आइए, संजो लें विरासत के निशान

By: May 6th, 2015 12:15 am

( अरुण तिवारी लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )
प्रश्न कीजिए कि क्या हमारे हुनरमंद अपना हुनर अगली पीढ़ी को सौंपने को संकल्पित दिखाई देते हैं? ध्यान, अध्यात्म, वेद, आयुर्वेेद और परंपरागत हुनर की बेशकीमती विरासत को आगे बढ़ाने में यूनेस्को की रुचि हो न हो, क्या भारत सरकार की कोई रुचि है? भारत की मांग पर विश्व योग दिवस की घोषणा को सामने रख हम कह सकते हैं कि हां, भारत सरकार की रुचि है। लेकिन दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि क्या गंगा, गौ और भारतीय होने के हमारे गर्व की रक्षा के लिए आज वाकई कोई सरकार, समाज या हम खुद संकल्पित हैं…
हाल में आए भूकंप ने नेपाल में जीवन की भरी न जा सकने वाली क्षति तो की ही है, नेपाली विरासत के कई निशानों को भी खतरे में ला दिया है। काठमांडू घाटी इसमें प्रमुख है। काठमांडू में हुई तबाही में राजा के दरबार की ऐतिहासिक इमारत व मूर्ति पर भी खतरा बरपा है। गौरतलब है कि काठमांडू घाटी, महात्मा बुद्ध का जन्मस्थान-लुंबिनी, चितवन नेशनल पार्क और सागरमाथा नेशनल पार्क को मिलाकर नेपाल के कुल चार स्थान विश्व विरासत की सूची में हंै। 15 अन्य स्थान प्रस्तावित सूची में हैं। राहत की खबर है कि फिलहाल जो बचा है, संयुक्त राष्ट्र ने उसे संरक्षित करने की पहल शुरू कर दी है। इस तबाही का एक भारतीय सबक यह भी है कि वह विरासत के अपने निशानों की चिंता करनी शुरू करे, खासकर विश्व विरासत के निशानों को। उनकी सुरक्षा के तकनीकी उपाय व सावधानियों पर कार्य शुरू कर देना जरूरी है। कारण कि वैज्ञानिक आकलनों ने साफ  कर दिया है कि प्राकृतिक आपदा के आगामी अंदेशों से अछूता तो भारत भी नहीं रहने वाला है। गौर कीजिए कि यूनेस्को की टीम सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्त्व की जिन संपत्तियों को ‘विश्व विरासत’ का दर्जा देती है, वे विश्व विरासत का हिस्सा बन जाती हैं। उन्हें संजोने और उनके प्रति जागृति प्रयासों को अंजाम देने में यूनेस्को, संबंधित देशों की मदद करता है। यूनेस्को के इस दायित्व की शुरुआत ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों व इमारतों की एक अंतरराष्ट्रीय परिषद ‘इकोमोस’ द्वारा ट्युनिशिया में आयोजित एक सम्मेलन में आए एक विचार से हुई। 18 अप्रैल, 1982 में इसी सम्मेलन में पहली बार ‘विश्व विरासत दिवस’ का विचार पेश किया गया, तो मंतव्य भी बस इतना ही था। यूनेस्को ने 1983 के अपने 22वें अधिवेशन में इसकी मंजूरी दी। आज तक वह 981 संपत्तियों को विश्व विरासत का दर्जा दे चुका है। गौरतलब है कि आज भारत के छह प्राकृतिक और 24 सांस्कृतिक महत्त्व के स्थान/इमारतें विश्व विरासत की सूची में दर्ज हैं। अजंता की गुफाएं और आगरा फोर्ट ने इस सूची में सबसे पहले 1983 में अपनी जगह बनाई। सबसे ताजा शामिल स्थान राजस्थान के पहाडिय़ों पर स्थित रणथंभौर, अंबर, जैसलमेर और गगरोन किले हैं। जंतर-मंतर, अंजता-एलोरा की गुफाएं, महाबलीपुरम, कोणार्क का सूर्य मंदिर, चोल मंदिर, कर्नाटक का हंपी, सांची के स्तूप, गया का महाबोधि मंदिर आदि प्रमुख सांस्कृतिक स्थलियां हैं। प्राकृतिक स्थानों के तौर पर कांजीपुरम वन्य उद्यान, नंदा देवी की खूबसूरत पहाडिय़ों के बीच स्थित फूलों की घाटी और केवलादेव पार्क भी इस सूची में शामिल हैं। पहाड़ी इलाकों में रेलवे को इंजीनियरिंग की नायाब मिसाल मानते हुए तमिलनाडु के नीलगीरि और हिमाचल के शिमला-कालका रेलवे को विश्व विरासत होने का गौरव प्राप्त है। कभी विक्टोरिया टर्मिनल के रूप में मशहूर रहा मुंबई का रेलवे स्टेशन आज छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के रूप में विश्व विरासत का हिस्सा है। