सलमान प्रकरण के संदेश

By: May 13th, 2015 12:16 am

( नवीन जैन लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )

फिल्मी दुनिया को मालूम होना चाहिए कि भारतीय न्याय व्यवस्था ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ भी कोई नरमी नहीं बरती थी। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को दिल्ली की एक निचली अदालत ने एक मामले में तीन साल की सजा सुना दी थी। यह बात अलग है कि बाद में ऊपरी अदालत ने यह सजा रद्द कर दी। नरसिम्हा राव इस मुकदमे के पहले प्रधानमंत्री रह चुके थे। हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दिल्ली की ही एक अदालत ने सम्मन जारी कर दिया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस सम्मन पर रोक लगा दी। जब हमारी न्याय प्रणाली पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ भी आम आदमियों जैसा व्यवहार करती है, तो फिल्मी सितारे अपने को कानून से ऊपर क्यों मानते हैं…

भारतीय मानस इस मामले में भी भोला सा लगता है। उसको प्रायः लगता है कि बड़े लोगों या सेलिब्रिटी का कानून कुछ नहीं बिगाड़ सकता। ये लोग कानून से ऊपर होते हैं, लेकिन भारतीय जनमानस की इस धारणा को हमारी न्यायिक व्यवस्था ने कई बार तोड़ा है और बताया है कि बड़े लोग या सेलिब्रिटी उसके लिए आम आदमी जैसे ही हैं। इसकी एक और मिसाल पिछले दिनों मिली जब फिल्मी दुनिया के बहुचर्चित अभिनेता सलमान खान को 2002 के मशहूर हिट एंड रन केस में मुंबई की सेशन कोर्ट ने पांच साल की सजा सुनाई तथा 25 हजार रुपए का जुर्माना भी किया। बाद में मुंबई की हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सेशंस कोर्ट द्वारा सलमान की पांच साल की सजा पर रोक लगाने के साथ ही उन्हें अपील पूरी होने तक जमानत दे दी। कोर्ट ने सलमान को निर्देश दिया कि वह निचली अदालत में समर्पण करे और 30 हजार रुपए का ताजा मुचलका भरे। सलमान ने कोर्ट के आदेश का पालन किया। अब मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी। सलमान खान को जिस मामले में सजा मिली है, वह 28 सितंबर 2002 की रात का है। सलमान उस रात मुंबई के जुहू इलाके से अपने घर लौट रहे थे। वह अपनी एसयूवी कार खुद चला रहे थे। उनके साथ उनके कुछ दोस्त भी थे। वह नशे की हालत में थे। उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था। सलमान की अनियंत्रित हुई गाड़ी ने फुटपाथ पर सोए पांच आदमियों को कुचल दिया, जिनमें से एक की मौत हो गई और चार अन्य घायल हो गए। इस मामले में ध्यान देने की बात यह है कि सलमान पर मुकदमा भारतीय दंड संहिता की धारा 279 के अंतर्गत पंजीबद्ध हुआ था। ऐसे मुकदमे उन लोगों पर लगते हैं जो लापरवाही से अपने वाहन चलाते हैं। यदि उनका दोष किसी मामले में सिद्ध हो जाए तो उन्हें सिर्फ  दो साल की सजा मिलती है। सलमान के मामले में कुछ अलग हुआ। इस मामले की सुनवाई जब मेट्रोपोलिटीन मजिस्ट्रेट की कोर्ट में प्रारंभ हुई तो संबंधित जज ने निष्कर्ष निकाला कि सलमान पर लगाई गई धारा और उन पर लगे आरोप आपस में मेल नहीं खाते। इसलिए उन्होंने 2012 में इस मामले में धारा 304 (दो) यानी गैर इरादतन हत्या, धारा 338 यानी दूसरों को गंभीर चोट पहुंचाना, धारा 337 यानी अपनी जान को जोखिम में डालना और मोटन वाहन अधिनियम की कुछ अन्य धाराएं भी जोड़ दीं। उक्त मजिस्ट्रेट ने प्रकरण सेशन कोर्ट को भेज दिया। यहां नोट कर लें कि हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो कहता हो कि अल्कोहल पाए जाने पर गैर इरादतन हत्या का मामला बनता हो। हाई कोर्ट ने सवाल किए कि सेशन कोर्ट ने कांस्टेबल रवींद्र पाटिल के बयान को क्यों नहीं माना? ड्राइवर अशोक सिंह के बयान को दरकिनार क्यों किया गया? कमाल खान का बयान क्यों दर्ज नहीं किया गया? और धारा 304 (दो) के बारे में पहले क्यों नहीं सोचा गया? हाई कोर्ट ने कुछ अन्य सवाल भी उठाए और इनके आधार पर सलमान को जमानत दे दी गई। बालीवुड के भाई, बड़े पर्दे के दबंग और छोटे पर्दे के बिग बॉस कहे जाने वाले सलमान का इस निर्णय से सदमे में आना अलग बात है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर फिल्मी सितारे अपने आप को समझते क्या हैं? बेशक एक बड़े जनसमूह का फिल्मी सितारों के साथ भावनात्मक जुड़ाव रहा है। अपने मनपसंद सितारे की एक झलक तक पाने के लिए