स्थिर करियर की भूकंप इंजीनियरिंग

By: May 13th, 2015 12:15 am

प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप, वैज्ञानिकों के लिए आरंभ से ही चुनौती बना रहा है। वैज्ञानिक भूकंप की आपदा का पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ रहे हैं। कोई भी ऐसा यंत्र अभी तक ईजाद नहीं किया गया है, जो भूकंप आने से पहले इस की चेतावनी दे सके…

13cr1-3आपदाओं का मनुष्य के साथ शुरू से ही चोली-दामन का साथ रहा है। जैसे- जैसे मनुष्य ने अपनी सुख- सुविधाओं के लिए प्रकृति को अपने अनुसार ढालने की कोशिश को गति प्रदान की है वैसे-वैसे प्रकृति और क्रूर हुई है। प्राकृतिक आपदाओं में भूकंप वैज्ञानिकों के लिए आरंभ से ही चुनौती बना रहा है। वैज्ञानिक भी भूकंप की इस आपदा का पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ रहे हैं। कोई भी ऐसा यंत्र अभी तक ईजाद नहीं किया गया है, जो भूकंप आने से पहले इस की चेतावनी दे सके। इस आपदा में नुकसान को कम करने के उपाय ही किए जा सकते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान कम हो। भूकंप इंजीनियरिंग में इन्हीं बातों का अध्ययन किया जाता है।

भूकंप क्या है

सर्वाधिक सामान्य अर्थ में किसी भी भूगर्भीय हलचल का वर्णन करने के लिए भूकंप शब्द का प्रयोग किया जाता है। अकसर भूकंप भूगर्भीय दोषों के कारण आते हैं। भारी मात्रा में गैसों का रिसाव, ज्वालामुखी, भू-स्खलन और नाभिकीय परीक्षण ऐसे मुख्य दोष हैं। पृथ्वी की सतह पर भूकंप अपने आप को भूमि को हिलाकर या विस्थापित कर के प्रकट करता है। जब एक बड़ा भूकंप अधिकेंद्र अपतटीय स्थति में होता है, तो यह समुद्र के किनारे पर पर्याप्त मात्रा में विस्थापन का कारण बनता है, जो सूनामी का कारण है। भूकंप के झटके कभी-कभी भू-स्खलन और ज्वालामुखी गतिविधियों को भी पैदा कर सकते हैं। भूकंप धरती की सतह में अचानक तीव्र हलचलों के कारण आता है, जो धरती की पर्पटी में ऊर्जा के रिसाव से पैदा होती हैं। भूकंपीय तरंगें धरती के भीतर चट्टानें टूटने से अकस्मात पैदा हुई ऊर्जा की तरंगें होती हैं। भूकंप एक विनाशकारी प्राकृतिक घटना है। भूकंप से होने वाले जोखिम का संबंध मृदा स्थितियों, भू-वैज्ञानिक संरचना और संरचनात्मक गतिविधियों के साथ है, जिनका अध्ययन क्षेत्रीय आधार पर किया जाता है।

भूकंप इंजीनियर की भूमिका

भूकंप वैज्ञानिक और भूकंपों के दुष्प्रभाव से संरक्षण की अपेक्षा करने वाले लोगों के बीच हम भूकंप इंजीनियर को खड़ा पाते है, जिसका यह दायित्व है कि वह नए भवनों के निर्माण में इस बात की पुख्ता व्यवस्था करे कि भवनों को भूकंप से नुकसान न हो। उसके काम का संबंध एक तरफ  विश्व के विभिन्न भागों में भूकंपों के आकार और आवृत्ति के अनुमान के संदर्भ में भूकंप वैज्ञानिकों के साथ है, तो दूसरी ओर वास्तुकारो, योजनाकारों और बीमा कंपनियों के साथ है।

इतिहास और विकास

भूकंप विज्ञान अपेक्षाकृत एक नया वैज्ञानिक विषय है। हालांकि लोगों की रुचि सैकड़ों वर्षों से भूकंपों के बारे में जानने की रही है, लेकिन एक अध्ययन विषय के रूप में भूकंप विज्ञान का इतिहास लगभग 100 वर्ष पुराना है। भूकंप तरंगों को नापने वाले उपकरण सिस्मोमीटर के विकास के साथ ही इस विषय का प्रारंभ माना जाता है। बीसवीं सदी के दौरान भूकंप विज्ञान के क्षेत्र का विस्तार हुआ और इसके दायरे में धरती के आंतरिक भाग की जांच को भी शामिल किया गया। भूकंप विज्ञान और भूकंप इंजीनियरिंग के अंतर्गत भूकंपों और धरती के भीतर से होकर गुजरने वाली तरंगों का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन किया जाता है। इस विषय के अंतर्गत समुद्री भूकंपों, ज्वालामुखियों तथा परत संरचनाओं आदि रूपांतरणों का अध्ययन भी शामिल है।

शैक्षणिक योग्यता

भूकंप इंजीनियरिंग संबंधी पाठ्यक्रम भूगोल और भौतिक विज्ञान विषयों से मिलकर बनता है। इस के लिए आरंभिक शैक्षणिक योग्यता में भूगोल और भौतिक विज्ञान की पढ़ाई अनिवार्य है। भूकंप इंजीनियरिंग का प्रोग्राम स्नातकोत्तर स्तर पर करवाया जाता है। मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग और मास्टर ऑफ  टेक्नोलॉजी की डिग्रियों में इसे शामिल किया जाता है। जीएटीई के बाद एमई और एमटेक में दाखिला मिलता है। पीएचडी के लिए जीएटीई और नेट की स्कोरिंग निर्भर करती है।

