को भी रोशन करने लगते हैं और साल भर में वाकई कोई घोटाला नहीं हुआ है, तो कमोबेश माना जा सकता है कि ‘अच्छे दिनों’ की शुरुआत हो चुकी है। हम जन-धन, जीवन सुरक्षा बीमा, अटल पेंशन से लेकर स्वच्छता और शौचालयों तक की चर्चा पहले ही कर चुके हैं। उनके संदर्भ में भी अच्छे दिनों की प्रक्रिया को माना जा सकता है, बेशक उनके पूर्ण सच को लेकर कुछ सवाल भी सामने आए हैं। लेकिन जनसंघ के प्राथमिक विचारक एवं मोदी के आदर्श पुरुष दीनदयाल उपाध्याय के जन्म गांव नगला चंद्रभान (मथुरा) में प्रधानमंत्री के संबोधन के बाद कुछ गुस्से, नाराजगी और असंतोष के स्वर भी सामने आए हैं। महंगाई और रोजगार अब भी बेहद ज्वलंत सरोकार हैं। अर्थशास्त्रीय आंकड़ों के मुताबिक, मोदी सत्ता के दावे भी उचित हो सकते हैं, लेकिन रोजमर्रा के अनुभव और जमीनी सच्चाई यह है कि दालें 100 रुपए या उससे भी ज्यादा कीमतों पर बेची जा रही हैं। हालांकि सब्जी और फलों के दाम अपेक्षाकृत स्थिर हैं। आम आदमी की महंगाई का सूचकांक तो ये दाम ही तय करते हैं। फिर ‘अच्छे दिनों’ का भीतरी एहसास कैसे हो सकता है? बेशक देश और अंत्योदय नागरिक का वक्त बदला है। सरकार के प्रति भरोसा हुआ है। लोग मान रहे हैं कि मोदी बदलाव का काम कर रहे हैं। लोग उम्मीदजदां हो रहे हैं कि इन बदलावों का लाभ जल्दी ही उन्हें मिलेगा, लेकिन ‘अच्छे दिनों’ की गति में कुछ ठिठकन भी है। सरकार का यूरिया पर नीम की कोटिंग का निर्णय वाकई ‘अच्छे दिनों’ का एहसास कराता है। इस निर्णय से सरकार ने करीब 6500 करोड़ रुपए की सबसिडी बचाई है, जो कैमिकल फैक्टरियों के जरिए धन्नासेठों की जेब में जा रही थी। इससे यह मिथ भी भंग होता है कि मोदी सत्ता उद्योगपतियों की ही है। इस निर्णय से किसानों की फसल 15-20 फीसदी ज्यादा होगी, जबकि नीम कोटिंग का यूरिया कैमिकल फैक्टरियों के लिए उपयोगी नहीं है। बहरहाल मोदी सत्ता ने वादों का पिटारा खोल दिया है। अब उन्हें संयोजित करके लागू करने की शुरुआत होनी चाहिए। हम मानते हैं कि ‘अच्छे दिन’ सिर्फ  15 लाख रुपए बैंक खातों में दर्ज होने तक सीमित नहीं हैं। कुछ मुद्दे आस्थाओं से जुड़े हैं। मसलन-नमामि गंगे। यदि मां गंगा के पानी में प्रदूषण और कचरा समाप्त किया जा सके और वह अपनी स्वच्छ और निर्मल धारा के साथ प्रवाहित हो, तो करोड़ों लोग अच्छे दिनों का एहसास करेंगे। यह बेहतर है कि अभी से मोदी सत्ता की मॉनिटरिंग की जा रही है, क्योंकि यह अप्रत्याशित सरकार है और वादों की झड़ी लगा रखी है। देश की निगाहें रहनी चाहिए और मोदी इसी तरह विपरीत धारणाओं से लड़ते रहें। तभी सही अर्थों में ‘अच्छे दिनों’ की शुरुआत हो सकती है और इतिहास हमेशा मोदी को याद करेगा।

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