जमीन का हक पाने को गरजे किसान

Nov 17th, 2015 12:15 am

newsशिमला —  शिमला के सब्जी मंडी ग्राउंड में सोमवार को प्रदेश भर से आए सैकड़ों किसानों ने जमीन से किसानों की बेदखली रोकने, जंगली जानवरों और आवारा-नकारा पशुओं से निजात की मांग उठाई। इस दौरान किसान सभा ने आरोप लगाया कि मात्र अढ़ाई महीने में किसान दोबारा अपनी मांगों को लेकर शिमला आने पर मजबूर हुए हैं ,जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की विफलता को साबित करता है। जनसभा को संबोधित करते हुए सेब उत्पादक संघ के राज्याध्यक्ष राकेश सिंघा ने कहा कि अगर सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस नीति नहीं बनाती और किसानों की बेदखली को नहीं रोकती है ,तो प्रदेश की जनता सरकार को बेदखल करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि सरकार अगर अब तक हुई किसानों की बेदखली के आंकड़े और तथ्य जुटाए ,तो उसके लिए शर्म की बात होगी ,क्योंकि सरकार ने अब तक जिन किसानों के पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलवाई है वे गरीब नहीं बल्कि उनमें से अधिकतर अति गरीब किसान हैं, विधवा महिलाएं हैं।  राकेश सिंघा ने कहा कि 27 अगस्त की किसान रैली के बाद हुई वार्ता में मुख्यमंत्री ने स्वयं माना था कि किसानों का बिजली-पानी काटने का आदेश कानूनन गलत है और उनके विभाग से गलती हुई है। सिंघा ने कहा कि मुख्यमंत्री के कबूलनामे के बावजूद किसानों के बिजली-पानी के कनेक्शन काटे जा रहे हैं और घर तोड़े जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसका सीधा अर्थ है कि अपने विभागों पर सरकार का नियंत्रण नहीं रहा। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रभावहीन सरकार को स्वयं सत्ता छोड़ देनी चाहिए। सिंघा ने विपक्षी भाजपा को भी लताड़ लगाई और कहा कि पहले उसने जमीन नियमित करने के नाम पर 2002 में शपथपत्र लेकर किसानों का मूर्ख बनाया और अब किसानों पर हो रही बेदखली की कार्रवाई पर चुप्पी साधे हुए है। हिमाचल किसान सभा के राज्याध्यक्ष डा. कुलदीप तंवर ने कहा कि सरकार ने अतिक्रमण के दायरे में आए लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने को असंवेधानिक करार दिया और नागरिक अधिकारों का हनन बताया। उन्होंने कहा कि किसान संगठन इसका कड़ा विरोध करते हैं, जब तक किसी व्यक्ति के खिलाफ जुर्म साबित नहीं हो जाता उसे चुनाव लड़ने से रोकना नाजायज है। उन्होंने तीन पीढी के अतिक्रमण की शर्त को हास्यस्पद बताया। डा. तंवर ने सरकार और विपक्ष दोनों पर हमला बोलते हुए कहा कि अगर यह नियम पंचायतों पर लागू होता है ,तो विधानसभा और संसद पर क्यों नहीं ,जबकि इन निकायों में कितने ही नेताओं पर सरकारी जमीन हड़पने के मामले चल रहे हैं। प्रदेश की विधानसभा में भी इस तरह के कई प्रतिनिधि मौजूद होंगे, पहले उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए उसके बाद आम जनता पर यह नियम लागू करना चाहिए।

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