वेतनमान

सरकारी क्षेत्र में रोजगार मिलने पर एक भूकंप इंजीनियर को सरकारी मानकों के तहत वेतन मिलता है। प्राइवेट सेक्टर में अनुभव और योग्यता के अनुसार कंपनियां अलग-अलग पैकेज पर भूकंप इंजीनियरों को रखती हैं। आमतौर पर एक भूकंप इंजीनियर 30 से 40 हजार तक आरंभिक वेतन लेता है। विदेशों में वेतनमान का पैकेज लाखों में होता है।

प्रमुख शिक्षण संस्थान

आईआईटी रुड़की

आईआईटी खड़गपुर

आईआईटी कानपुर

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी

वाडिया इंस्टीच्यूट ऑफ हिमालयन ज्योग्राफी, देहरादून

मुबई यूनिवर्सिटी, मुंबई

कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी, कुरुक्षेत्र

अन्ना यूनिवर्सिटी, चेन्नई

उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद

रोजगार के विकल्प

शोध के क्षेत्र में सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में रोजगार की बेहतर संभावनाएं हैं। सरकारी क्षेत्र में नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीच्यूट (एनजीआरआई) हैदराबाद, ऑयल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन(ओएनजीसी), वैदर फोरकास्टिंग डिपार्टमेंट, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया(जीएसआई) भूकंप इंजीनियर के पदों के लिए विज्ञापन देते रहते हैं। इसके अलावा विदेशों में भी भूकंप इंजीनियरों के लिए रोजगार के काफी विकल्प हैं।

एक साझा उपक्रम

भूकंप वैज्ञानिकों का काम भूकंपीय घटनाओं के स्रोत, स्वरूप और आकार का पता लगाना है,जिससे विभिन्न एजेंसियों द्वारा उसका इस्तेमाल किया जा सके। भूकंप विज्ञान और भूकंप इंजीनियरिंग इंटरडिसिप्लिनरी क्षेत्र हैं, जिनमें भूकंप वैज्ञानिकों के साथ तकनीशियन एवं व्यवसायी भी शामिल होते हैं,जो  कम्प्यूटरों, भौतिक विज्ञान, इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार और सिविल एवं संरचना इंजीनियरिंग जैसे विषयों में पारंगत होते हैं।

रिक्टर स्केल

रिक्टर स्केल पैमाने को सन् 1935 में कैलिफोर्निया इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलाजी में कार्यरत वैज्ञानिक चार्ल्स रिक्टर ने बेनो गुटेनबर्ग के सहयोग से खोजा था। इस स्केल के अंतर्गत प्रति स्केल भूकंप की तीव्रता 10 गुना बढ़ जाती है और भूकंप के दौरान जो ऊर्जा निकलती है वह प्रति स्केल 32 गुना बढ़ जाती है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 3 रिक्टर स्केल पर भूकंप की जो तीव्रता थी, वह 4 स्केल पर 3 रिक्टर स्केल का 10 गुना बढ़ जाएगी। रिक्टर स्केल पर भूकंप की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 8 रिक्टर पैमाने पर आया भूकंप 60 लाख टन विस्फोटक से निकलने वाली ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है। भूकंप को मापने के लिए रिक्टर के अलावा मरकेली स्केल का भी इस्तेमाल किया जाता है। पर इसमें भूकंप को तीव्रता की बजाय ताकत के आधार पर मापते हैं।

सतर्कता ही बचाव है

भूकंप जैसी आपदा के दौरान थोड़ी सतर्कता और हिम्मत से जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। भूकंप आने पर तुरंत सुरक्षित खुले मैदान में जाएं। बड़ी इमारतों, पेड़ों, बिजली के खंभों से दूर रहें। लिफ्ट की बजाय सीढि़यों का इस्तेमाल करें। भूकंप आने पर खिड़की, अलमारी, पंखे, ऊपर रखे भारी सामान से दूर हट जाएं। कहीं फंस गए हों तो दौड़ें नहीं। इससे भूकंप का ज्यादा असर होगा। भूकंप को रोका नहीं जा सकता, पर नुकसान कम किया जा सकता है।

भूकंप से नुकसान के कारण

भूकंप के कारण होने वाले नुकसान के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। जैसे घरों की खराब बनावट, खराब संरचना, भूमि का प्रकार, जनसंख्या की बसावट आदि। भारतीय उपमहाद्वीप में भूकंप का खतरा हर जगह अलग-अलग है। भारत को भूकंप के क्षेत्र के आधार पर चार हिस्सों जोन-2ए, जोन-3ए, जोन-4 तथा जोन-5 में बांटा गया है। जोन 2 सबसे कम खतरे वाला जोन है तथा जोन-5 को सर्वाधिक खतरनाक जोन माना जाता है। उत्तर-पूर्व के सभी राज्य, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से जोन-5 में ही आते हैं। उत्तराखंड के कम ऊंचाई वाले हिस्सों से लेकर उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्से तथा दिल्ली जोन-4 में आते हैं। मध्य भारत अपेक्षाकृत कम खतरे वाले हिस्से जोन-3 में आता है जबकि दक्षिण के ज्यादातर हिस्से सीमित खतरे वाले जोन-2 में आते हैं। हालांकि राजधानी दिल्ली में ऐसे कई इलाके हैं जो जोन-5 की तरह खतरे वाले हो सकते हैं। इस प्रकार दक्षिण राज्यों में कई स्थान ऐसे हो सकते हैं जो जोन-4 या जोन-5 जैसे खतरे वाले हो सकते हैं।

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