जरूरी है जंगलों की प्रबंधन योजना

By: May 27th, 2015 12:15 am

(डेविड एडवर्ड्ज लेखक, शेफिल्ड विश्वविद्यालय में संरक्षण विज्ञान के व्याख्याता हैं)

हालांकि मनुष्य के लालच एवं मांस भक्षण के तेजी से बढ़ने की वजह से इस बात की पूरी संभावना है कि अभी और जंगल नष्ट होंगे। खेती की उपज और उत्पादकता दोनों बढ़ा भी ली जाती हैं, तो भी वर्तमान व भविष्य की मांग में अंतर तो बना ही रहेगा। यह कठिन प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि यह विस्तार कहां पर होगा। छोटे और विखंडित जंगलों के गिरते स्तर को रोकने से भी इस संकट से निपटने में कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है। यह सच है कि विखंडन की समस्याओं का कोई सरल उत्तर नहीं है, परंतु जंगलों को वैश्विक प्रबंधन योजना की तत्काल सख्त आवश्यकता है…

एक समय था जब पृथ्वी उप उत्तरधु्रवीय शीत वनों से लेकर अमेजन व कांगो बेसिन तक विशाल जंगलों में पटी पड़ी थी। जैसे-जैसे मानव ने इस ग्रह के कोने-कोने में बसना शुरू किया, वैसे-वैसे हमने खेत बनाने और शहर एवं कस्बे निर्मित करने के लिए बड़े क्षेत्रों की लकड़ी काट डाली। जंगलों के नाश के जैव विविधता पर नाटकीय प्रभाव पड़े और आज यह हमारे अस्तित्व के संकट का प्राथमिक कारण बन गया है।  मैं बोर्निया में काम करता था। वहां पाम तेल रोपण हेतु बड़े क्षेत्र के उष्ण कटिबंधीय वन काट डाले गए। तकरीबन 150 जंगली चिडि़यों के स्थानापन के रूप में खेती से संबंधित कुछ प्रजातियों  को वहां ले आया। अब जंगल सामान्यतया या तो भीतरी हिस्सों में या पाम रोपणी के किनारे ही दिखाई देते हैं। यह प्रक्रिया विश्व भर में दोहराई जा रही है। साइंस एडवांसेस में प्रकाशित नए शोध के अनुसार अब समस्या यह है कि बचे हुए अशिकांश जंगल विखंडित या टुकड़ों-टुकड़ों में बंट गए हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो बचे हुए जंगल रूपांतरित भूमि के विशाल आकार की वजह से तेजी से अन्य जंगलों में अलग होते जा रहे हैं और पाया जा रहा है कि उनका आकार लगातार छोटा होता जा रहा है। गौरतलब है कि यह वन विनाश या वन कटाई से भी ज्यादा खतरनाक है। नार्थ केरोलिना स्टेट विश्वविद्यालय के निक हड्डाड की अगवाई वाले समूह ने दुनिया के पहले वृक्ष आच्छादन हाई रेजोलूशन सेटेलाइट नक्शे का इस्तेमाल यह मापने के लिए किया कि बचे हुए जंगल एक गैर वन  सीमा से कितने पृथक हैं। यह स्थिति किनारे पर वन कटाई गतिविधियों की भरमार, सड़कों से लेकर पशुओं के चरागाह और तेल के कुओं के साथ ही साथ नदियों से पैदा हुई थी। उन्होंने पाया कि बचे हुए 70 प्रतिशत जंगल किनारों से महज एक किलोमीटर (0.6 मील) के अंदर स्थित हैं। इतना ही नहीं, किनारे से महज 100 मीटर टहलते हुए आप 20 प्रतिशत वैश्विक जंगल में अपनी आमद दर्ज करा सकते हैं। यदि विभिन्न अंचलों की तुलना करें तो जो स्थिति पाई गई वह और भी अचंभित कर देने वाली थी। यूरोप और अमरीका में अधिकांश जंगल किनारे से महज एक किलोमीटर की दूरी पर हैं। इन क्षेत्रों में सबसे दूरदराज स्थित वनों में मानव गतिविधि की बात करें तो अब यह वन पत्थर  फेंकने जितनी दूरी पर स्थित हैं। इस सबसे बच पाना इतिहास में इससे पहले कभी भी इतना चुनौतीपूर्ण नहीं था। यदि आप बड़ी मात्रा में दूरदराज या दूरस्थ वनों को देखना चाहते हैं तो आपको अमेजन, कांगो या मध्य एवं सुदूर पूर्वी रूस, मध्य बोर्नियो और पापुआ न्यू गुयाना जाना पड़ेगा। ये खोजें उतनी चेतावनी भरी नहीं होतीं, यदि वन्य जीवन और जंगल जो कि कार्बन संग्रहण एवं पानी जैसी सेवाएं मनुष्यों को उपलब्ध कराते हैं, वे वनों के खंडित (छितरा जाने) से संकट में न पड़ी होतीं। लंबे समय तक हुए सतत विखंडनों