कहानी खैबर की

दर्रे की दुर्गमता और इस प्रदेश के निवासियों के कारण इस मार्ग से सबके लिए बहुत साल तक प्रवेश सहज नहीं था। खैबर दर्रा केवल भारत पर हुए आक्रमणों का गवाह ही नहीं है बल्कि यह हमें इस बात के लिए खबरदार भी करता है कि यदि हम अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने में विफल रहते हैं तो सभ्यता और संस्कृति कुछ भी नहीं बच पाती…

खैबर दर्रे का भारत के इतिहास में विशेष महत्त्व है। यह दर्रा पश्चिम से भारत में प्रवेश करने का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग है। इस दर्रे के जरिए 326 ईसा पूर्व में यूनानियों के द्वारा किए गए आक्रमण के साथ भारत में लूटने और गुलाम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। आक्रमणकारियों ने इस देश की समृद्धि और संस्कृति को निशाना बनाया।  यूनानियों, हूणों और शकों के बाद अरबों, तुर्कों, पठानों, मुगलों के कबीले लगभग दो हजार वर्षों तक इस देश में हमलावर बनकर आते रहे। लंबे अरसे के बाद हरि सिंह नलवा ने खैबर दर्रे के मार्ग  को कुछ समय तक बंद करके इस  अपमानित और पददलित होने की प्रक्रिया पर रोक लगाई। बाद में अंग्रेजों ने भी इसको ठीक ढंग से नियंत्रित किया। इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि खैबर दर्रे का भारत के इतिहास में क्या योगदान है। खैबर दर्रा दो हजार वर्षों तक भारत में हुए आक्रमणों और भारतीयों द्वारा अपनी सभ्यता, संस्कृति और सम्मान के लिए किए जाने वाले संघर्ष का गवाह रहा है। खैबर दर्रा उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा और अफगानिस्तान के काबुलिस्तान मैदान के बीच हिंदूकुश की सफेद कोह पर्वत शृंखला में स्थित एक प्रख्यात दर्रा है। यह 1070 मीटर की ऊंचाई पर सफेद कोह शृंखला में एक प्राकृतिक कटाव है।  खैबर दर्रा लगभग 52.8 किमी लंबा है और इसका सबसे संकरा भाग केवल 10 फुट चौड़ा है। इस दर्रे के पूर्वी  छोर पर पेशावर तथा लंदी कोतल स्थित है, जहां से अफगानिस्तान की राजधानी काबुल को मार्ग जाता है। अब यह दर्रा पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब प्रांत को अफगानिस्तान से जोड़ता है। हिंदू राजा विदेशी आक्रमणकारियों से इस दर्रे की रक्षा नहीं कर सके। यह माना जाता है कि मुस्लिम शासन काल में तैमूर, बाबर, हुमायूं, नादिरशाह तथा अहमदशाह अब्दाली ने इसी दर्रे से होकर भारत पर चढ़ाई की। जब पंजाब ब्रिटिश शासन में आ गया, तभी खैबर दर्रे की समुचित और स्थायी रक्षा की व्यवस्था की जा सकी, हालांकि इससे पहले हरि सिंह नलवा ने भी कुछ समय तक खैबर दर्रे पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने में सफलता पाई थी।  पेशावर से काबुल तक इस दर्रे से होकर अब एक सड़क बनाई गई है। यह सड़क चट्टानी ऊसर मैदान से होती हुई जमरूद से, जो अंग्रेज सेना की छावनी थी, और जहां अब पाकिस्तानी सेना रहती है, 3 मील आगे शादीबगियार के पास पहाड़ों में प्रवेश करती है, और यहीं से खैबर दर्रे का आरंभ होता है। कुछ दूर तक सड़क एक खड्ड में से होकर जाती है, फिर बाई और शंगाई के पठार की ओर उठती है। इस स्थान से अली मस्जिद दुर्ग दिखाई पड़ता है, जो दर्रे के लगभग बीचोंबीच ऊंचाई पर स्थित है। यह दुर्ग अनेक अभियानों का लक्ष्य रहा है। पश्चिम की ओर आगे बढ़ती हुई सड़क दाहिनी ओर घूमती है, और टेढ़ी-मेढ़ी ढलान से होती हुई अली मस्जिद की नदी में उतर कर उसके किनारे-किनारे चलती है। यहीं खैबर दर्रे का संकरा भाग है, जो महज पंद्रह फुट चौड़ा है और ऊंचाई में 2000 फुट है। इस घाटी के दोनों ओर छोटे-छोटे गांव और जक्काखेल अफ्रीदियों की लगभग साठ मीनारें हैं। इसके आगे लोआर्गी का पठार आता है, जो 7 मील  लंबा है और उसकी अधिकतम चौड़ाई तीन मील है।  यहां अंग्रेजों के काल का एक दुर्ग है, यहां से अफगानिस्तान का मैदानी भाग दिखाई देता है। लंदी कोतल से आगे सड़क छोटी पहाडि़यों के बीच से होती हुई काबुल नदी को चूमती डक्का पहुंचती है। यह मार्ग अब इतना प्रशस्त हो गया है कि छोटी लारियां और मोटर गाडि़यां काबुल तक सरलता से जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त लंदीखाना तक, जिसे खैबर का पश्चिम कहा जाता है, रेलमार्ग भी बन गया है।

भारत का प्रवेश-द्वार

सामरिक दृष्टि से संसार भर में यह दर्रा सबसे अधिक महत्त्व का समझा जाता रहा है। भारत के प्रवेश द्वार के रूप में इसके साथ अनेक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। समझा जाता है कि सिकंदर के समय से लेकर बहुत बाद तक जितने भी आक्रामक शक-पल्लव, यवन, महमूद गजनवी, चंगेज खां, तैमूर और बाबर आदि भारत आए, उन्होंने इसी दर्रे के मार्ग से भारत में प्रवेश किया। किंतु यह बात सर्वांश में सत्य नहीं है। दर्रे की दुर्गमता और इस प्रदेश के निवासियों के कारण इस मार्ग से सबके लिए बहुत साल तक प्रवेश सहज नहीं था।  खैबर दर्रा केवल भारत पर हुए आक्रमणों का गवाह ही नहीं है बल्कि यह हमें इस बात के लिए खबरदार भी करता है कि यदि हम अपनी  सीमाओं को सुरक्षित करने में विफल रहते हैं तो सभ्यता और संस्कृति कुछ भी नहीं बच पाती।

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