उनके प्रशंसक उतावले रहते हैं, तो क्या इसका यह मतलब समझा जाए कि समाज के साथ-साथ लोकतंत्र की न्याय जैसी व्यवस्थाओं में भी उन्हें विशेष तौर पर देखा जाए। क्या वे ये मानते हैं, चूंकि प्रायः दर्शक उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं, इसलिए वे कानून से भी बच जाएंगे। संजय दत्त का ही उदाहरण लें। वह लोकप्रिय अभिनेता तो थे ही, केंद्रीय मंत्री सुनील दत्त और राज्यसभा सदस्य रहीं फिल्म अभिनेत्री नर्गिस की संतान हैं। इसी आधार  पर  वह  अकसर मनमानी करते रहे और बात यहां तक पहुंची कि उन पर अवैध रूप से शस्त्र रखने का आरोप लगा, जिसके कारण उन्हें पांच साल के कारावास की सजा सुनाई गई। वह अभी जेल में ही अपनी यह सजा काट रहे हैं। फिल्मी दुनिया के सबसे चर्चित अभिनेता, जिन्हें किंग खान कहा जाता है, वह शाहरुख खान भी वानखेड़े स्टेडियम के बीच में आ गए थे। उन्हें जब सुरक्षाकर्मियों ने रोकने की कोशिश की तो वह अपने तीखे तेवर दिखाने से बाज नहीं आए। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता फिरोज खान के बेटे फरदीन खान, जो खुद भी एक अभिनेता हैं, को कोकीन रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। कोकीन की मात्रा चूंकि कम थी, इसलिए वह छूट गए। अभिनेता सैफ  अली खान होटल में एक प्रवासी भारतीय से भिड़ लिए थे। शक्ति कपूर के लिए मशहूर है कि अकसर वह पार्टियों से जब लौटते हैं, तो उनके शरीर पर चोटों के निशान होते हैं। शाइनी आहूजा का नाम बलात्कार के मामले में चर्चित हो चुका है। यहां खास तौर पर जिक्र किया जाना जरूरी है कि फिल्मी दुनिया के ट्रेजेडी किंग कहे जाने वाले दिलीप कुमार पर जब पाकिस्तानी एजेंट होने का आरोप लगा था तो फिल्मी दुनिया का शायद ही कोई व्यक्ति उनके समर्थन में खड़ा हुआ था। वैसे गुजरे जमाने के नामवर फिल्म अभिनेता बलराज साहनी भी जेल गए थे, लेकिन वह किसी आपराधिक मामले में नहीं फंसे थे, बल्कि अपनी वामपंथी विचारधारा के कारण उन्हें जेल का मुंह देखना पड़ा था। अदालत में सलमान के वकील सलमान की दरियादिली का हवाला देते रहे। यह बात खास तौर पर कही गई कि सलमान बीइंग ह्यूमन संस्था चलाते हैं, जिससे कई लोगों को मदद मिलती है। अब संदर्भ निकला है तो बताना जरूरी है कि इस संस्था की स्थापना भी हिट एंड रन प्रकरण के बाद 2007 में हुई थी। हो सकता है  कि सलमान वाकई जरूरतमंद लोगों की मदद करते हों, लेकिन इस कारण उन्हें किसी अपराध से बरी कर देना भारतीय न्याय व्यवस्था के लिए कतई संभव नहीं है। हमारे कानून ने तो एक सितारे को फर्श दिखा दिया है। इस पूरे प्रकरण में फिल्मी दुनिया के लोगों ने जैसी टिप्पणी की उन्हें पढ़कर या सुनकर लगता है कि ये लोग भी सलमान और अपने को कानून से ऊपर समझते हैं। अमिताभ बच्चन, जिन्हें पूरा देश सदी का महानायक कहता है और जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग तक उठ रही है, वह  सलमान के पक्ष में बोले कि अगर दुनिया सलमान के खिलाफ  है तो मैं दुनिया के खिलाफ  हूं। सलमान एक अच्छा बंदा है। गलती सबसे होती है। उससे भी हुई होगी, लेकिन यह उसकी अच्छाई को कम नहीं करता। नृत्य निर्देशिका फराह खान तो यह तक बोल गईं कि फुटपाथ कोई सोने की जगह होती है क्या? यह टिप्पणियां निश्चित तौर पर मानवीय गरिमा के विरुद्ध हैं। अपने को खास और आम आदमी को कुछ नहीं समझने की दूषित मानसिकता लोकतंत्र की भावना के भी विरुद्ध है। फिल्मी दुनिया को मालूम होना चाहिए कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ भी कोई नरमी नहीं बरती थी। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को दिल्ली की एक निचली अदालत ने एक मामले में तीन साल की सजा सुना दी थी। यह बात अलग है कि बाद में ऊपरी अदालत ने यह सजा रद्द कर दी। नरसिम्हा राव इस मुकदमे के पहले प्रधानमंत्री रह चुके थे। हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दिल्ली की ही एक अदालत ने समन जारी कर दिया। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस सम्मन पर रोक लगा दी। जब हमारी न्याय प्रणाली पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ भी आम आदमियों जैसा व्यवहार करती है, तो फिल्मी सितारे अपने को कानून से ऊपर क्यों मानते हैं।

ई-मेलः naveenjain880@gmail.com

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