‘आप’ के खिलाफ ‘सुपारी’ !

By: May 6th, 2015 12:15 am

क्या मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को ऐसा बयान देना चाहिए कि मीडिया को आम आदमी पार्टी (आप) की ‘सुपारी’ दी गई है? मीडिया का पब्लिक ट्रायल किया जाना चाहिए? या नेताओं की तरह मीडिया को भी बेनकाब करेंगे? ये शब्द दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं ‘आप’ के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सार्वजनिक तौर पर बोले हैं। यह वही मीडिया है, जिसने नई राजनीति के नेता के तौर पर केजरीवाल को गढ़ा था। उनके आंदोलनों और अनशनों के सीधे प्रसारण किए और चुनाव के दौरान भी निजी संवादों के जरिए केजरीवाल को अपने मुद्दे रखने के अवसर दिए। आज मीडिया ने केजरीवाल की कौन सी भैंस खोल ली है कि वह अपराध की दुनिया के शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं? शायद केजरीवाल ने खुद को ‘जस्टिस’ का अवतार मान लिया है कि कौन सी खबर चलेगी और कौन सी खबर दफन की जानी चाहिए। नया संदर्भ ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास और पार्टी की एक मुस्लिम कार्यकर्ता के आपसी संबंधों का है। बुनियादी तौर पर यह अति निजी मामला है। दोनों में अंतरंग, अनैतिक संबंध रहे हैं या नहीं, यह हमारा विषय नहीं है। चूंकि मामला दिल्ली महिला आयोग तक पहुंचा है और अवैध संबंधों का आरोप कुमार विश्वास की पत्नी ने लगाया है। नतीजतन महिला को उसके पति ने घर से बाहर निकाल दिया है। इनसाफ  की गुहार तो उस महिला ने मुख्यमंत्री केजरीवाल को भी की थी, लेकिन कानों पर पत्थर डाल लिए गए। आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह का बयान भी यहीं से शुरू होता है कि मुख्यमंत्री को ही यह मामला निपटा देना चाहिए था। चूंकि मामला अब सार्वजनिक चर्चा में आ गया है, तो स्वाभाविक है कि वह एक खबर भी है। मीडिया उसे नजरअंदाज कैसे कर सकता है? जिस तरह दिल्ली के उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच टकराव की सूचनाएं एक खबर हैं। जिस तरह कानून मंत्री जितेंद्र तोमर की कथित फर्जी डिग्री का मामला एक खबर है। जिस तरह टीवी चैनल पर ‘आप’ के नेता आशुतोष का फफक-फफक कर रोना भी एक खबर थी। जिस तरह जंतर-मंतर पर किसान गजेंद्र की मौत एक बड़ी खबर रही और जिस तरह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण सरीखे ‘आप’ के संस्थापक सदस्यों को पार्टी से ही बेदखल करने का निर्णय एक बड़ी खबर थी। मुख्यमंत्री केजरीवाल ऐसी खबरों से तिलमिलाते क्यों हैं? वह इस निष्कर्ष पर क्यों पहुंच जाते हैं कि मीडिया में ‘आप’ के खिलाफ  साजिश रची जा रही है? किसी ने ‘आप’ को खत्म करने की ‘सुपारी’ मीडिया को दी है? आरोपी से लेकर जस्टिस तक सभी भूमिकाओं में केजरीवाल हमारे सामने आते हैं। केजरीवाल सामूहिकता में ही मीडिया को गाली क्यों देते हैं? उसे बिका हुआ, दलाल या सुपारीबाज क्यों मानने लगते हैं? ऐसे फतवों का दायित्व किसने उन्हें दिया है? बेशक मीडिया में भी ‘गंदी मछलियां’, ‘काली भेड़ें’ हो सकती हैं, लेकिन आप एक ही अपशब्द से संपूर्ण मीडिया को कैसे हांक सकते हैं? मीडिया के जिस तबके से केजरीवाल और ‘आप’ को शिकायत है, वे उसका नाम ले सकते हैं। मीडिया के पब्लिक ट्रायल का अधिकार उन्हें किसने दिया है? पब्लिक ट्रायल का मतलब है कि जनता को उसके लिए उकसाना। ऐसी स्थितियों में जनता मीडिया के दफ्तर या अकेले मीडियाकर्मी पर ही हमला बोल सकती है। ऐसी आपराधिक अराजकता का दायित्व भी मुख्यमंत्री निभाता है क्या? केजरीवाल पब्लिक ट्रायल के स्थान पर मीडिया की जवाबदेही सरीखे शब्दों का इस्तेमाल कर सकते थे। लोकतंत्र में मीडिया को आप अछूत तो बना नहीं सकते। यदि सरकारों और राजनीतिक दलों का महत्त्व है, तो मीडिया भी उतना ही प्रासंगिक है। अलबत्ता ऐसे कई मंच और कानून हैं, जहां मीडिया को भी कटघरे में खड़ा किया जा सकता है, लेकिन आप कुंठा और असहिष्णुता के तहत उस पर ‘सुपारी’ जैसा आरोप चस्पां नहीं कर सकते। आपसी आलोचना का स्वागत है, लेकिन व्यवहार में शालीनता और भाषायी संयम अनिवार्य हैं। यह तय मान लीजिए कि मीडिया सरकार या नेता के मनमाफिक खबरें नहीं चलाएगा। जनता को सूचना देना और उसके जरिए उसे जागृत करना मीडिया का दायित्व है। यदि कुछ तत्त्व इस दायित्व से कन्नी काटते हैं, तो सार्वजनिक तौर पर उनका नाम लें, संबंधित फोरम में शिकायत दर्ज कराएं, लेकिन पूरे मीडिया को कोसने न लगें। बहरहाल केजरीवाल और ‘आप’ के भीतर इतनी जल्दी ऐसी विसंगतियां क्यों आने लगीें। वे तो महिला सुरक्षा और सम्मान के पैरोकार बनते थे। यह मंथन वह खुद करें, लेकिन मीडिया को गाली देना या उस पर पाबंदियां थौपना गैर लोकतांत्रिक और गैर न्यायिक है। उससे जनता के दरबार में केजरीवाल ही, अंतत:, खलनायक बनने लगेंगे।

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