गोवत्स द्वादशी

By: Oct 31st, 2015 12:21 am

Aasthaकार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है। इस व्रत में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं का उपयोग नहीं किया जाता है। व्रती को सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। दूध देने वाली गाय को उसके बछडे़ सहित स्नान कराना चाहिए। बाद में दोनों को नया वस्त्र और फूलों की माला अर्पित की जाती है। माथे पर चंदन का तिलक लगाते हैं। एक तांबे के पात्र में सुगंध, अक्षत, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए गो का प्रक्षालन करना चाहिए-

क्षीरोदार्णवसंभूते सुरासुर नमस्कृते।

सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नमः॥

(समुद्र मंथन के समय क्षीर सागर से उत्पन्न सुर तथा असुरों द्वारा नमस्कार की गई देव स्वरूपिणी माता, आपको बार-बार नमस्कार है। मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें।) इसके बाद गाय को उड़द की दाल से बने भोज्य पदार्थ खिलाने चाहिए और निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करनी चाहिए- सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता।

सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस॥

ततः सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते।

मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नंदिनी॥

(हे जगदंबे! हे स्वर्गवासिनी देवी! हे सर्वदेवमयी! आप मेरे द्वारा दिए इस अन्न को ग्रहण करें। सभी देवतओं द्वारा अलंकृत माता नंदिनी आप मेरा मनोरथ पूर्ण करें। गाय का पूजन करने के बाद ‘गोवत्स की कथा’ सुननी चाहिए। संपूर्ण दिन व्रत रहें। बाद में गोमाता की आरती करने के बाद भोजन ग्रहण करना चाहिए।

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