अच्छे काम की प्रतिस्पर्धा करें दल

( कुलभूषण उपमन्यु लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष  हैं )

अपनी आस्था किसी पर थोपना ठीक नहीं। न हम अपनी आस्था किसी पर थोपें और न किसी को अपने पर थोपने दें। इनसानियत से ऊपर तो कोई धर्म नहीं होता। धर्म का उदय मानवता के परिष्कार के लिए ही हुआ है। नए महागठबंधन को भी राजनीतिक विद्वेष फैलाने से बचना चाहिए। चुनाव तो हो गए, अब मिलजुल कर देश और अपने राज्य के विकास के लिए कार्य करना चाहिए। देश में धार्मिक सद्भाव और एकता फैलाने की राजनीति होनी चाहिए। सामाजिक सद्भाव और सबके समान विकास की राजनीति होनी चाहिए। दलों में प्रतिस्पर्धा अच्छे काम के आधार पर हो…

बिहार चुनाव कई अर्थों में अभूतपूर्व रहा है। इसका देश की वर्तमान और भावी राजनीति में प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है। यह शायद पहला मौका है, जब यह प्रादेशिक चुनाव इतने बडे़ राष्ट्रीय महत्त्व की परिघटना बन गया, जिसने पड़ोसी देशों से यूरोप, अमरीका तक का ध्यान अपनी ओर खींचा। इस चुनाव के सभी के लिए जो प्रत्यक्ष-परोक्ष संदेश हैं, उन्हें समझने का प्रयास किया जाना चाहिए। सबसे पहले तो सभी घटक यानी हारने-जीतने वाले राजनीतिक दल, सामाजिक गोलबंदियां, राष्ट्रीय विकास और सशक्तिकरण के लिए चिंतित जन साधारण, देश को कमजोर और विखंडित करने के लिए सक्रिय शक्तियां अपने-अपने उद्देश्यों के आधार पर इन परिणामों का विश्लेषण करके प्रसन्नता या दुख प्रकट करेंगे। देश को कमजोर और विखंडित करने वाली शक्तियों को छोड़ दिया जाए, तो शेष सभी का उद्देश्य मोटे तौर पर एक ही है, देश को आगे ले जाना। यानी आर्थिक समृद्धि, सामाजिक समरसता और सौहार्द, बिजली-पानी, रोजगार की व्यवस्था में सुधार, शिक्षा-स्वास्थ्य आदि बुनियानी सुविधाओं की उपलब्धता, कृषि-पशुपालन व दस्तकारी व्यवस्था को लाभकारी बनाना, देश की आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करना, वैज्ञानिक एवं तकनीक शोध को विश्वस्तरीय धार देना आदि। इन मुद्दों पर एक राष्ट्र की और राज्यों की सरकारों के रूप में राजनीतिक दलों और गठबंधनों को ही कार्य करना है। अतः इन चुनावों के संदेशों का महत्त्व भी सबसे अधिक इन गठबंधनों के लिए ही है। हारने और जीतने वालों को जरूरी सीख लेना वक्त की जरूरत है। जनतांत्रिक गठबंधन चुनावों की घोषणा से पहले के अनुमानों में आगे चल रहा था, परंतु चुनाव की घोषणा के बाद लगातार इसकी चमक लगातार फीकी होती चली गई। हालांकि भारी-भरकम चुनाव प्रचार से इसे ढकने की कोशिश होती रही, जो सफल नहीं हो पाई। हालांकि एक राज्य का चुनाव जीतना या हारना राष्ट्रीय दल के लिए कोई इतनी बड़ी घटना नहीं होती, जितनी बड़ी घटना बिहार चुनाव बन गया। इसके मुख्य दो कारण थे, पहला कारण यह था कि भाजपा अपने बूते कभी भी सरकार बनाने की स्थिति में केंद्र में आ सकती है, ऐसा भाजपा विरोधी खेमे ने सोचा तक नहीं था। उस शुरुआती झटके से उबरने में दिल्ली में केजरीवाल की जीत के बाद भाजपा विरोधी खेमा बिहार चुनाव को लिटमस टेस्ट के रूप में पेश करने का भरसक प्रयास कर रहा है। दूसरा, बिहार में महागठबंधन के रूप में राजनीतिक दलों की नई गोलबंदी का प्रयोग हो रहा था, जिसके पीछे एक विशेष उत्साह काम कर रहा था कि यदि यह प्रयोग यहां सफल होता है, तो हाशिए पर जा चुके दलों को राष्टीय स्तर पर भी संजीवनी मिल सकती है।

इसलिए यह खेमा चुनाव को बड़ी गंभीरता से लेकर जमीनी समझ के आधार पर आगे बढ़ रहा था। इसका प्रमाण इसी बात से मिल जाता है कि लालू-नीतीश के धुर विरोधी दल इकट्ठा आने के बाद समय-समय पर पैदा होने वाली भ्रांतियों पर पूरी परिपक्वता से काबू पाते रहे। दरार पैदा नहीं होने दी। नेता तय करने में, सीट बंटवारे और टिकट बांटने में मतभेद पैदा नहीं होने दिए। शायद टिकट भी बेहतर स्वीकार्य लोगों को दिए, जो जीतने की क्षमता रखते थे। भाजपा गठबंधन अपनी भ्रांतियों, नेता तय करने में असमर्थता, सीट आबंटन में खींचतान, टिकट आबंटन में धन के प्रयोग जैसे मुद्दों से गंभीरता से निपट नहीं पाया। स्थानीय नेतृत्व को मुख्य भूमिका देकर केंद्रीय नेतृत्व द्वारा पर्याप्त सहयोग की भूमिका में रहने के बजाय केंद्रीय नेतृत्व की अति सक्रियता से भी जनता में गलत संदेश गया कि इनके पास अच्छे मुख्यमंत्री योग्य व्यक्ति का अभाव है। यह जानते हुए भी कि चुनाव के समय कही हुई बातों की विरोधी पक्ष मनमानी व्याख्या करके अपना चुनावी मतलब निकालने में कसर नहीं छोड़ते, भाजपा गठबंधन के कई नेताओं ने असमय विवादास्पद मुद्दों को उछाला।

