खाली स्टेडियम में खचाखच पर्यटन

Jun 30th, 2015 12:15 am

कहीं कोई खाली-वीरान स्टेडियम हर दिन करीब चार हजार दर्शक आमंत्रित कर पाए, तो इसके मायने पर्यटन उद्योग को समझने होंगे। धर्मशाला-मकलोडगंज पहुंचने वाले सैलानियों का एक बड़ा समूह अगर क्रिकेट स्टेडियम की परिक्रमा करता है तो इस रोमांच के लिए कुछ प्रशंसा होनी चाहिए। हम करीब अढ़ाई सालों से धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम के वजूद को विवादों से चीरकर भी, अगर दर्शकों की भीड़ नहीं रोक पा रहे तो इसकी खासियत को जंजीरों में बांधने की सजा क्यों? सूलियों की सेज पर अपने खेल सीजन गंवाने के बावजूद, क्रिकेट स्टेडियम के प्रति दीवानगी को समझने की जरूरत है। पर्यटन सीजन में क्रिकेट स्टेडियम का जादू चल रहा है तो इसलिए कि एसोसिएशन ने राज्य की खेल अधोसंरचना का स्तर ऊंचा किया। सैलानी क्योंकि किसी विचारधारा से संबोधित नहीं होते, इसलिए क्रिकेट स्टेडियम का कद उनकी नजर में सलामत है। जाहिर तौर पर कुछ तो क्रिकेट के नाम पर प्रदेश में हुआ और अगर यह प्रशंसनीय दौर सांसद अनुराग ठाकुर की तारीफ कर गया, तो इस पक्ष को कैद करके लगातार सजा नहीं दी जा सकती। रही बात अनियमितताओं की, तो कानून की परिपाटी से बड़ी कोई परिभाषा नहीं हो सकती। पर्यटन उद्योग को ऐसे उत्साह को सहेजना होगा। अंततः हिमाचल के डेस्टीनेशन में अगर एक स्टेडियम की तारीफ हो रही है, तो इसके मेडल पूरा पर्यटन उद्योग पहन कर घूम रहा है। कोशिश यह करें कि किस तरह ऐसी संस्थाएं या अधोसंरचना से सैलानी भरपूर मनोरंजन कर सकें। भाखड़ा, पौंग, चमेरा, पंडोह तथा कोल बांधों की विशेषता में रोमांच का ऐसा सफर शुरू किया जा सकता है। पर्यटक को एक सुरक्षित नाव भी दे दें, तो वह बिलासपुर में रुक कर कुछ समय बिताना चाहेगा। इसी तरह तमाम विद्युत परियोजनाएं अपने आगोश में पर्यटन महफिल को बैठा सकती हैं। प्रदेश के विभिन्न ऐतिहासिक स्थल, राज्य के प्रतीक और स्मारक इस लायक हैं कि सैलानियों का रुख मोड़ लें। धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम के प्रति रुझान का सबसे बड़ा कारण इसकी ब्रांडिंग व टीवी प्रसारण हो सकते हैं, लेकिन माहौल का खुलापन व दृश्यावली का अवलोकन भी सबसे बड़ी खासियत है। विडंबना यह है कि पर्यटक स्थलों में खुला माहौल नहीं रहा। कोई ऐसा स्थान नहीं बचा जहां एक साथ सैकड़ों पर्यटक कुछ समय बिता सकें। किसी भी स्थल को छूने के बजाय अगर वहां रुकने के विकल्प बढ़ाए जाएं तो रोमांच का सफर बढ़ता जाएगा। पालमपुर के सौरभ वन विहार को अगर मुकम्मल करें तो कांगड़ा घाटी के पर्यटन को एक नई मंजिल मिल सकती है। हिमाचल में खेलों के नजरिए से पर्यटन को संबोधित किया जा सकता है या गतिविधियों के केंद्र में पर्यटन को जीवंत रखा जाए। कारण कोई भी रहे हों, लेकिन जिस तरह कांगड़ा घाटी ग्रीष्मोत्सव को तिलांजलि दी जा रही है, उससे उद्योग की हानि स्पष्ट है। पूरे प्रदेश में पर्यटन सीजन को पर्यटन महोत्सव में परिवर्तित व परिभाषित करने की आवश्यकता है। इस दौरान मार्च से जून तक के मेलों, सांस्कृतिक समारोहों, खेल आयोजनों तथा व्यापारिक मेलों के अलावा एक नई शृंखला भी खड़ी करनी होगी। कहीं फूड फेस्टिवल, कहीं पुस्तक मेला तो कहीं कला मेला आयोजित हो सकता है। पुराना कांगड़ा, चंबा व शिमला में धरोहर मेले तो अंद्रेटा जैसी जगह पर लोक समारोह आयोजित हो सकते हैं। प्रदेश के प्रमुख पर्यटक स्थलों पर थियेटर व लोक कला गतिविधियां बढ़ाने के लिए उत्तम दर्जे के आडिटोरियम की आवश्यकता बढ़ गई है। अगर चंबा, मकलोडगंज, मनाली व मंडी जैसे स्थानों पर स्टेट ऑफ आर्ट, आडिटोरियम स्थापित हों तो दर्शकों की बहारें कतारबद्ध खड़ी होंगी। हिमाचल सरकार ने वर्तमान बजट में पच्चीस करोड़ का प्रावधान करके इस दिशा में पहल की है और अगर कुछ सालों तक प्रगति जारी रहे, तो राज्य के कलाकार पर्यटन के राजदूत बन सकते हैं। इसी तरह धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम की तर्ज पर अन्य खेलों की अकादमियां व स्टेडियम स्थापित करके हम पर्यटकों की तालियां हासिल कर पाएंगे। एक खाली स्टेडियम की क्षमता में अगर पर्यटन उद्योग डुबकी लगा सकता है, तो ऐसे निर्माण के दर्जनों गुनाह भी कबूल करने पड़ेंगे।

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