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, लेह-लद्दाख और सारनाथ के संबंधित बौद्ध स्थल, प. बंगाल का बिशुनपुर, पाटन का रानी का वाव, हैदराबाद का गोलकुंडा, मुंबई का चर्च गेट, सासाराम स्थित शाह सूरी का मकबरा, कांगड़ा रेलवे और रेशम उत्पादन वाले प्रमुख भारतीय क्षेत्रों समेत 33 भारतीय संपत्तियां अभी प्रतीक्षा सूची में हैं। यदि पाक अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्तीतान वाले हिस्से में उपस्थित बाल्तित के किले को भी इसमें शामिल कर लें, तो प्रतीक्षा सूची की यह संख्या 34 हो जाती है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को ने विरासत शहरों की एक अलग श्रेणी और संगठन बनाया है। कनाडा इसका मुख्यालय है। इस संगठन की सदस्यता प्राप्त 233 शहरों में फिलहाल भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का कोई शहर शामिल नहीं है। आप यह जानकर संतुष्ट अवश्य हो सकते हैं कि एक विरासत शहर के रूप में जहां हड़प्पा सभ्यता के सबसे पुराने निशानों में एक-धौलवीरा और आजादी का सूरज उगने से पहले के प्रमुख निशान के रूप दिल्ली को भी ‘विश्व विरासत शहर’ का दर्जा देने के बारे में सोचा जा रहा है। लेकिन दिल्ली-एनसीआर के इलाके को जिस तरह भूकंप की स्थिति में बेहद असुरक्षित माना जा रहा है, क्या इसे संजोना इतना आसान होगा?इन तमाम आंकड़ों से इतर विरासत का वैश्विक पक्ष चाहे जो हो, भारतीय पक्ष यह है कि विरासत सिर्फ  कुछ परिसंपत्तियां नहीं होती। बाप-दादाओं के विचार, गुण, हुनर, भाषा, बोली और नैतिकता भी विरासत की श्रेणी में आते हैं। संस्कृति को हम सिर्फ कुछ इमारतों या स्थानों तक सीमित करने की भूल नहीं कर सकते। भारतीय संास्कृतिक विरासत का मतलब ‘अतिथि देवो भव:’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ से लेकर ‘प्रकृति माता, गुरु पिता’ तक है। गो, गंगा, गीता और गायत्री आज भी हिंदू संस्कृति के प्रमुख निशान माने जाते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब, बाइबल और कुरान को विरासत के चिन्ह मानकर संजोकर रखने का मतलब किसी पुस्तक को संजोकर रखना नहीं है। इसका मतलब उनमें निहित विचारों को शुद्ध मन व रूप में अगली पीढ़ी को सौंपना है। क्या हम ऐसा कर रहे हैं? हमारी पारिवारिक जिंदगी और सामाजिक ताने-बाने में बढ़ते तनाव इस बात के संकेत हैं कि हम भारतीय सांस्कृतिक विरासत के असली संस्कारों को संजोकर  रखने में नाकामयाब साबित हो रहे हैं। हमारा लालच, स्वार्थ, हमारी संवेदनहीनता और रिश्तों के प्रति अनादर हमें भावी बर्बादी के प्रति आंख मूंदने की प्रक्रिया में ले जा चुके हैं। यह सांस्कृतिक विरासत से चूक ही है कि हम कुदरत का अनहद शोषण कर लेने पर उतारू हैं। नतीजा क्या होगा? सोचिए!प्रश्न कीजिए कि क्या हमारे हुनरमंद अपना हुनर अगली पीढ़ी को सौंपने को संकल्पित दिखाई देते हैं? ध्यान, अध्यात्म, वेद, आयुर्वेेद और परंपरागत हुनर की बेशकीमती विरासत को आगे बढ़ाने में यूनेस्को की रुचि हो न हो, क्या भारत सरकार की कोई रुचि है? भारत की मांग पर विश्व योग दिवस की घोषणा को सामने रख हम कह सकते हैं कि हां, भारत सरकार की रुचि है। लेकिन दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि क्या गंगा, गो और भारतीय होने के हमारे गर्व की रक्षा के लिए आज वाकई कोई सरकार, समाज या हम खुद संकल्पित हैं? नैतिकता की विरासत का हश्र हम हर रोज अपने घरों, सड़कों और चमकते स्क्रीन पर देखते ही हैं। पंजाब की बस में हुई अनैतिकता पर क्या हमारा दिल रोया? अनैतिक हो जाने के लिए हम नई पीढ़ी को दोष भले ही देते हों, लेकिन क्या यह सच नहीं कि हम अपने बच्चों पर हमारी गंवई बोली तो दूर, क्षेत्रीय-राष्ट्रीय भाषा व संस्कार की चमक तक का असर डालने में नाकामयाब साबित हुए हैं। सोचिए! अगर हम विरासत के मूल्यवान मूल्यों को ही नहीं संजो रहे तो फिर कुछ इमारतें और स्थानों को संजोकर क्या गौरव हासिल होगा? अपनी विरासत पर सोचने के लिए यह एक गंभीर प्रश्न है। सावधान होने की बात है कि जो राष्ट्र अपनी विरासत के निशानों को संभाल कर नहीं रख पाता, उसकी अस्मिता और पहचान एक दिन नष्ट हो जाती है। क्या भारत ऐसा चाहेगा? यदि नहीं तो हमें याद रखना होगा कि गुरुकुलों, मेलों, लोक कलाओं, लोक कथाओं और संस्कारशालाओं के माध्यम से भारत सदियों तक अपनी सांस्कृतिक विरासत के इन निशानों को संजोए रख सका। माता-पिता और ग्राम गुरु के चरण स्पर्श और नानी-दादी की गोदियों और लोरियों में इसे संजोकर रखने की शक्ति थी। नासिक नगर निगम ने बोर्ड लगाकर चेतावनी दे दी है – ‘गोदावरी का पानी उपयोग योग्य नहीं है।’ अब गंगा-जमुनी संस्कृति की दुर्लभ विरासत भी कहीं हमसे छूट न जाए। भारतीय अस्मिता व विरासत के इन निशानों को संजोना ही होगा। आइए, संजोएं।

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