उपभोग और लालच की तपिश

By: May 27th, 2015 12:15 am

(तुषार कुमार लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता हैं )

अनेक क्षेत्रों में अधिकतम तापमान के रिकार्ड टूट गए हैं। 45 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक तापमान के  आंकडे़ अभी से दर्ज किए जा रहे हैं। तपिश के ये आंकड़े साबित कर रहे हैं कि पिछले दशकों में इनसान ने प्रकृति से जिस तरह का खिलवाड़ किया है, आज उसी का नतीजा उसे भोगना पड़ रहा है…

देश के कई इलाकों में गर्मी और लू कहर बरपा रही है। गर्मी ने लोगों को बुरी तरह से तोड़कर रख दिया है। सूरज की तपिश से लोग अपने घरों में बैठने को मजबूर हैं, लेकिन घरों में भी राहत नहीं। लगातार हो रही बिजली कटौती ने लोगों का जीना मुहाल करके रखा हुआ है। अनेक क्षेत्रों में अधिकतम तापमान के रिकार्ड टूट गए हैं। 45 डिग्री सेल्सियस और उससे अधिक तापमान के आंकडे़ अभी से दर्ज किए जा रहे हैं। तपिश के ये आंकड़े साबित कर रहे हैं कि पिछले दशकों में इनसान ने प्रकृति से जिस तरह का खिलवाड़ किया है, आज उसी का नतीजा भोगना पड़ रहा है।  एक ओर तेजी से बढ़ते वाहनों व उद्योगों से निकलने वाली हानिकारक गैसें लगातार वायुमंडल को दूषित कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर कम हरियाली व कंकरीट के बढ़ते दायरे तापमान बढ़ाने में आग में घी जैसा काम कर रहे हैं। आमतौर पर ठंडे माने जाने वाले पहाड़ भी गर्म हो रहे हैं, क्योंकि पहाड़ों पर भी तो अंधाधुंध वृक्ष कट रहे हैं। इससे हरियाली को बड़ा आघात पहुंचा है। पहाड़ी इलाके के बूढ़े-बुजुर्गों से बात करने पर पता चलता है कि आज से कुछ वर्ष पहले चारों तरफ  हरियाली थी, जो ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों का शृंगार करती थी। थोड़ी भी गर्मी बढ़ती थी, तो शाम तक बारिश हो जाती और फिर से मौसम सुहाना हो जाता था। पर, अब ऐसा नहीं होता। पहाड़ी इलाकों में भी मैदानी इलाकों की तरह कड़ाके की गर्मी पड़ने लगी है। चिलचिलाती धूप ने सबको बेहाल कर दिया है। अब कितनी भी गर्मी बढ़े, बारिश नहीं होती। कंकरीट क्षेत्र जरूरत से अधिक बढ़ने से वायुमंडलीय वातावरण को क्षति पहुंची है। यह एक वैश्विक स्तर की समस्या है। तापमान वैश्विक स्तर पर बढ़ रहा है। नासा के अर्थ आब्जर्वेटरी के अनुसार पिछले पचास सालों के अंतराल में वैश्विक तापमान में औसतन 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है, लेकिन इसके लिए स्वयं इनसान ही जिम्मेदार है। अनेक इलाकों में पीने का पानी नहीं है। अनेक क्षेत्रों में बिजली नहीं है। मगर जीने के लिए विकल्प भी तैयार हैं और जीवन की गाड़ी आगे बढ़ रही है, परंतु इस किस्म का प्रवाह स्वस्थ वातावरण को खोकर अप्राकृतिक रूप से उपलब्ध कराया जा रहा है, जिसको लेकर कोई भी गंभीर नहीं है। यहां तक कि इस बार मानसून के आगमन में देरी होने के बावजूद चिंता का वातावरण दिखाई नहीं दे रहा है। पानी, बिजली जैसी समस्याओं के लिए लोग हंगामा कर रहे हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी समस्याओं के समाधान का कहीं कोई जिक्र नहीं। मनुष्य को पर्यावरण की इस स्थ्ति को समझना होगा। उसके बाद लगातार प्रकृति के साथ हो रहे खिलवाड़ को रोकना जरूरी है। तभी गर्मी की चिंता और चर्चा का कोई अर्थ हो सकता है, वरना तेज विकास और बढ़ती आबादी के बीच इनसान हर पग पर इसके दुष्परिणाम झेलेगा।  पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ने के पीछे सीधे तौर पर आम से लेकर खास लोग सभी ही जिम्मेदार हैं। बड़े लोगों के घर एसी समेत तमाम आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, मरना तो आम आदमी का है। गरीब आदमी को इस भीषण गर्मी में पीने के पानी तक के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। अब ले-दे कर भीषण गर्मी से राहत दिलाने के लिए मानसून का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है, लेकिन खबर है कि मानसून भी इस बार विलंब से आएगा। यह सब जानते हैं कि बढ़ती गर्मी की वजह क्या है, लेकिन उससे आंखें चुराई जाती रही हैं। मानव चाहे तरक्की के कितने ही दावे क्यों न कर ले, लेकिन प्रकृति के आगे वह हमेशा बेबस रहा है। यही वजह है कि झुलसा देने वाली गर्मी से पार पाने की सभी कोशिशें नाकाम रही हैं। जब पारा 45 डिग्री सेल्सियस से लेकर 48 तक पहुंच रहा है, तो समझा जा सकता है कि गर्मी की प्रचंडता कितनी होगी। मानव ने अपनी सुख-सुविधाओं के चलते हालात ऐसे पैदा कर दिए हैं कि मौसम में जबरदस्त बदलाव हो रहे हैं। पर्यावरणविद लगातार चेता रहे हैं कि प्रकृति से छेड़छाड़ बंद नहीं की गई तो दुनिया को और भी बुरे दिन देखने पड़ सकते हैं, लेकिन चेतावनियों की परवाह ही किसे है?

जंगलों का दोहन लगातार जारी है। हाई-वे बनाने के लिए लाखों पेड़ काट डाले गए, लेकिन उनकी जगह सैकड़ों पेड़ भी नहीं लगाए गए। इसलिए इन पर ऐसे पेड़ नजर नहीं आते, जिसकी छाया में कुछ देर सुस्ता लिया जाए। हाई-वे से पेड़ काटने के बाद उन्हें लगाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन वह कहीं से भी गंभीर नजर नहीं आती। पर्यावरण बचाने का काम चंद एनजीओ के हवाले कर दिया गया है, जो इसके नाम पर क्या करते हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे को देखते हुए दुनिया की सभी सरकारों को चेतने की जरूरत है, लेकिन शायद हम उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां से वापस नहीं आया जा सकता। वह विकास लगातार जारी है, जिसमें मानव जाति का विनाश छिपा है।

ई-मेल : kumar1980tushar@gmail.com

Himachal List

Free Classified Advertisements

Property

Land
Buy Land | Sell Land

House | Apartment
Buy / Rent | Sell / Rent

Shop | Office | Factory
Buy / Rent | Sell / Rent

Vehicles

Car | SUV
Buy | Sell

Truck | Bus
Buy | Sell

Two Wheeler
Buy | Sell

Polls

क्या सड़कों को लेकर केंद्र हिमाचल से भेदभाव कर रहा है ?

View Results

Loading ... Loading ...

Miss Himachal Himachal ki Awaz Dance Himachal Dance Mr. Himachal Epaper Mrs. Himachal Competition Review Astha Divya Himachal TV