असहिष्णुता की बहस बिकाऊ !

दूरदर्शन के वरिष्ठ पत्रकार संजीव उपाध्याय ने एक व्हाट्स ऐप संदेश भेजा था-न बीफ  पर कोई बयान…न किसी को गाय की याद…न अरहर की दाल की कीमत की चिंता…न अब कोई पुरस्कार लौटा रहा है और देश भी सहिष्णु हो गया…लगता है अब चुनाव खत्म हो गया है।’ संजीव का कथन सटीक है, क्योंकि लगता है ये मुद्दे चुनावी ही थे, किसी का कोई सामाजिक सरोकार नहीं था। अलबत्ता प्रधानमंत्री मोदी को ब्रिटेन प्रवास के दौरान लंदन में प्रेस को संबोधित करते हुए यह जरूर कहना पड़ा-हम बुद्ध और गांधी का देश हैं। हमारे लिए प्रत्येक घटना गंभीर है। उसे हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने संविधान के दायरे में आम आदमी के जीवन की रक्षा और उसके विचारों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता भी जताई। यानी असहिष्णुता का सटीक जवाब…उसके बाद इस मुद्दे का पटाक्षेप हो जाना चाहिए था। चूंकि असहिष्णुता का प्रायोजित अभियान थम चुका था, लिहाजा माना जा रहा था कि अब इस मुद्दे के उभार के आसार नहीं हैं। लेकिन विदेश राज्य मंत्री एवं पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने थमे और स्थिर पानी में फिर एक भारी पत्थर दे मारा। उन्होंने अमरीका की सरजमीं पर यह कहा कि असहिष्णुता पर जो बहस छिड़ी थी, उसके लिए मोटा पैसा दिया गया था। यह अभियान बिहार चुनाव के मद्देनजर छेड़ा गया था, लिहाजा राजनीति से प्रेरित था। विदेश राज्य मंत्री के आरोप कितने तथ्यात्मक हैं, हम दावा नहीं कर सकते। यदि वीके सिंह पैसे वाला आरोप साबित नहीं कर सके, तो उनकी भद्द पिटेगी। उन्हें ऐसे बड़बोले, अनाप-शनाप और विवादास्पद बयानों से बचना चाहिए। प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण के बाद किसी के भी बयान की गुंजाइश नहीं है। सिंह के आरोपों ने अशोक वाजपेयी सरीखे असहिष्णु अभियानकर्ता को फिर स्वर दे दिया और उन्होंने पैसे का आरोप साबित करने की चुनौती दी है कि किसने कितना और किसे पैसा दिया, विदेश राज्य मंत्री इसका खुलासा करें। यदि कुछ भी खुलासा नहीं होता है, तो वीके सिंह के जरिए मोदी सरकार की फजीहत होगी। लेखकों, कवियों, साहित्यकारों और संस्कृति कर्मियों की असहिष्णुता तो तब बेनकाब हो गई, जब करीब 200 ऐसे लोगों ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को पत्र लिखा था कि वह इस मुद्दे को प्रधानमंत्री मोदी से संवाद के दौरान उठाएं। शायद कैमरन ने तो अपनी राजनयिक सीमाएं नहीं लांघीं, लेकिन ब्रिटेन में ‘गार्जियन’ सरीखे अंतरराष्ट्रीय अखबार ने बड़ी कड़वाहट के साथ इस मुद्दे पर सवाल प्रधानमंत्री मोदी से पूछे। इसी के साथ गोधरा दंगों और मोदी पर लगे कथित विदेशी प्रतिबंधों के सवाल भी उठे। विदेशी सरजमीं पर आपने अपने प्रधानमंत्री को अपमानित स्थिति में धकेला, इससे बड़ी असहिष्णुता और क्या हो सकती है? हम अब वे सवाल भी दोहराना नहीं चाहते कि असहिष्णुता की बात करने वाले साहित्यकारों, लेखकों, संस्कृति कर्मियों ने एक निश्चित दौर में अपने पुरस्कार और सम्मान क्यों नहीं लौटाए? हम उनका उल्लेख पहले कर चुके हैं और ये रचनाधर्मी भी अंदर से नंगे हैं। हालांकि साहित्य अकादमी की एक बैठक और प्रस्ताव पारित करने के बाद असहिष्णुता के शिकायतकर्ताओं ने अपने पुरस्कार भी वापस ले लिए हैं। असहिष्णुता का बवंडर थम चुका है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक बार फिर नसीहत के बोल बोले हैं कि पुरस्कारों को संजोकर रखना चाहिए और सम्मान पाने वालों को इनकी अहमियत बनाए रखनी चाहिए। प्रतिष्ठित पुरस्कार व्यक्ति की प्रतिभा, योग्यता और कड़ी मेहनत के सम्मान में दिए जाते हैं। ‘राष्ट्रीय प्रेस दिवस’ के मौके पर राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि समाज में कुछ घटनाओं से संवेदनशील लोग कई बार विचलित हो जाते हैं, लेकिन ऐसी घटनाओं पर चिंता का इजहार संतुलित होना चाहिए और हमें संविधान में निहित मूल्यों और सिद्धांतों में भरोसा रखना चाहिए। राष्ट्रपति का यह कथन मोदी सरकार के मानस को समर्थन देता है। क्या इस कथन के प्रति भी असहिष्णुता जताई जाएगी? बेशक ये सम्मान सरकार नहीं, राष्ट्र देता है। क्या आप राष्ट्र का अपमान करेंगे? इस संदर्भ में द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती की टिप्पणी भी गौरतलब है कि भारत जैसी सहिष्णुता किसी भी देश में नहीं है। असहिष्णुता का तमाशा करने वाले बताएं कि उन्हें कैसी सहिष्णुता चाहिए? बेचैन रचनाकार और मोदी विरोधी लॉबी इसका जवाब दे सकती है? सिर्फ  यही नहीं, कांग्रेस सांसद मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान में एक इंटरव्यू में यहां तक कहा है कि यदि भारत के साथ बातचीत करनी है, तो पहले मोदी को हटाइए और हमें (यानी कांग्रेस) लेकर आइए। यह कथन देशद्रोह भी है और असहिष्णुता की पराकाष्ठा भी। क्या पाकिस्तान के जरिए निर्वाचित प्रधानमंत्री मोदी को हटाएगी कांग्रेस? जहां तक पैसे का आरोप है, उसे खुद विदेश राज्य मंत्री साबित करेंगे या केंद्र सरकार जांच बिठाएगी, लेकिन इतनी जानकारी मीडिया में है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले एक हिंदी रचनाकार के दिल का इलाज हुआ, तो लखनऊ के एक पत्रिका संपादक के जरिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इलाज का खर्च बटोरा गया। ऐसे कई किस्से, जो वाकई में असल हैं, मीडिया में चल रहे हैं और राजनेताओं के ब्यौरे में भी शामिल हैं। असहिष्णुता तो यह है कि मोदी विरोधी लेखक, साहित्यकारों की एक लॉबी संघ को आईएस सरीखे आतंकी संगठन के समकक्ष मानती है। यह लॉबी इस हद तक भी जा सकती है कि पेरिस आतंकी हमले के पीछे कोई और नहीं, आरएसएस का हाथ है। दरअसल यह तबका ऐसा है, जो मोदी से नफरत के स्तर तक विरोध करता है। इस मुद्दे को ही अस्वीकार कर देना चाहिए।

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