परंपरा के शोधक संत कबीर

By: May 30th, 2015 12:16 am

कबीरदास सच जानने के लिए बुखारा पहुंचे और वहां संतों और फकीरों को दी जा रही यातना देखकर बहुत दुखी हुए। कबीर ने उनसे कहा कि भगवत भजन कीजिए, जिसकी कृपा से यह चक्की अपने आप चलेगी और उन्होंने यह कह कर चक्की को छू दिया। उनके छूते ही चक्की चलने लगी…

Aasthaकबीर  को कुछ लोग भारतीय परंपरा का विद्रोही साबित करने की कोशिश करते हैं और अपने पक्ष को सही साबित करने के लिए उनके कुछ गिने-चुने उद्धरणों का प्रयोग करते हैं। वास्तविकता इसके उलट है। क्योंकि भारत की मूल मान्यता आध्यात्मिकता, कर्म सिद्धांत, आत्मा-परमात्मा संबंधी विचारों का कबीर ने कोई विरोध नहीं किया था, उनका विरोध तो धर्म के नाम पर किए जा रहे अनाचार और कर्मकांड से था।  उन दिखावों से था जो व्यक्ति को अनुभूति का वैभव उपलब्ध नहीं कराते बल्कि उन्हें मिथ्या दिखावों के बंधनों में बांधते हैं। अपने साहित्य से कबीर ने जन चेतना को जगा कर समाज में व्यवस्था परिवर्तन के बीज बोए थे, लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि वह आध्यात्मिकता के प्रबल पोषक थे। उनका पूरा साहित्य ही आत्मा-परमात्मा, पाप-पुण्य जैसी आध्यात्मिक शब्दावली से भरा पड़ा है। वह लिखते हैं-

यह संसार कागद की पुडि़या, बूंद पड़े घुल जाना है। यह संसार कांटे की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह संसार झाड़ और झांखर, आग लगे बरि जाना है। कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरु नाम ठिकाना है। वह दिखावों के कितने विरोधी थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने स्वयं की सिद्धियों का अनावश्यक प्रदर्शन कभी नहीं किया। उनका व्यक्तित्व भी अन्य रहस्यदर्शियों की तरह कई सिद्धियों को समेटे हुए था लेकिन उन्होंने इनका प्रयोग कुछ गिन-चुने मौकों पर ही किया। ऐसी ही एक कथा के अनुसार अरब देश के बुखारा शहर में सुल्तान इब्राहिम ने कैदखाने में  चक्की लगवाई थी, जिसे उसके शासन में गिरफ्तार किए गए साधु संतों से चलवाया जाता था। सुल्तान इब्राहिम साधु संतों और फकीरों को अपने दरबार में बुलवाता था और उनसे अनेक प्रश्नों का समाधान पूछता था। साधु संत जब उसकी शंकाओं और जिज्ञासा का समाधान नहीं कर पाते थे तो उन्हें कैदखाने में डालकर इस भारी चक्की को चलाने का दंड दिया जाता था। संत कबीरदास को पंजाब भ्रमण के दौरान उनके अनुयायियों ने बुखारा में संतों को दी जा रही यातना की जानकारी दी और उनसे इस बारे में कुछ करने को कहा। कबीरदास सच जानने के लिए बुखारा पहुंचे और वहां संतों और फकीरों को दी जा रही यातना देखकर बहुत दुखी हुए। कबीर ने उनसे कहा कि भगवत भजन कीजिए, जिसकी कृपा से यह चक्की अपने आप चलेगी और उन्होंने यह कह कर चक्की को छू दिया। उनके छूते ही चक्की चलने लगी और माना जाता है कि तबसे वह चक्की लगातार चल रही है। बाद में कबीर पंथ के पांचवें संत लाल साहब उस चक्की को भारत लाए और कबीर मठ में स्थापित किया।

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