हिंदू धर्म कभी भी संगठित धर्म नहीं रहा, यही इसकी शक्ति है। संगठित धर्म बनाने का प्रयास करने वाले इसकी आत्मा को ही मारने का काम करते हैं। आरक्षण को ज्यादा न्यायपूर्ण बनाने और असली हकदारों को लाभान्वित करने, इसके दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति व उसके लिए हो रहे आंदोलनों के चलते समीक्षा की जरूरत की बात अपनी जगह जरूरी हो सकती है, इस पर राष्ट्रीय जरूरत और समझ के आधार पर चर्चा की जाए, तो सभी पक्ष इसके लिए तैयार हो जाएंगे, परंतु चुनाव में यह मुद्दा उठाना ठीक नहीं था। इस पर सर्वदलीय विद्वानों, निष्पक्ष चिंतकों के बीच पहले व्यापक चर्चाओं के माध्यम से सही निष्कर्षों पर पहुंचना पड़ेगा। भाजपा को सवर्णवादी दल के ठप्पे से अभी बाहर निकलना है। शिवसेना, विश्व हिंदू परिषद, गौरक्षक दल, हिंदू सेना आदि की भूमिका भी दूरदृष्टिपूर्ण नहीं लगी। उनमें से कुछ का नाम तो ऐसे मौकों पर ही सुनने में आता है। इन्हें यदि हिंदू समाज के भले की सच्ची चिंता है, तो टोटकेबाजियां छोड़ कर पहले हिंदू समाज को मजबूत करने का कार्य करना चाहिए। छुआछूत या जातिवादी विद्वेष को पूर्णतया समाप्त करने के लिए कार्य करना चाहिए। इससे समाज मजबूत होगा। यह बात बार-बार कही जाती है कि हिंदू समाज मूल रूप में सांप्रदायिक नहीं है। यही उसकी प्रकृति और ताकत भी है। अतः इस गुण को बचाने का काम होना चाहिए। हिंदू अन्य धर्मों के खान-पान को नियंत्रित नहीं कर सकते। सभ्य मानवीय चिंतन इसकी इजाजत नहीं देता। हां, अपनी आस्था को मजबूत कर सकते हैं। हिंदू तो कर्म सिद्धांत पर विश्वास करने वाले लोग हैं।

कबीरा तेरी झोंपड़ी, गल कटियन के पास।

करेंगे, सो भरेंगे, तू क्यों भया उदास।।

यह कबीर भारत की चेतना में बसते हैं। विवेकानंद, नानक, इसी धारा में सोचते हैं। हिंदू गोसेवा करके गोसेवा आधारित कृषि व्यवस्था को प्रोत्साहित करके, गोपालन को लाभकारी व्यवसाय बनाकर अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकते हैं। गाय लाभकारी बनेगी, तो गोवंश को सड़कों पर भटकने को कोई नहीं छोड़ेगा। ट्रैक्टर को अनावश्यक प्रोत्साहन ने बैल को बेकार कर दिया है। बैल आधारित कृषि के लिए अच्छे तकनीकी औजार उपलब्ध करवा कर आकर्षक बनाया जा सकता है। बैल बेकार हो गया है। इसीलिए कत्लखाने पहुंचता है। बहुत सी आस्थाओं को बचाने के लिए आर्थिक व्यवस्थाएं जरूरी होती हैं। दूसरी ओर बहुसंख्यक समुदाय को जानबूझ कर चिढ़ाने की नीयत से जेएनयू और अन्य कई जगह बीफ  पार्टी के नाम से आयोजन करना बदनीयती की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है। जिसका सोचा-समझा उद्देश्य सामाजिक सौहार्द को पलीता लगाना ही है, परंतु इस तरह की ओछी सोच का जवाब दादरी जैसी हिंसक सोच कभी नहीं हो सकती। इसकी सभी को निंदा करनी चाहिए। देश को ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी जो उद्योग ट्रैक्टर बनाकर कमाता है, वही सुधरे बैल चालित उपकरणों के विकास और निर्माण से भी कमाए। बैल से कृषि आकर्षक बनेगी, तो हमारी आस्था और आर्थिकी दोनों बचेंगे। जैविक कृषि संभव होगी। रासायनिक खादों के आयात के लिए खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बचेगी।

अपनी आस्था किसी पर थोपना ठीक नहीं। न हम अपनी आस्था किसी पर थोपें और न किसी को अपने पर थोपने दें। इनसानियत से ऊपर तो कोई धर्म नहीं होता। धर्म का उदय मानवता के परिष्कार के लिए ही हुआ है। नए महागठबंधन को भी राजनीतिक विद्वेष फैलाने से बचना चाहिए। चुनाव तो हो गए, अब मिलजुल कर देश और अपने राज्य के विकास के लिए कार्य करना चाहिए। देश में धार्मिक सद्भाव और एकता फैलाने की राजनीति होनी चाहिए। सामाजिक सद्भाव और सबके समान विकास की राजनीति होनी चाहिए। दलों में प्रतिस्पर्धा अच्छे काम के आधार पर हो। एक दूसरे को नीचा दिखाने से बचना चाहिए और यह जिम्मेदारी दोनों बड़े गठबंधनों पर ही आती है।

ई-मेल : kbupmanyu@gmail.com

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