ईंधन को मिले एथेनॉल की ऊर्जा

May 14th, 2015 12:16 am

( कुलभूषण उपमन्यू लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं )

देश में 20 हजार से 50 हजार करोड़ रुपए तक के फल किसानों से ग्राहक तक पहुंचते-पहुंचते सड़ जाते हैं। सब्जी, आलू आदि भी भारी मात्रा में सड़ जाते हैं। यदि सड़े-गले फलों, सब्जियों और कुछ भाग गन्ने के रस प्रयोग एथनोल बनाने के लिए किया जाए तो पेट्रोलियम के आयात के बोझ को कम किया जा सकता है…

देश में प्राकृतिक जीवाश्म ईंधन की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। पेट्रोलियम पदार्थों की मांग का लगभग 75 प्रतिशत भाग हमें अरब देशों से आयात करना पड़ता है। इसका देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन पदार्थों की कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है, तो यह देश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। देश पर इसका बोझ आर्थिक स्थिति के सामने हमेशा एक बड़ी चुनौती रही है। इसके कारण देश की कुल पूंजी का एक बड़ा हिस्सा जीवाश्म ईंधन की खरीद पर खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा जो देश हमें इसका निर्यात करते हैं, वे हम पर कई बार अवांछनीय दबाव भी बनाते रहते हैं। ऐसे में जब तक भारत अपनी ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भरता के बारे में विचार नहीं करता, तब तक बेबस होकर इस अंतरराष्ट्रीय दबाव को झेलने को मजबूर ही रहेगा। अब यह समय की महत्ती जरूरत है कि इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के बारे में कुछ किया जाए। भारतवर्ष में गन्ना, मौसमी फल, सब्जियों का भारी मात्रा में उत्पादन होता है। देश में 20 हजार से 50 हजार करोड़ रुपए तक के फल किसानों से ग्राहक तक पहुंचते-पहुंचते सड़ जाते हैं। सब्जी, आलू आदि भी भारी मात्रा में सड़ जाते हैं। यदि सड़े-गले फलों, सब्जियों और कुछ भाग गन्ने के रस और शीरे का प्रयोग एथनोल बनाने के लिए किया जाए तो पेट्रोलियम के आयात के बोझ को कम किया जा सकता है। यह ईंधन स्वावलंबन की ओर भी एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा। इसका लाभ किसान की आय में बढ़ोतरी से लेकर देश की सुरक्षा तक प्राप्त होगा, फिर भी इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए कुछ प्रयास तो अपेक्षित रहेंगे ही। सरकार उचित नीति बनाकर छोटे-छोटे उद्यमियों और किसानों को एथनोल बनाने के उद्योग में लगाकर बड़ी मात्रा में रोजगार भी पैदा कर सकती है। सड़े हुए फलों के गूद्द, गन्ने के रस, सब्जियों के गूद्दे में, बेकरी में प्रयोग होने वाला यीस्ट डालकर 36 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 36 घंटे खमीरा डालकर उसका आसवन करके एथनोल (इथाइल अलकोहल) प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए कम कीमती काठे फल भी उपयोग किए जा सकते हैं। जैसे हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड में 4000 फुट से कम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पत्थर नाख का खूब उत्पादन हो सकता है और इसके लिए सबसे नाकारा भूमि भी काम में लाई जा सकती है। बहुत कम मेहनत से इसका भरपूर उत्पादन जंगलों में भी किया जा सकता है। इससे वन्य जीवों को भी कुछ भोजन मिलेगा। बंदरों का फसलों पर हमला कम होगा। किसान भी अपनी बंजर जमीनों में इसे लगाकर लाभ कमा सकेंगे। इस प्रकार इस पहल के जरिए सरकार बहुआयामी लाभ हासिल कर सकती है। अब तो कृषि अपशिष्ट और वनस्पति से एथनोल बनाने की विधि भी विकसित हो चुकी है। वनस्पति में विद्यमान सैलूलोज के सड़ने से वनस्पति से एथनोल, आसवन विधि द्वारा प्राप्त हो सकता है। लिगनिन के कारण सैलूलोज के सड़ने में अड़चन आती है, लेकिन लिगनिन हटाने की विधि का विकास हो चुका है। एथनोल का ईंधन के रूप में इस्तेमाल सस्ता और प्रदूषण रहित विकल्प है। इसके अपशिष्ट से खाद बन जाती है। ब्राजील दुनिया में सबसे ज्यादा एथनोल का प्रयोग करने वाला देश है। 2006 तक ब्राजील के कुल स्पार्क इग्निशन वाहनों के ईंधन का 40 प्रतिशत भाग एथनोल से आ रहा था। वहां गैसोलीन ईंधन में 25 प्रतिशत एथनोल मिलाया जाता है। अब तो विशुद्ध रूप से एथनोल से चलने वाले लाखों फ्लेक्सिबल फ्यूल वाहन वहां की सड़कों पर दौड़ते हैं। 13 क्विंटल गन्ने से एक बैरल पेट्रोलियम के बराबर ऊर्जा एथनोल बनाकर प्राप्त की जा सकती है। यानी लगभग 4000 रुपए की विदेशी मुद्रा की बचत और किसान को गन्ने का बेहतर मूल्य भी दिया जा सकता है। अगर सरकार इस संदर्भ में कुछ ठोस प्रयास कर पाती है, तो इससे प्रकृति के अनवीकरणीय स्रोतों पर से भी हमारी निर्भरता कम होगी। ब्राजील के अनुभव से सीख कर और सस्ती तकनीक विकसित करके एथनोल को पेट्रोलियम के विकल्प के रूप में एक सीमा तक प्रोत्साहित किया जा सकता है। यह देश की बरोजगारों और किसानों की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी कदम होगा। उम्मीद है कि सरकार इस संदर्भ में जल्द कोई मुकम्मल योजना तैयार करके ईंधन तैयार करने की इस तकनीक को व्यवहार में अपनाएगी।

ई-मेलः kbupmanyu@gmail.com

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