सीडी मामले में वीरभद्र सिंह बरी

NEWSशिमला— प्रदेश हाई कोर्ट ने भी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को बहुचर्चित सीडी मामले में बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश शिमला के फैसले को सही ठहराते हुए न्यायाधीश धर्मचंद चौधरी ने एसएम कटवाल की अपील को खारिज कर दिया। मामले के रिकार्ड में उपलब्ध साक्ष्यों की विस्तृत चर्चा करने के पश्चात न्यायाधीश चौधरी ने पाया कि निचली अदालत का आरोपियों को बरी करने का फैसला सही था। कोर्ट ने एसएम कटवाल की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसके तहत वह स्वयं को पीडि़त समझ कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने में सक्षम रहे थे। कोर्ट ने कहा कि वास्तव में याचिकाकर्ता एसएम कटवाल को उस समय कुछ मामलों में दोषी पाए गए है, जब वीरभद्र सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। याचिकाकर्ता ने अनेकों मामले वीरभद्र सिंह के खिलाफ दायर किए हुए हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि वह वीरभद्र सिंह के खिलाफ द्वेषपूर्ण भावना रखते हैं। कोर्ट ने प्रार्थी के उस आवेदन को भी खारिज कर दिया, जिसके तहत उसने अपील दायर करने में हुई 96 दिन की देरी को माफ करने की गुहार लगाई थी। कोर्ट ने कहा कि देरी के बताए गए कारण न केवल अस्पष्ट है, बल्कि झूठे भी है। गौरतलब है कि मई 2007 में प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री विजय सिंह मनकोटिया को गुप्त सूचना से पता चला था कि वीरभद्र सिंह की आवाज से जुड़ी एक आडियो कैसेट रिकार्ड की गई है। यह आडियो कैसेट एक लिफाफे में उनके शिमला स्थित एमएलए निवास स्थान पर दी गई थी। इसे सुनने पर उसने पाया था कि कैसेट में वीरभद्र सिंह तत्कालीन जिलाधीश शिमला मोहिंद्र लाल, प्रतिभा सिंह व मुख्यमंत्री के तत्कालीन निजी सचिव केदार नाथ शर्मा की मिनी स्टील प्लांट के पीयूष जैन, गुजरात अंबूजा सीमेंट के सुरेश निमोटिया व पीसी जैनव, ब्रिगेडियर कपिल मोहन और अन्य के साथ लाखों रुपए के लेन-देन की बातचीत रिकार्ड थी। मई 28, 2007 को मेजर मनकोटिया ने एक प्रेस कान्फ्रेंस कर मीडिया के समक्ष आडियो कैसेट को चलाया। एसएम कटवाल ने हिंदी दैनिक  समाचार में आडियो कैसेट की खबर को पढ़ने के पश्चात मामले की रिपोर्ट 29 मई 2007 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो एवं विजिलेंस पुलिस स्टेशन शिमला में दर्ज करवाई। मामले की जांच हेतु तत्कालीन एसपी आनंद प्रताप सिंह को सौंपी गई। पहली अगस्त 2009 को विजिलेंस विभाग के डीजीपी ने प्राथमिकी दर्ज करने के आदेश दे दिए, जिसके पश्चात सभी आरोपियों पर भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 8, 9, 10, 13(1), (डी),(1) (2) , 13(2) तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। वर्ष 2010 में वीरभद्र सिंह व प्रतिभा सिंह के खिलाफ कथित तौर पर 1989-90 में हुए कथित लेन-देन की बातचीत को आधार बनाकर भ्रष्टाचार का मुकदमा विशेष न्यायालय शिमला में दर्ज किया गया। दिसंबर 24, 2012 को निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था। निचली अदालत के फैसले को एसएम कटवाल ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने वीरभद्र सिंह व प्रतिभा सिंह को बरी किए जाने वाले फैसले को उचित ठहराया व एसएम कटवाल की याचिका को खारिज कर दिया।

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