योग्यता के आसमान पर

By: May 27th, 2015 12:15 am

समाज अपने लिए सफलता के मानक व रास्ते तय करता है और इस हिसाब से हिमाचली परिदृश्य में आ रहे बदलाव स्पष्ट हैं। हर साल परीक्षा परिणामों  का स्कूली सफर एक साथ कई भूमिकाएं तय करता है और इनके बीच अभिभावकों का योगदान हमेशा नए आकाश छूता है। हिमाचली बच्चों ने न केवल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड के माध्यम से खुद को साबित किया, बल्कि आईसीएसई और सीबीएसई के पटल पर भी नए आंकड़े लिख दिए। तीनों बोर्डों की वार्षिक उपलब्धियों में अगर हिमाचली बच्चे 97 प्रतिशत तक अंक प्राप्त करके सफलता दर्ज कर रहे हैं तो इस जुनून की ताजपोशी में शिक्षा को फिर से लिखना पड़ेगा। प्रदेश के विभिन्न स्कूलों से हर साल अगर करीब हजार बच्चे भी नब्बे फीसदी अंकों के उस पार पहुंच रहे हैं तो इस सफर का मुकाम शोहरत और क्षमता से निरूपित होगा। मानव संसाधन निर्माण की हैसियत एक बार फिर सीबीएसई की जमा दो परीक्षा परिणाम से मिली, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर से कहीं अधिक 86 प्रतिशत बच्चों ने उत्तीर्ण होकर रिकार्ड कायम किया। राष्ट्रीय स्तर पर काबिलीयत के मानदंड हासिल करके, हजारों बच्चे औसतन अस्सी फीसदी से अधिक अंकों से संभावना टटोल रहे हैं। परीक्षा, प्रतीक्षा के साथ प्रेरणा के ऊर्जा स्रोत अगर मजबूत होंगे तो हिमाचली योग्यता का डंका नए आसमान छू पाएगा। गगल जैसे छोटे से गांव का बच्चा अगर आईसीएसई परीक्षा में 97 प्रतिशत अंक लेकर चकित कर सकता है तो इसमें सर्वश्रेष्ठ योगदान छात्रों और अभिभावकों का है। प्रायः बच्चों-अभिभावकों के कारण निजी स्कूलों के रिकार्ड सुधर रहे हैं, जबकि सरकारी इमारतों के मेहनती कक्ष भी कमजोरी से दर्ज होते हैं। कारण स्पष्ट है कि मेहनती अभिभावक व प्रतिभाशाली बच्चे केवल निजी स्कूलों की छत चाहते हैं, भले ही पढ़ाई की बेहतर सुविधाएं सरकारी शिक्षण संस्थानों में उपलब्ध हों। कुछ निजी अकादमियां कई मायनों में, निजी स्कूलों से बेहतर काम कर रही हैं। ऐसे में प्रतिष्ठित हो रहे स्कूलों को देखते हुए सरकार को अपने परिसरों का मूल्यांकन करना चाहिए, ताकि सुविधाओं व अधोसंरचना का सर्वश्रेष्ठ इस्तेमाल किया जा सके। आरंभिक तौर पर प्रदेश के दो दर्जन स्कूलों को प्रतिष्ठित बनाने की नीति बनाई जाए। करीब एक दर्जन स्कूलों को शिक्षा बोर्ड मॉडल बनाकर चलाए, जबकि अन्य को सीबीएसई के तहत चलाया जाए। प्रदेश के प्रमुख शहरों के स्कूलों की अगर ब्रांडिंग की जाए तथा वहां प्रवेश परीक्षा के आधार पर दाखिला दिया जाए तो सरकारी भवन भी अपनी इज्जत संवार पाएंगे। ऐसे स्कूलों को त्वरित रूप से सीबीएसई के तहत लाकर सरकार अपने बजट को बेहतर साबित कर पाएगी। स्कूल शिक्षा बोर्ड के मुख्य परिसर के साथ एक राज्य स्तरीय करियर अकादमी की स्थापना के अलावा हिमाचल के चारों सरकारी विश्वविद्यालयों, आईआईटी मंडी, एनआईटी हमीरपुर, निफ्ट कांगड़ा व राष्ट्रीय होटल प्रबंधन संस्थान हमीरपुर के माध्यम से ऐसे प्रयास किए जा सकते हैं, ताकि काउंसिलिंग के जरिए योग्यता को दिशा मिले। प्रदेश के हजारों छात्र हर साल अलग-अलग परीक्षाओं के लिए प्रदेश के बाहर भटकते हैं। अगर प्रवेश व करियर परीक्षाओं के मुख्य केंद्र के रूप में स्कूल शिक्षा बोर्ड धर्मशाला तथा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला में अधोसंरचना विकसित करें तो शिक्षा की मंजिलों का हर सूरत विस्तार होगा। प्रदेश सरकार सैन्य सेवाओं के लिए हमीरपुर में अकादमी का संचालन कर सकती है, जबकि प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालय तथा राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान स्टार्ट अप हब के रूप में शिक्षा का नाता रोजगार व निवेश से जोड़ सकते हैं। विडंबना यह है कि हिमाचल अपने टॉप रैंकिंग छात्रों से रू-ब-रू नहीं होता और न ही ऐसी सोच पैदा हुई। प्रदेश में करीब दो से तीन हजार छात्र हर साल जमा दो परीक्षाओं के माध्यम से अपनी प्रतिभा की मंजिल बताते हैं। ऐसे में अगर इन बच्चों के माध्यम से हिमाचल को अपनी क्षमता का विस्तार करना है तो एक सालाना परिचर्चाका दौर आयोजित करना होगा। बच्चों की सामान्य परिधि के भीतर भी एक ऊर्जावान हिमाचल देखा जा सकता है, बशर्ते हम काउंसिलिंग के जरिए इसका निरूपण करें। स्कूल शिक्षा बोर्ड, शिक्षा विभाग तथा विश्वविद्यालयों को अध्ययन व परीक्षा कक्ष के बाहर सामान्य छात्रों की क्षमता को सांचे में ढालने की रणनीति बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि मैरिट सूचियों के बाहर भी मानव संसाधन की दक्षता और उपलब्धियों का हुजूम इंतजार करता है।

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