क्या दिल्ली ‘पत्थर मार’…!

By: May 13th, 2015 12:15 am

पुलिस की बर्बरता और इनसानियत पर कलंक…! इतना गुस्सा, इतनी उग्रता और ऐसा ‘पत्थर मार’ व्यवहार…! यह पुलिस किसकी और किसके सहयोग के लिए है? हालांकि आज देश में कई महत्त्वपूर्ण घटनाएं सामने आईं। विश्लेषण की दृष्टि से अन्नाद्रमुक की ‘अम्मा’ जयललिता का आय से अधिक संपत्ति के एक पुराने केस में बरी होना एक प्रमुख राजनीतिक घटना थी। भारत-पाक की संभावित क्रिकेट सीरीज पर भाजपा के ही कई सांसदों और पुराने खिलाडि़यों के तेवर आक्रामक थे। संसद में जीएसटी और भूमि अधिग्रहण बिलों को, अंततः, समितियों की समीक्षा के लिए भेजने को मोदी सरकार को सहमति देनी पड़ी। लेकिन इस पूरे परिदृश्य के बीच, राजधानी दिल्ली के ही एक संभ्रांत इलाके में, एक पुलिस वाले ने मात्र 200 रुपए की रिश्वत के लिए, एक युवा महिला के साथ जो पथरीला बर्ताव किया, उससे जहन में कई सवाल कौंधने लगे। क्या दिल्लीवाले इतने गुस्सैल, उत्तेजित, हमलावर होते जा रहे हैं? क्या दिल्ली का ही जागरूक समाज इतना असहिष्णु होता जा रहा है? क्या छोटी-मोटी घटनाओं की परिणति अब हत्या होगी? क्या देश की राजधानी जंगलराज की ओर बढ़ रही है? बेशक एक पुलिसवाले के बर्ताव से ही इन निष्कर्षों पर पहुंचा नहीं जा सकता, लेकिन दिल्ली पुलिस के करीब 85 हजार जवानों के लिए यह हरकत एक बदनुमा दाग है, बेशर्मी है। लिहाजा दिल्ली पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी को अपना बयान देने से पूर्व देश के सामने खेद जताना पड़ा। मामला बेहद सामान्य था, लेकिन उसके निहितार्थ काफी गंभीर थे। बेशक एक स्कूटी सवार युवा महिला ने लालबत्ती पार की होगी! स्कूटी पर उसकी बेटियां भी थीं। ऐसे में कोई भी अप्रत्याशित, आकस्मिक घटना हो सकती थी। लिहाजा यातायात पुलिस वाले ने 200 रुपए का चालान करने का फैसला लिया। महिला ने 200 रुपए की रसीद मांगी या चालान उसके घर भेजने का आग्रह किया, लेकिन पुलिसिया 200 रुपए जेब में डालकर अपनी काली कमाई को और भी बढ़ाना चाहता था। महिला ने भ्रष्टाचार के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया। चूंकि पुलिस की वर्दी और खौफ  को सीधी चुनौती दी गई थी, नतीजतन आनन-फानन में पुलिसवाले ने एक पत्थर महिला को दे मारा। महिला की एक छोटी सी बिटिया, जो स्कूल से लौट रही थी, सहायता के लिए चिल्लाती रही। यह दिल्ली में सरेआम हुआ और यदि उस पुलिसिए पर भीड़ का दबाव न पड़ता, तो वह और भी पत्थर मार सकता था! क्या दिल्ली इतनी अभद्र और हिंसक भी हो सकती है? यह सवाल कल्पना में कौंधता है। दिल्ली की यातायात पुलिस को बेहद अनुशासित और संयमित माना जाता रहा है, लेकिन सवाल है कि उसी बल का एक हैड कांस्टेबल स्तर का व्यक्ति, महज 200 रुपए की घूस के मद्देनजर, इतना हिंसक और अमानवीय हो सकता है? यह घटना अपनी तरह की एकमात्र साबित हो सकती है, लेकिन स्वभाव में इतनी हिंसा घर कर गई है कि बीते दिनों तुर्कमान गेट पर एक बाइक एक कार को जरा सी टच कर गई। प्रतिक्रिया में कार वालों ने वहीं बाइक वाले को पीट-पीट कर मार डाला। इतना गुस्सा, इतना अहंकार…! दिल्ली के ही द्वारका, नरेला, कनॉट प्लेस आदि स्थलों पर बीते दिनों में रोडरेज की कई घटनाएं सामने आई हैं। दिल्ली को एक बस ड्राइवर की कथित हत्या के कारण बसों की हड़ताल झेलनी पड़ रही है। उस संदर्भ में बस एक बाइक को जरा छू गई थी। नतीजतन बाइक सवार ने वहीं ड्राइवर को पीट-पीट कर मार दिया। यह भी देखा गया कि बाइक पर सवार बाइक वाले की मां उसे उकसा रही थी कि मार दे, बेटा। मत छोडि़ओ इसे। यह मानसिकता क्या है? दरअसल यह असहिष्णुता हमें व्यथित करती है। ऐसा लगता है कि पूरी दिल्ली को मानसिक उपचार की जरूरत है। पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी का कहना है-देश के पूर्व, पश्चिम, दक्षिण इलाकों की तुलना में उत्तर भारत के लोगों का बर्ताव ज्यादा गुस्सैल, उग्र है। लिहाजा एक संपूर्ण संस्कृतिगत बदलाव की जरूरत है। बहरहाल जिस राहगीर ने उस घटना का वीडियो बनाया होगा, उसे पर्याप्त साक्ष्य माना गया और हैड कांस्टेबल को नौकरी से ही बर्खास्त कर दिया गया। पुलिस नेतृत्व का यह निर्णय एक उदाहरण बन सकता है। पुलिस ने सिपाही से आयुक्त तक सभी कर्मचारियों और अधिकारियों का मनोचिकित्सक से जांच कराने का भी फैसला लिया है, लेकिन दिल्ली का व्यवहार चिंतित करने वाला है। दिल्ली पूरी दुनिया में भारत का पहला चेहरा है। यदि इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया होगा, तो सोचिए, भारत की छवि पर विदेशों में क्या आकलन जारी होंगे!

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