आर्थिक दिक्कतें बढ़ीं, खेती को झटका

newsशिमला— केंद्र सरकार के एक वर्ष के कार्यकाल के दौरान भले ही नीति आयोग के मार्फत हिमाचल को आर्थिक तौर पर आक्सीजन देने की कवायद की गई हो, मगर ऐसे भी कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिनमें कटौती कर कृषि प्रधान प्रदेश की रीढ़ तोड़ने का प्रयास किया गया है। हिमाचल में किसान व बागबान मैदानी इलाकों की तर्ज पर न तो बड़ी जमीनों के मालिक हैं और न ही धन्नासेठ। वे बंजर जमीन पर मेहनत करके आगे बढ़ने का जज्बा रखते हैं। इसमें केंद्रीय सहायता बड़ा रोल निभाती है, मगर एक वर्ष के दौरान कृषि मंत्रालय ने प्रदेश को मिलने वाली फंडिंग में जो कटौती की है, उससे यह वर्ग रुष्ट है। केंद्र सरकार ने राज्य सरकार की आशंकाओं के अनुरूप ही लिखित तौर पर कृषि मंत्रालय के मार्फत झटका दिया है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत अब फंडिंग पैटर्न  90:10 की बजाय 50:50 कर दिया है। यही नहीं, स्वास्थ्य, बागबानी, शहरी विकास, ग्रामीण विकास, ट्रांसपोर्ट सेक्टर की योजनाओं में भी ऐसा ही झटका दिया जा चुका है, मगर इसकी आधिकारिक सूचना अब तक प्रदेश को नहीं मिली है। यानी इन क्षेत्रों में भी जो प्रायोजित स्कीमें 80:20, 70:30 या फिर 90:10 के तहत विशेष श्रेणी राज्य को मिलती थीं, उनमें कटौती कर अब पैटर्न 50:50 किया जा रहा है। बहरहाल, राष्ट्रीय कृषि विकास कार्यक्रम के तहत हिमाचल को अब तक 90 करोड़ सालाना की राशि मिलती रही है। इसमें 10 करोड़ का ही योगदान राज्य देता था। यानी फंडिंग पैटर्न इस संदर्भ में 90:10 था। अब हिमाचल को इस बड़ी योजना के तहत 45 करोड़ वार्षिक दर से ही मिलेंगे। कृषि आधारित ऐसी स्कीमों को कार्यान्वित करने के लिए राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में कमेटी गठित है, जो तय करती थी कि कृषि योजनाओं को कैसे सिरे चढ़ाया जाना है।

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