पर प्रयोग करने के बाद हड्डाड एवं उनके साथी बताते हैं कि इन विखंडनों से जैव विविधता में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है। इससे ऐसी लाखों लाख वन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा बढ़ता जा रहा है, जिनके बारे में हम अभी भी बहुत कम जानते हैं। वन प्रजातियों को किनारे पर रहकर अपना अस्तित्व बचाए रखने में जबरदस्त संघर्ष करना पड़ता है, क्योंकि वे जहां जंगलों के भीतर रहते थे, उसकी बनिस्बत यह क्षेत्र अधिक रोशनी वाले, ज्यादा चौड़े एवं गर्म हैं। ये किनारे अनियंत्रित बेलों से भर गए हैं और वहां पर अनेक परजीवी प्रजातियों ने अतिक्रमण कर लिया है, जो कि गहरे जंगल में पाई जानी वाली प्रजातियों से बहुत ज्यादा हो गई है। उदाहरणार्थ के लिए बोर्नेओं में वनों के छोटे हिस्से में निवास कर रहा चिडि़यों का समुदाय बजाय विशाल जंगलों में रहने वाली चिडि़यों के, पड़ोस के पाम वृक्षों में रहने वाली पक्षियों जैसा ज्यादा प्रतीत होता है। विशाल कार्बन समृद्ध वृक्षों का इस तरह के बनाए गए जंगल इकोसिस्टम में बचे रहना बहुत कठिन होता जा रहा है। ये छोटे-छोटे पैबंद इन वृक्षों की व्यवहार्य संख्या बनाए रखने में सफल नहीं हो सकते और यह धीमे-धीमे विलुप्ति की ओर बढ़ते जाएंगे। वैश्विक जंगलों के मुनष्य के अत्यंत समीप आ जाने से चिंपाजी, गोरिल्ला आदि का शिकार हो रहा है और वे विलुप्ति के कगार पर पहुंच रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप बड़े जानवर उन हिस्सों में जा रहे हैं, जो कि छोटी कभी प्रजातियों का रहवास हुआ करता था। इसके अलावा शिकारी भी किनारों से कई किलोमीटर भीतर तक खेल की तरह दौड़-कूद लगा रहे हैं, जिससे जंगल अब काफी छोटे नजर आने लगे हैं। इस स्थिति के प्रबंधन हेतु कठिन निर्णय  लेने होंगे। विखंडन के कपटपूर्ण प्रभावों का अर्थ है कि अब हमें जंगल के वातावरण को और अधिक बर्बाद होने या वहां अतिक्रमण न होने देने के लिए संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इसे रोककर ही हम वैश्विक जंगल विखंडन और जैव विविधता की ओर अधिक हानि को रोक सकेंगे, परंतु हमें विखंडित क्षेत्रों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। इनमें से कुछ को जैसे ब्राजील का अटलांटिक वन, उष्णकटिबंधीय एंडेम व हिमालय में जैव विविधता की कमी, प्रजातियों पर संकट और भीषण विखंडन का जहरीला मिश्रण झेलना पड़ रहा है। अनेक विलुप्त प्राय प्रजातियां अत्यंत छोटे क्षेत्र में सिमट कर रह गई हैं। इसके कारण जैव विविधता का ढांचा बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। इसी कारण भविष्य के कई संकट उभर कर सामने आने लगे हैं। कई जगह तो यह विखंडन चरागाहों और सड़कों की वजह से हुआ है। यदि हमें इन्हें विलुप्ति से बचाना है तो आवश्यक है कि विशाल विखंडित क्षेत्रों के मध्य जुड़ाव स्थापित किया जाए एवं वन आच्छादन को पुनः स्थापित किया जाए। तभी इस विकट संकट से बच पाना संभव हो पाएगा। हालांकि मनुष्य के लालच एवं मांस भक्षण के तेजी से बढ़ने की वजह से इस बात की पूरी संभावना है कि अभी और जंगल नष्ट होंगे। खेती की उपज और उत्पादकता दोनों बढ़ा भी ली जाती हैं तो भी वर्तमान व भविष्य की मांग में अंतर तो बना ही रहेगा। यह कठिन प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि यह विस्तार कहां पर होगा। छोटे और विखंडित जंगलों के गिरते स्तर को रोकने से भी इस संकट से निपटने में कुछ सहायता अवश्य मिल सकती है। यह सच है कि विखंडन की समस्याओं का कोई सरल उत्तर नहीं है, परंतु जंगलों को वैश्विक प्रबंधन योजना की तत्काल सख्त आवश्यकता है।

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