पर्यटन से एनजीओ का रिश्ता

By: May 13th, 2015 12:15 am

हिमाचल प्रदेश दो वजह से कहीं अधिक पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है और यह सामान्य परिस्थितियों से भिन्न आपदाओं की जद में आए कश्मीर-उत्तराखंड के हालात से प्रभावित दिशा है। आश्चर्य है कि हिमाचल का पर्यटन से रिश्ता इतना नाजुक व कमजोर है कि हमें सामान्य रूप से कम प्राथमिकता मिलती है या हमने पर्यटन प्राथमिकताएं तय नहीं कीं। पर्यटन विकास बोर्ड उपाध्यक्ष के रूप में मेजर विजय सिंह मनकोटिया कुछ नई राहें खोज रहे हैं, जहां मंजिल पर तस्वीर है, लेकिन मकसद को मुकाम बनाने की जद्दोजहद चाहिए। यह पर्यटन से रिश्ते कायम करने की तहजीब है, जो निजी भागीदारी से बढ़ेगी। कई अनूठे प्रयोग गैर सरकारी संगठनों के मार्फत हो सकते हैं, जबकि स्थानीय निकायों की पैरवी में पर्यटन का मॉडल अपना अलग ढांचा विकसित कर सकता है। प्रदेश सरकार चाहे तो एनजीओ, स्थानीय निकाय, शिक्षण संस्थान व विद्युत परियोजनाओं के साथ मिलकर पर्यटन के कई सेतु विकसित होंगे। उदाहरण के लिए कांगड़ा के चाय बागान मालिक व शहद उत्पादक सहकारी सभाओं को जोड़ा जाए तो प्रदेश से लौटते सैलानी के पास यादगार सामग्री होगी। सहकारिता क्षेत्र के तहत चाय, जूस व शहद फैक्टरियों के विजिट आयोजित करके पर्यटन क्षेत्र में जिज्ञासा के तत्त्व शांत किए जा सकते हैं, जबकि इसके साथ हिमाचली ब्रांड में निखार आएगा। प्रदेश की एनजीओ चिंताओं के केंद्र में पर्यटन को छूने का एहसास अगर जाग जाए, तो सारे क्रियाकलाप अपने आप में मौलिक आकर्षण होंगे। पर्यावरण संरक्षण या किसान-बागबानों के उत्थान में लगी संस्थाएं अपने लक्ष्यों के साथ पर्यटन को बेहतर ढंग से निरूपित कर सकती हैं। हिमाचली खेत की अलग पहचान तथा सिंचाई के पारंपरिक तरीकों  के नजदीक सैलानी को पहुंचाने का काम एनजीओ कर सकते हैं। होम स्टे योजना का एक पहलू ऐसे स्थानों या क्षेत्र से जोड़ सकते हैं, जहां गैर सरकारी संस्थाएं कुछ अलग कर रही हैं। पर्यटन योजनाएं अगर जन भागीदारी ढूंढें तो घराट और घराट का पानी डेस्टीनेशन बन जाएगा। प्रदेश के हिम ऊर्जा विभाग को 50 घराटों के संरक्षण तथा इनके जरिए विद्युत उत्पादन के लिए केंद्रीय मदद मिल रही है और अगर योजनाओं के प्रारूप में पर्यटन को सम्मिलित किया जाए तो पूरे उद्योग में ऊर्जा का प्रसार होगा। इसी से जुड़ता है ग्रामीण पर्यटन और जहां प्रगतिशील पंचायतों को अपने विकास के शृंगार में पर्यटन रस जोड़ लेना चाहिए। हमारी खड्डें, नाले, बावडि़यां और तालाब अपने विकास प्रारूप को पर्यटन आकर्षण में विकसित कर सकते हैं, तो खेतीबाड़ी के आलम में ऐसे बिंदु छुए जा सकते हैं। फूल तथा फलों की नर्सरियों के साथ पर्यटन का गहराई के साथ रिश्ता कायम करते हुए हम कई सीजन देख सकते हैं। स्लेट की खानों या मत्स्य आखेट के स्थानों पर ग्रामीण पर्यटन सदा आलोकित करेगा। प्रदेश के नगर निकायों को पर्यटक उम्मीदों से जुड़कर अपनी अधोसंरचना का विकास करना होगा। हर शहर की चारों दिशाओं में सामुदायिक प्रदर्शनी, मेला या पार्किंग मैदान विकसित करके हम पर्यटन के हर दबाव का हल निकाल सकते हैं, तो इसी के अनुपात में गतिविधियों के वार्षिक कैलेंडर भी निर्धारित होंगे। शहरों में फूड फेस्टिवल, सांस्कृतिक समारोह, खेल आयोजन, पुस्तक व व्यापारिक मेलों से आंतरिक पर्यटन ठांठें मारेगा और इससे नगर निकायों की आर्थिक क्षमता का विकास भी होगा। पर्यटन क्षेत्र के माध्यम से प्रदेश की छवि का मूल्यांकन तथा नागरिक जिम्मेदारी के एहसास को रेखांकित करते उद्देश्यों के साथ इसे नत्थी करना होगा।

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