यमुनानगर में गाजर घास के बताए दुष्प्रभाव

By: Aug 24th, 2015 12:02 am

यमुनानगर —  कृषि विज्ञान केंद्र दामला के संयोजक डा. बलदेव राज कांबोज  ने बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र दामला द्वारा गाजर घास उन्नमूलन सप्ताह 16 से 22 अगस्त तक मनाया गया। इस सप्ताह के दौरान स्कूल के विद्यार्थियों, शिक्षकों, ग्रामीण युवकों, किसानों व महिला शक्ति को विभिन्न गांवों में जाकर इस खरपतवार के जीवन चक्र, मानव, पशु, फसलों व वातावरण पर इससे होने वाले दुष्प्रभावों बारे विस्तृत जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि गाजर घास हमारे देश में 1955 में दृष्टि गोचर होने के बाद यह विदेशी खरपतवार लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुकी है। डा. बलदेव राज कांबोज ने बताया कि यह गाजर घास खाली स्थानों, अनुपयोगी भूमियों, औद्योगिक क्षेत्रों, बगीचों, पार्कों, स्कूलों, खड़कों तथा रेलवे लाइन के किनारों पर बहुतायत में पाया जाता है। गाजर घास पानी मिलने पर वर्ष भर फल-फूल सकता है, परंतु वर्षा ऋतु में इसका अधिक अंकुरण होने पर यह एक भीषण खरपतवार का रूप ले लेता है। उन्होंने बताया कि कुछ वर्षों से इसका प्रकोप खाद्यान्न फसलों, सब्जियों एवं उद्यानों मे बढ़ता जा रहा है। उन्होंने बताया कि गाजर घास के पौधे से 654 मिलियन पोलन व 15000-25000 बीज पैदा हो सकते हैं। अतः इसको जड़मूल से नष्ट करने का कार्य समाज के हर वर्ग की सहायता से ही संभव है। उन्होंने बताया कि गाजर घास के पौधे में पारथेनिन नामकजहरीला रसायन पदार्थ होता है, जो कि मानव के साथ-साथ पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं व फसलों के लिए हानिकारक है। उन्होंने बताया कि गाजर घास जिसे आम भाषा में अमरीकन घास एवं कांगे्रस घास के नाम से जाना जाता है, के संपर्क में आने से मानव के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा इससे एलर्जी एवं खुजली, आंखों में जलन, शरीर विशेषकर आंखों के आसपास काले धब्बे व फफोले, बुखार,  अस्थमा, जुकाम, दमा, नाक, चर्म व श्वास संबंधी एलर्जी इत्यादि रोगों के साथ-साथ अनेकों बीमारियों के होने की संभावना बढ़ जाती है। डा. कांबोज ने बताया कि अमरीकन घास ने पूरे प्रदेश में अपनी जड़े फैला ली हैं तथा यह जहरीला घास खाली पड़ी भूमि, राष्ट्रीय एवं राजकीय राजमार्गों के आस-पास, रेलवे लाइनों के साथ-साथ कृषि भूमि में भी उत्पन्न हो रहा है और यदि इस जहरीले गाजर घास एवं अमरीकन घास को समय रहते नष्ट नहीं किया गया तो यह भावी पीढ़ी के लिए काफी नुकसानदायक सिद्ध होगी और पर्यावरण को भी दूषित करेगी। उन्होंने बताया कि आम-तौर पर फरवरी मार्च के महीनें में इस जहरीले घास के नए पौधे उत्पन्न होते हैं तथा जून-जुलाई के महीनों में जब तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है तो इसका बीज तैयार होने लगता है, जो कि सितंबर-अक्तूबर के महीनें में पौधे से नीचे गिरकर नए पौधों को उत्पन्न करने में सहायक होता है। उन्होंने बताया कि इस पौधे के बीज हवा से उड़कर व किसी अन्य माध्यम से विभिन्न स्थानों पर पहुंच कर उत्पन्न हो जाते हैं।

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