कुछ मजबूरियां अपनी, कुछ जमाने के तंज

( सुरेश कुमार लेखक, योल, कांगड़ा से हैं )

अगर पुलिस से काम लेना है, तो पहला काम यही है कि उसका मनोबल ऊंचा किया जाए। पुलिस का मतलब वर्दी नहीं होता कि वर्दी पहन ली है, तो मशीन बन जाए, जब तक चाहो ड्यूटी लो। पुलिस की वर्दी में अगर एक सजग प्रहरी होगा, तो मजाल है अपराधी आंख उठाकर देख लें। यह सारी जिम्मेदारी सरकार की है, प्रशासन की है…

‘पुलिस’ शब्द ही ऐसा है कि सुनते ही पसीने छूट जाएं। डर ऐसा कि दाऊद जैसा डॉन भी एक देश से दूसरे देश में छिपता फिरे । छवि ऐसी कि बिना कुछ किए भी आलोचनाएं झेलनी पड़ें। पुलिस का डर ही उसकी इस छवि के लिए जिम्मेदार है। पुलिस के हाथ सफलता लग जाए तो कोई पीठ नहीं थपथपाएगा, पर किसी मामले में पुलिस असफल हो जाए तो हर कोई ऐरा-गैरा कमेंट करने लग जाता है कि पुलिस तो है ही ऐसी, पुलिस वाले कुछ नहीं करते। पुलिस इस सिस्टम की वजह से कमजोर है और प्रदेश इस पुलिस की वजह से। तो जरूरी है कि पहले सिस्टम को ठीक किया जाए। अब भी सरकार पुलिस को डंडे वाली पुलिस बनाए रखना चाहती है। तकनीक कहां से कहां पहुंच गई है और हिमाचल पुलिस के पास अभी भी पुरानी तकनीक के हथियार ही हैं। हैरानी वाली बात है कि प्रदेश के पास एक अदद बुलेट प्रूफ गाड़ी तक नहीं है। और तो और राष्ट्रपति हिमाचल में आते हैं, तो खेल मैदान को हेलिपैड बना दिया जाता है। इतनी कमजोर व्यवस्था वाली पुलिस भला कैसे मजबूत हो सकती है।समाचार आते हैं कि बदमाश ने पुलिस की वर्दी फाड़ दी, होमगार्ड जवान की ड्यूटी के दौरान पिटाई कर दी और पुलिस की गाड़ी पर बदमाश नाके पर पत्थर मारकर भाग गए।  जब पुलिस ही सुरक्षित नहीं तो प्रदेश कैसे सुरक्षित होगा।

इस सबके लिए जिम्मेदार व्यवस्था भी है। अकेले पुलिस को दोष नहीं दिया जा सकता। आपराधिक तत्त्वों को राजनीतिक शरण मिलना भी इसका मुख्य कारण है। पुलिस को तो इन नेताओं ने अपनी बांदी बनाकर रखा है। कहीं जाना हो तो पुलिस का काफिला, कहीं उद्घाटन हो तो पुलिस का कारवां और ज्यादातर नेता तो पुलिस को साथ ले जाना अपनी शान समझते हैं। मजबूरियां पुलिस की अपनी भी हैं, उन्हें अपने बड़े ओहदेदारों का हुकम बजाना है और बड़े ओहदेदारों को इन नेताओं से अपना ओहदा बढ़ाना है। आम जनता के लिए पुलिस है, ऐसा तो लगता ही नहीं। कोई मैच आ गया, कोई बाहर से वीआईपी आ गया, तो चप्पे-चप्पे पर पुलिस और हर साल पता नहीं कितनी बार शक्तिपीठों में मेले लगते हैं, उन्हें मैनेज करने के लिए भी पुलिस। पुलिस कहां-कहां जाएगी और कितने ही पुलिस के पद खाली पड़े हुए हैं। पुलिस वाले भी इनसान हैं, मशीन तो नहीं और फिर मशीन को भी रेस्ट देनी पड़ती है, पर इतने कम पुलिस वाले 68 लाख की आबादी पर कैसे काबू पाएंगे। अब बेचारे पुलिस वाले एटीएम लुटने से बचाएं, मंदिरों में मेलों की व्यवस्था करें, मंत्री-नेताओं की चाकरी करें, धर्मशाला के मैच करवाएं या फिर इन अपराधियों को पकड़ें। सरकार पुलिस की भर्ती भी कम ही करती है, क्योंकि बजट ही नहीं है। एक-दो हादसों ने तो हिमाचल की छवि ही धूमिल कर दी है और साथ ही धूमिल हुई पुलिस की छवि।

रघुनाथ की मूर्तियां चोरी होना और हाल ही में मुख्यमंत्री के महल में चोरी, यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में कोई भी सुरक्षित नहीं है, तो फिर सरकार का इतना बड़ा तामझाम क्यों। ये सचिव, ये आलाधिकारी, ये मंत्री, ये विभाग सब बेमानी ही हुए। जब पुलिस के रहते ही हम असुरक्षित हैं, तो यह सारा सिस्टम खत्म कर देना चाहिए या फिर सब कुछ सही करना चाहिए। जितनी पुलिस प्रदेश को चाहिए, उतनी भर्तियां हों, पुलिस को सही समय पर अवकाश मिले, उनके लिए उचित रहने और खाने की व्यवस्था हो। लगातार बिना ब्रेक ड्यूटी से  सतर्क रहना संभव नहीं। जब लोग घरों में दिवाली, होली पर  जश्न में डूबे होते हैं, तब पुलिस वाले ड्यूटी पर होते हैं। ऐसे में बाकी दिनों में उन्हें अवकाश देना तो बनता है। अगर पुलिस से काम लेना है, तो पहला काम यही है कि उसका मनोबल ऊंचा किया जाए। पुलिस का मतलब वर्दी नहीं होता कि वर्दी पहन ली है, तो मशीन बन जाए, जब तक चाहो ड्यूटी लो।

पुलिस की वर्दी में अगर एक सजग प्रहरी होगा, तो मजाल है अपराधी आंख उठाकर देख लें। यह सारी जिम्मेदारी सरकार की है, प्रशासन की है। इसके साथ ही लोगों को भी पुलिस का सहयोग करना चाहिए। अपराधी इस बात का भी फायदा उठाते हैं, क्योंकि लोग उनके खिलाफ जाकर पुलिस के पचड़े में पड़ना नहीं चाहते और लोगों की यही कमजोरी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। प्रदेश को सुरक्षित रखना है तो हर किसी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। अकेले सरकार, अकेला प्रशासन और अकेली जनता अपराध पर अंकुश नहीं लगा सकते। सब को एकजुट होना होगा और इसमें सबसे अहम पुलिस को सशक्त बनाना होगा और पुलिस को भी अपनी छवि सुधारनी होगी ताकि लोग उनसे डरें नहीं बल्कि आगे बढ़कर सहयोग करें। फिर देखो प्रदेश कैसे अपराधमुक्त होता है। अपराधयुक्त प्रदेश में तो रह कर देख लिया अब जरा अपराधमुक्त प्रदेश में रहकर देखो, सच में अच्छा लगेगा। आओ एक कोशिश कर के तो देखें।

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