आपदा और इंटरनेट

May 3rd, 2015 12:20 am

नेपाल में आए भूकंप के दौरान गूगल ने अपनी पहचान का विस्तार किया है और अब वह व्यक्तियों को ढूंढने में सहयोग कर रहा है। इसी तरह फेसबुक अभी तक खुशी के क्षणों को शेयर करने के लिए जाना जाता है, लेकिन अब वह दुःख के क्षणों को बांटने की कोशिश कर रहा है…

utsavआपदा किसी तरह के विभाजन को स्वीकार नहीं करती। इससे अमीर-गरीब, हिंदू-मुसलमान, स्त्री-पुरुष सभी प्रभावित होते हैं। संभवतः इसी कारण आपदा के समय मनुष्य भी सभी तरह के मतभेदों को भूलकर एक दूसरे की सहायता करते हैं। जिसकी जो क्षमता होती है उसके अनुसार वह पीडि़त व्यक्ति की मदद करना चाहता है। इस तथ्य के साथ एक सच्चाई यह भी है कि तकनीक मानवीय संवेदनाओं को नहीं समझती। तकनीक में बुद्धि तो होती है लेकिन भावनाएं नहीं होती। तकनीक अपने आका के आदेश का पालन करते समय यह नहीं देखती कि इससे किसको दुःख-दर्द पहुंचेगा। तर्क तो यहां तक दिया जाता है कि तकनीक खुद तो भावना निरपेक्ष होती है। यह अपने उपभोक्ता को भी संवेदनहीन बना देती है और अपने परिवेश से काट देती है। लेकिन अब ऐसा लगता है तकनीक की दुनिया खुद के अमानवीय होने के कलंक को धोने के लिए बेताब है।  नेपाल में आए महाविनाशकारी भूकंप के दौरान इसकी एक बानगी देखने को मिली। इंटरनेट की दुनिया और उसमें भी विशेषकर सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने जिस तरह भूकंप के बाद त्वरित कदम उठाए और लोगों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए कुछ तकनीकी पहल की, वह वास्तव में एक स्वागत योग्य मानवीय कदम है। यह पहल इस बात की तरफ संकेत भी करती है कि तकनीक की दुनिया अब केवल मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्त करने का प्लेटफार्म ही नहीं उपलब्ध करा रही है बल्कि खुद भी मानवीय हो रही है। नेपाल में आए भूकंप के बाद सर्च इंजन गूगल और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक ‘सेफ्टी चैक’ और ‘पर्सन फाइंडर’ फीचर के जरिए नेपाल में लोगों को अपने बिछड़े प्रियजनों से मिलवाने की कोशिश कर रहे हैं।  लोग छुट्टियां बिताने किस शहर में जा रहे हैं, वहां किस होटल में रह रहे हैं और कब किस रेस्तरां में क्या खा रहे हैं, ये सारी जानकारी फेसबुक पर मिल जाती है। ‘चैक इन’ बटन दबा कर लोग कुछ ही सेकंडों में ये सब इंटरनेट में शेयर कर लेते हैं। इसी तरह की एक सेवा अब फेसबुक ने नेपाल में फंसे लोगों का पता लगाने के लिए शुरू की है। ‘सेफ्टी चैक’ नाम के इस फीचर में फेसबुक यूजर की लोकेशन को देख कर उससे पूछता है कि क्या आप सुरक्षित हैं। लोग हां या न का बटन दबा कर अपना ‘सेफ्टी चैक’ सबके साथ शेयर कर सकते हैं। सुरक्षित न होने की सूचना देने पर फेसबुक यूजर से उसकी सही लोकेशन पूछता है, ताकि उससे संपर्क साधा जा सके। इसी तरह गूगल ने भी ‘पर्सन फाइंडर’ फीचर शुरू किया है। गूगल का मुख्य सर्च पेज खोलते ही लिखा आता है, ‘नेपाल भूकंप संबंधित जानकारी’। इस पर क्लिक करने पर गूगल यूजर को पर्सन फाइंडर के पेज पर ले जाता है, जहां दो विकल्प दिए गए हैं- ‘मैं किसी को ढूंढ रहा हूं’ और ‘मेरे पास किसी के बारे में जानकारी है’। अंग्रेजी के अलावा यह सेवा नेपाली, हिंदी और चीनी भाषा में भी उपलब्ध है। यदि आप किसी को ढूंढ रहे हैं और गूगल के पास उसके बारे में कोई जानकारी नहीं है तो उस व्यक्ति का नाम लापता लोगों की सूची में शामिल हो जाएगा। जैसे ही कोई उस व्यक्ति के बारे में जानकारी देता है तो गूगल आपको इस बारे में सूचित करेगा। अपडेट सब्सक्राइब भी किए जा सकते हैं। साथ ही नाम और पते की जानकारी के साथ- साथ तस्वीर भी अपलोड की जा सकती है। गूगल यह सेवा एसएमएस के माध्यम से भी दे रहा है। गूगल का दावा है कि वह अब तक करीब साढ़े पांच हजार लोगों का डाटाबेस तैयार कर चुका है। अभी तक गूगल को सूचनाओं को खोजने के लिए जाना जाता था और फेसबुक को अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने के प्लेटफार्म के रूप में,  लेकिन नेपाल में आए भूकंप के दौरान गूगल ने अपने पहचान का विस्तार किया और अब वह व्यक्तियों को ढूंढने में सहयोग कर रहा है। इसी तरह फेसबुक अभी तक खुशी के क्षणों को शेयर करने के लिए जाना जाता है लेकिन अब वह दुःख के क्षणों को बांटने की कोशिश कर रहा है।

-जयप्रकाश सिंह

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